अगर किसी पार्टी को सबसे ज्यादा मजबूत बनाना है तो उन्हें साधियें जो पूरे राजनीति का समीकरण बदल कर रख सकते है…जैसा की आम आदमी जैसी नई पार्टी ने किया था.. ये इशारा था देश की उन 33 प्रतिशत अनुसूचित जाति और जनजाति वर्गो की तरफ… जो वैसे तो हमेशा ही वोट प्रतिशत में बाकि के वर्गो पर भारी रहे है लेकिन असल में ये हाशिये पर है.. दलितों को साधने की बात खुल कर कहने वाले है एक दलित नेता डॉ उदित राज।
कांग्रेस पार्टी वैसे तो दलितों को लेकर काफी उदासीन रही है लेकिन इसी पार्टी ने मल्लिकार्जुन खड़गे जैसे दलित नेता को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया तो वहीं उदित राज जैसे दलित नेता की आरक्षण और दलित अधिकारों के लिए उठाई गई आवाज को मजबूती भी दी.. अपने इस लेख में हम जानेंगे कि कौन है उदित राज और कैसे आज वो आरक्षण और दलित अधिकारों के लिए एक सक्रिय आवाज़ बन गए है।
डॉक्टर उदित राज ने आईआरएस की नौकरी ठुकराई
अभी हाल ही में डॉक्टर उदित राज ने एक इंटरव्यू में पूर्व यूपी सीएम मायावती को एक क्रूर महिला कहा था.. उन्हें अव्यावहारिक कहा था.. महिला होने के नाते वो कोमलता नहीं बल्कि क्रूरता से भरी है… एक बहुजन नेता के लिए इतना कड़वा केवल वहीं कह सकता है जिसने बहुजनों की स्थिति को करीब से देखा और समझा हो.. जिन्होंने एक आईआरएस की नौकरी को लात मारी… और चल पड़े दलितों और पिछड़ो के हक में लड़ने के लिए… जरा सोचिये..एक दलित जाति का शख्स… जिसके लिए दो वक्त की रोटी जुटाना भी आसान नहीं होता… वो कई सालों की मेहनत और लगन से पाये आईआरएस (IRS) के पद को यूहीं दलित कल्याण के लिए लात मार सकता है।
जातिवाद दलितों को आगे बढ़ने नहीं देता
शायद ऐसे कदम के लिए भी हिम्मत चाहिए… इतना ही नहीं बहन मायावती जैसी एक ताकतवर नेता के चेहरे से बहुजन नेता का नकाब उतारने वाले है डॉ उदित राज.. डॉ उदित राज ने समाज के दबे कुचले लोगों के लिए ऐसी नौकरी को पीछे छोड़ दिया और 2003 में अपनी ईंडियन जस्टिस पार्टी यानि की भारतीय न्याय पार्टी की स्थापना की…मगर ये राह आसान कहां थी। यूपी की नसो में भर चुका जातिवाद भला कहां दलितों को आसानी से आगे बढ़ने देता।
जातिगत भेदभाव से डॉ उदित राज भी अछूते नहीं थे.. 1 जनवरी 1958 को इलाहाबाद के पास रामनगर में एक खटिक परिवार में जन्मे थे उदित राज.. बचपन से जातिगत भेदभाव को देखकर बड़े हुए थे लेकिन जब दिल्ली के जेएनयू विश्वविद्यालय (JNU University) में पढ़ने पहुंचे तब पहली बार लगा कि अगर दलितों के लिए कुछ करना है तो राजनीतिक के कीचड़ में खुद उतरकर सफाई करनी होगी।
दलितों की वास्तविक स्थिति और आरक्षण
आईआरएस अधिकारी की नौकरी छोड़ी और चल पड़े राजनीतिक दिशा में.. ईडियन जस्टिस पार्टी के बनते ही दलितों के लिए शिक्षा, नौकरी, उच्च पदों और न्यायपालिका में आरक्षण की पुरजोर मांग करनी शुरु कर दी थी। मायावती की बहुजन समाज पार्टी उनके राज में जहां हुंडो का गढ़ बना गया। वहीं डॉ उदित राज ने अपनी विचारधारा में कभी गुंडाराज आने ही नहीं दिया..वो अपना मकसद जानते थे.. उन्होंने हमेशा संविधान को सबसे ऊपर मानकर उसका बचाव करने की मांग की है साथ ही सार्वजनिक मंचों और सोशल मीडिया के जरिए दलितों की वास्तविक स्थिति और आरक्षण क्य़ों जरूर है।
उसपर गहन चर्चा की… हालांकि 2014 में जब बीजेपी सत्ता में आ तब उन्होंने अपनी पार्टी को बीजेपी में विलय कर दिया। उम्मीद थी कि बीजेपी दलितों पिछड़ो के लिए कोई ठोस कदम उठायेगी… लेकिन हुआ इसके विपरीत..उदित राज के इरादो पर पानी फिर गया..बीजेपी की विचारधारा दलितों को मजबूत करने की नहीं बल्कि उन्हें कमजोर करने की थी।
