आपको पता है हर साल भारत समेत पूरी दुनिया में 1 मई को कौन सा दिवस मनाया जाता है… किसी को पता हो या न हो, लेकिन जो भारत के मजदूर है उन्हें जरूर पता होगा… ये दिन मजदूर दिवस कहलाता है। जिसे कही मे डे और लेबर डे भी कहा है। मजदूर… जिसके बारे में सुनकर अक्सर भारत में तो कहीं न कहीं उन दिहाड़ी मजदूरों, कामगारों के बारे में ही सोचा जाता है जो कारखानों, खेतों या मैन्यूफेक्चरिंग के काम में लगे होते है। 1 मई 1890 को शुरु हुआ मजदूर दिवस मूल रूप से शिकागो में 1886 में हुए हेमार्केट कांड की स्मृति में आयोजित हुए समारोह की याद में आगे बढ़ाया गया था, यानि की भारत से बाहर मजदूरो के हक में बहुत साल पहले ही सोचा गया था लेकिन इस आंधी को भारत आने में कई दशक लग गए।
जिसे लेकर आये संविधान शिल्पीकार बाबा साहब अंबेडकर जिन्होंने मजदूरो के हक में न केवल पहली बार आवाज उठाई थी, बल्कि उन्होंने पहली बार 1936 में इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी’ (Independent Labour Party) का गठन किया था। जिसका उद्देश्य था कि गरीब वंचितो, मजदूरों, किसानों और समाज के कमजोर तबको को की मूल समस्याओं को जानना और उसका समाधान करने करके राजनीतिक रूप से अधिकार दिलाना। मगर कैसे बाबा साहब की ये पार्टी समय के बदलती गई और मजदूरो के लिए उनके अधिकार मांगने के दायरे भी.. अपने इस लेख में जानेंगे कि जिन मंजदूरो से हेगारी कराना मालिक अपना अधिकार समझते थे, उनकी बेगारी से निकालने के लिए बाबा साहब ने क्या किया।
शिकागो में पहली बार मजदूर दिवस मनाया गया
सबसे पहले जानते है मजदूर दिवस की कहानी- 1 मई 1890 में शिकागो में पहली बार मजदूर दिवस मनाया गया, जिसे लेबर डे या मे डे कहा गया। जो या तो 1 मई को मनाया जाता था या मई महीने के पहले सोमवार को.. मजदूर दिवस की शुरुआत शिकागो में 1886 में हुए श्रमिक विरोध प्रदर्शन की याद में शुरु किया गया जब एक अज्ञात व्यक्ति ने पुलिसवालो वालो बम फेंक दिया और इस विरोध को दबाने की कोशिश की गई जिसमें अनगिनत मजदूरों को मार दिया गया लेकिन ये और व्यापक हो गया और अंतररार्ष्ट्रीय स्तर पर इसका प्रभाव होने लगा।
मजदूरो के अधिकारों के लिए ये पहली बार किया गया आंदोलन था। धीरे धीरे दुनिया भर में इस आंदोलन का असर होने लगा और वहां भी मजदूरो के हक में आवाज उठनी शुरु हो गई.. मजदूरों के अधिकारों के लिए की जाने वाली मांगे जायज और न्यायसंगत थी, इसलिए इसे पूरी भी की जाने लगी.. आज भी 95 देश मजदूर दिवस को मान्यता देते है।
1936 में ‘इंडिपेंडेंट’ लेबर पार्टी का गठन
जिसमें एक भारत भी है, लेकिन भारत में मजदूरो के लेकिन हक पाना आसान नहीं था.. वजह साफ थी… पहली जातिवाद, दूसरी पूँजीपतियों का बोलबाला, तीसरी वर्ण व्यवस्था के कारण मजदूरों के काम भी बंटे थे… सदियों से चली आ रही बेगारी की प्रथा..मगर विदेश में कई साल बिताने वाले बाबा साहब ने इस समस्या को बहुत करीब से देखा और समझा था..वो जानते थे कि भारत के मजदूरों को न्याय संगत माहौल देने के लिए उन्हें एकजुट करना ही होगा.. जिसके लिए उन्होंने सबसे पहले 1936 में गठन किया ‘इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी का.. ये पार्टी मजदूरों को एकजुट करके एक क्रांतिकारी बदलाव लाने की दिशा में काम करती।
