357 BNS in Hindi: ऐसी रिपोर्टें अक्सर तब सामने आती हैं, जब कोई बुज़ुर्ग या बच्चा घायल अवस्था में मिलता है और उसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं होता; हालाँकि ऐसे लोगों की देखभाल के लिए सरकारी केयरगिवर या नर्सें उपलब्ध होती हैं, लेकिन अगर कोई उनकी सहायता करने के प्रयासों में बाधा डालता है, तो मुश्किलें खड़ी हो जाती हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा करने पर सज़ा भी हो सकती है और ऐसे में BNS का कौन सा सेक्शन लागू होता है और किस तरह की सज़ा दी जाएगी? तो चलिए हम आपको बताते हैं, अगर ऐसा किया जाता है तो भारतीय न्याय सहिंता (BNS) का सेक्शन 357 लागू होता है। तो चलिए इस आर्टिकल में जानते हैं कि ऐसा करने पर कितने साल की सज़ा का प्रावधान है और BNS में इसके बारे में क्या कहा गया है।
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धारा 357 क्या कहती है? BNS Section 357 in Hindi
आज के समय में अत्याचार इस हद तक बढ़ गए हैं कि लोग इन्हें अंजाम देने के लिए किसी भी हद तक चले जाते हैं। इतना ही नहीं, वे किसी बेबस व्यक्ति की मदद करने से भी पीछे हटते हैं। हालाँकि, यदि वे पकड़े जाते हैं, तो उन्हें कड़ी सज़ा का सामना करना पड़ता है। जैसा कि आप जानते हैं, कानून की अलग-अलग धाराएँ अलग-अलग कृत्यों और दंडों का प्रावधान करती हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि BNS (भारतीय न्याय संहिता) की धारा 357 क्या कहती है? यदि नहीं, तो आइए जानते हैं।
भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 357 यह सेक्शन उस व्यक्ति पर लागू होता है जब कोई ऐसा व्यक्ति जो जान-बूझकर किसी असहाय व्यक्ति (जैसे कि कोई बच्चा, बीमार व्यक्ति या बुज़ुर्ग) की देखभाल करने से संबंधित कानूनी अनुबंध का पालन करने में विफल रहता है।
BNS section 357 Important points
- आपको बता दें, भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 357 (पूर्व में IPC की धारा 491)।
- इसमें वे लोग शामिल हैं जो बीमारी, उम्र (बहुत कम या बहुत ज़्यादा), या मानसिक बीमारी के कारण अपनी देखभाल स्वयं करने में असमर्थ हैं।
बीएनएस धारा 357 की और सजा
इसके अलावा, BNS की धारा 357 यह तब लागू होती है, जब कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी की देखभाल करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य हो। तो इस सेक्शन के तहत दोषी पाए जाने पर आरोपी को crime करने पर 3 महीने तक की जेल (Simple Imprisonment) या ₹5,000 तक का जुर्माना या दोनों हो सकता है। आपको बता दें, यह एक गैर-संज्ञेय (non-cognizable) अपराध है, इसलिए पुलिस को जाँच के लिए मजिस्ट्रेट की अनुमति चाहिए होती है। इस अपराध में जमानत मिलना भी काफी मुश्किल हैं। वही पुलिस इस अपराध के लिए बिना वारंट के भी आरोपी को गिरफ्तार कर लेती है।