कांग्रेस ने उदित राज की लड़ाई को बड़ा हथियार बनाया
आरएसएस प्रभावित होने के कारण मनुस्मृति का कानून मानने वाली पार्टी से भला वो कैसे ज्यादा दिनों तक जुड़े रहते… भीतर ही भीतर दरार पड़ने लगी और 2019 में बीजेपी ने उन्हें टीकट ही नहीं दिया। हैरान करने वाली बात है कि एक पार्टी के अध्यक्ष को बीजेपी ने मतलब निकल जाने पर बाहर का रास्ता दिखा दिया। उदित राज ने बिना देरी के कांग्रेस का दामन थाम लिया.. कांग्रेस ने उदित राज की लड़ाई को बड़ा हथियार बनाया … और उनकी आवाज को और बुलंद कर दिया। कांग्रेस ने उन्हें असंगठित कामगार और कर्मचारी विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया।
उदित राज ने माना कि मौजूदा समय में न्यायपालिका में भी भ्रष्टाचार और पक्षपात का कीड़ा लग चुका है.. जो चंद ताकतवर लोगो के इशारे पर चल रह है लेकिन इसपर रोक लगनी ही चाहिए,, और न्यायपालिका की व्यवस्था को बनाये रखने के लिए आरक्षण होना ही चाहिए.. तभी कमजोर औऱ पिछड़े तबके के लोग न्यायपालिका तक पहुंच पायेंगे और वंचित वर्गो के लिए न्याय की मांग पर कोई खड़ा रह सकेगा। इससे बराबरी होगी और जातिगत भेदभाव में कमी आयेगी.. जो न्यायिक प्रणाली में सुधार के लिए बड़ा कारक बन सकता है। कई बार पिछड़ी जाति का न्यायधीश होते हुए भी उंची जाति के जजो के दवाब में गलत फैसले होते है.. सबको पता है कि फैसला गलत है लेकिन सबकी बोलती बंद हो जाती है।
उदितराज हर क्षेत्र के नीजिकरण के सख्त खिलाफ
इसलिए न्यायपालिका में भी आरक्षण होना चाहिए। वहीं उदितराज हर क्षेत्र के नीजिकरण के सख्त खिलाफ है.. उन्होंने कहा कि नीजिकरण युवाओं पर दोहरी चोट के समान है खासकर दलित और पिछड़ो पर… क्योंकि जहां जातिगत भेदभाव के कारण उनका पढ़ना लिखना भी आसान नहीं है वहां नीजिकरण करके पूंजीपतियों की अपनी मनमानी होगी.. औऱ बीजेपी राज में आरक्षण, मैरिट के आधार पर नहीं बल्कि जाति के आधार पर चुने जायेंगे। जो दलितों और पिछड़ो को और हाशिये पर धकेल देगा। उन्होंने ऐलान किया है कि जब तक बीजेपी है तब तक देश जातिगत भेदभाव की कट्टर गुलाम ही रहेगा.. इसलिए उनका जाना जरूरी है।
हर व्यक्ति को आजादी का अधिकार है, लेकिन अभी हम गुलाम है.. जातिवाद के गुलाम,, इसलिए जरूरी है कि दलित एकजुट हो…उदितराज का संघर्ष दलितों के लिए ऐसा है कि मशहूर निर्देशक औऱ निर्माता अजय चिटनीस ने 26 जुलाई 2018 को डॉ अम्बेडकर अन्तरराष्ट्रीय केन्द्र में 15 जनपथ डॉ उदित राज के संघर्षों पर बनी डॉक्यूमेंट्री “द क्रूसेडर दिखाई गई थी.. जहां करीब 1500 लोग मौजूद थे। इतना ही नहीं ‘द क्रूसेडर’ को 7वें बैंगलोर शॉर्ट फिल्म फेस्टिवल -2018 में जूरी पुरस्कार भी मिला था।
न्यायपालिका हो या सरकारी नौकरियां आरक्षण की मांग तेज
उदित राज 68 साल के हो चुके है लेकिन दलितों के लिए आरक्षण और अधिकार की लडाई आज भी जारी है.. उनका एक ही ध्येय है कि वो दलितों पिछड़ो को इस जातिगत पराधीनता से आजाद करा कर ही दम लेंगे। डॉ उदितराज जैसे नेता ही समाज में बड़ा बदलाव ला सकते है.. उनकी लड़ाई की ही देन है कि न्यायपालिका हो या सरकारी नौकरियां आरक्षण की मांग तेज हुई है। जातिगत भेदभाव के खिलाफ उनकी इस लड़ाई पर विजय मिले या न मिले..लेकिन उन्होंने देश के लाखों युवाओं क दिलो में जरूर इस भेदभाव के खिलाफ चिंगारी लगा दी है.. देखना ये होगा कि आखिर कब तक ये भेदभाव जारी रहेगा.. औऱ कब तक सरकार उनकी मांगो को दबाने की कोशिश करती है।