समय के साथ ये पार्टी काफी प्रभावशाली होने लगी और 1942 में इसी पार्टी को ‘ऑल इंडिया शेड्यूल कास्ट्स फेडरेशन’ (All India Scheduled Castes Federation) में बदल दिया गया.. जिसमें पिछड़ी और दलित जाति के मजदूरों के हक में आवाज उठाने और राजनीतिक रूप से और समाजिक रूप से सुरक्षा देने के लिए काम किया गया था। हालांकि ये फेडरेशन दलित और पिछड़ी जाति की पार्टी हो गई.. यहीं पार्टी आगे जाकर महाराष्ट्र के सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण मंत्री रामदास अठावले की पार्टी कहलाई जो कि मूल पार्टी का ही एक अलग घटक है। इसी पार्टी से जुड़ कर बाबा साहब ने देश के सभी मजदूरों के लिए आवाज उठाई थी।
जब बाबा साहब ने मजदूरो के हक में उठाई आवाज
दरअसल बाबा साहब जानते थे कि जब कि कोई मजबूत कानून नहीं बनता तब तक मजदूरो का दमन जारी रहेगा.. उनसे बेगारी कराई जायेगी.. इसलिए जरूरी है कि मजदूरों के लिए जो भी नियम बने उसे कानूनी रूप से भी मान्यता मिले..ये बात 1942 की है, जब दुनिया दूसरे विश्व युद्ध की आग में जल रही थी, लेकिन दूसरी तरफ बाबा साहब के मन में मजदूरो के लिए कुछ दिखाने की आग थी।
उन्होंने 20 जुलाई 1942 को वायसराय की कार्यकारी परिषद के सदस्य के रूप शामिल होना स्वीकार किया और सबसे पहले उन्होंने लेबर प्लांट के प्रबंधन का काम खत्म करने के लिए दिया गया था..,बाबा साहब को श्रम कानूनो के लिए कुछ बड़े फैसले लेने थे,,, वो उस वक्त बॉम्बे डेस्टिनेशन काउंसिल और वायसराय के कार्यकारी परिषद के सदस्य थे, और श्रम कानूनों में बदलाव करने का वो सबसे सही समय था, उस दौरान मजदूरों को 12 से 15 घंटे काम करना पड़ता था , लेकिन बाबा साहब ने मजदूरो के काम के घंटे ही घटा दिये।
महिलाओं के लिए मैट्रेनिटी बेनेफिट बिल
27 नवंबर 1942 को सातवीं लेबर कॉन्फ्रेंस में बाबा साहब ने एक विधेय़क पेश किया जिसके मुताबिक विधेयक में न केवल समय कम करने का प्रस्ताव दिया गया बल्कि मृत्यु बीमा, प्रोविडेंट फंड, टीए-डीए, मेडिकल लीव और स्केल जैसे लाभ देने की भी प्रस्ताव रखा गया। इस समय बाबा साहब ने 10 अलग अलग बिलो को पेश किया..जिसमें द कोल मैन्स साइंसेज बिल, डी मॅन्सिस बिल, डी. कामर्स मॅन्सिस बिल, द इंडियन मॅन्सिस बिल, वर्कर्स मॅन्सिस बिल, 7. मिका मॅन्सिस बिल, मीका मॅन्सिस बिल, इंडस्ट्रियल वर्कर्स एंड हेल्थ बिल, टी. बिल ड्राफ्ट थे। महिलाओं के लिए मैट्रेनिटी बेनेफिट बिल भी लेकर आये थे।
बाबा साहब इंडियन ट्रेड यूनियन बिल लेकर आए
हालांकि अब ये सभी संशोधित हो चुके है। इतना ही नहीं 29 जुलाई 1943 को बाबा साहब खुद मैट्रेनिटी बेनेफिट बिल में कुछ और क्लोज लेकर आये.. जिसमें मेन्स मैट्रेनिटी बेनेफिट, समान काम के लिए समान वेतन, महिला कल्याण कोष, महिला बाल एवं श्रमिक संरक्षण कानून, महिला आदिवासियों के लिए जनजाति लाभ कानून ले कर आ थे, इसके अलावा 13 नवंबर 1943 को बाबा साहब इंडियन ट्रेड यूनियन बिल लेकर आए थे, जो भले ही संशोधित था लेकिन इसके तहत दुर्घटना का बीमा मिलना शुरु हुआ जिससे इसे ई-संस्था की पहचान मिली थी।बाबा साहब केवल संविधान निर्माता नहीं थे, आज महिला हो या पुरुष कार्यक्षेत्र में बराबरी का ओहदा पा रहे है उसकी वजह भी बाबा साहब है। बाबा साहब की दूरदर्शिता की जितनी सराहना की जायें वो कम ही होगी।



