Lord Buddha Mahaparinirvana: भगवान बुद्ध के जुड़े 8 प्रमिख स्थानों में कुशीनगर का महत्व सबसे ज्यादा है..वजह यहीं वो स्थान है जहां भगवान बुद्ध 80 वर्ष की अवस्था में महापरिनिर्वाण को प्राप्त किया था। बगौतम बुद्ध की मृत्यु 483 ई. में पूर्व कुशीनारा में हुई थी..कुशीनारा जिन्हें आज कुशीनगर के नाम से जाना जाता है। हालांकि बुद्ध की मृत्यु को लेकर बौद्ध बुद्धिजीवी और इतिहासकार अलग अलग कारण देते है लेकिन एक घटना जरूर हुई, जिसके बारे में हमेशा चर्चा होती है।
आखिर क्यों बुद्ध की मृत्यु के बाद भी उनकी चिता में आग नहीं लग पा रही थी, कई कोशिशे की गई, लेकिन तब तक चिता नहीं जली जब कर बुद्ध के प्रिय शिष्य महाकश्यप उनके अंतिम दर्शक के लिए नहीं पहुंच गए। अपने इस लेख में हम बुद्ध की मृत्यु और उनके अंतिम संस्कार में होने वाली देरी के बारे में बात करेंगे।
नश्वर शरीर में रहने की अवधि काफी कम बची
दिग्घ निकाय के महापरिनिर्वाण के अनुसार 483 ई. पूर्व की बात है। बुद्ध 80 साल के हो चुके थे, वो वैशाली की यात्रा पर अपने कुछ अनुयायियों के साथ थे, जहां उन्होंने एक दिन विश्राम के वक्त अपने शिष्य आनंद को ये रहस्य बताया कि उनकी इस नश्वर शरीर में रहने की अवधि काफी कम बची है, 3 महीने के बाद वो महापरिनिर्वाण को प्राप्त करेंगे। ये संकेत था कि बुद्ध कार्य के लिए धरती पर आये थे वो कार्य समाप्त होने वाला है और अब उनके संसारिक आडंबरो से जाने का समय आ चुका है। वैशाली छोड़ने से पहले उन्होंने अंतिम उपदेश दिया और कहा कि अत दीप भव..यानि की सभी को अपना दीपक खुद बनना होगा।
भयमुक्त होकर अपने निर्वाण के लिए साधना करें
बुद्ध इन वाक्यों के जरिये केवल ये संदेश देना चाहते थे कि केवल किसी की कही सुनी, लिखी हुई बातों को सुनने और मानने के बजाये आप खुद अवलोकण करें। दुनिया में कुछ भी हमेशा के लिए नहीं है, व्यक्ति को ज्ञान और मुक्ति का रास्ता खुद खोजना होगा। बुद्ध ने कहा कि मृत्यु से कभी न डरें, वो सबसे बड़ा सत्य है। इसलिए भयमुक्त होकर अपने निर्वाण के लिए साधना करें। अपनी यात्रा में बुदेध वेशाली, राजगीर, पावा और फिर कुशीनगर आये। लेकिन उससे पहले वो पावा में एक चुंडा नाम के लोहार के यहां खाने के लिए रूके थे। लुहार की पत्नी ने गलती से सूकर मद्धव की सब्जी बनाई थी जो कि जहरीली थी।
साल के वृक्षों के नीचे अंतिम सांस ली
लेकिन बुद्ध ने जहरीला भोजन खा लिया था, लेकिन उससे बुद्ध काफी बिमार हो गये थे, उन्होंने पता था कि उनके महापरनिर्वाण का समय आ गया है.. लेकिन उन्होंने अपने शिष्य आनंद से इसके बारे में किसी को कुछ भी कहने से रोक दिया था। बुद्ध किसी तरह से कुशीनगर पहुंचे थे लेकिन उनक हालात काफी खराब हो गई थी। कुशीनगर में ही साल के वृक्षों के नीचे अंतिम सांस ली थी। करीब 6 दिनों तक बुद्ध के शव को उनके अनुयायियो के दर्शन के लिए रखे गए थे लेकिन जब सातवे दिन उनका अंतिम संस्कार करने की कोशिश की गई तो उनकी चिता में आग ही नहीं लग रही थी। जिसके बाद महाकश्यप को आना पड़ा था।
क्यों नहीं लगी बुद्ध की चिता में आग
सबको हैरानी थी कि सबको मुक्ति का मार्ग बताने वाले बुद्द की आखिर क्या इच्छाएं रह गई थी जिससे उनकी चिता को आग नहीं लगी रही थी,.. जबकि मल्यगण राज्य में उनका अंतिम संस्कार होना था इसलिए सुगंधित चंदन की लकड़ी, खूश्बूदार द्रव्य, फूल, कपड़े सबकुछ था, बावजूद इसके चिता ने आग नहीं पकड़ी… सभी चकित थे लेकिन आनंद शांत थे जैसे उन्हें पता हो कि आखिर क्यों चिता में आग नहीं लग रही है..जैसे किसी की प्रतीक्षा कर रही हो।
दरअसल गौतम बुद्ध के सबसे प्रिय शिष्यों में से एक महाकश्यप उन दिनों कुशीनगर से काफी दूर थे, बुद्ध की मृत्यु की खबर मिलते ही महाकश्यप तुरंत उनके अंतिम दर्शन के लिए निकल पड़े थे..उन्हें कुशीनगर पहुंचने में 7 दिन लग गए थे.. लेकिन जैसे ही वो आये उन्होंने शांत मन से बुद्द के चरणों में झुक कर प्रणाम किया, जैसे उन्हें अंतिम विदाई दे रहे हो.. जैसे महाकश्यप ने बुद्ध के अंतिम विदाई दी.. चिता में खुद ही अग्नि लग गई। सभी हैरान थे.,.आखिर क्या ये चमत्कार था या एक शिष्य के निष्ठा के प्रति बुद्ध की कृपा।
महाकश्यप ने आकर बुद्ध को आश्वासन
दरअसल इस घटना ने बताया कि क्यों बुद्ध ने सदैव ध्यान साधना को महत्व दिया था, क्यों वो चमत्कार और अंधविश्वास से दूर रहने की सलाह देते थे। सच तो है कि महाकश्यप गौतम बुद्ध के उन शिष्यों में से एक थे जिन्होंने बुद्ध के केवल शब्दों को ही नहीं उनके अनुभवो को भी जाना समझा था। बुद्ध की चिता का न जलना प्रतीक है कि बुद्ध अपने धर्म की परंपरा को सही हाथों में सौंपने का इंतजार कर रहे थे। महाकश्यप ने आकर ये बुद्ध को आश्वासन दिया कि अब धर्म उनके हाथों में है, वो मुक्ति पा सकते है। बुद्ध चले गए लेकिन उनका धर्म नहीं..उनकी परंपरा नहीं.. जो हमेशा जीवित रहेगा। यहीं कारण था कि बुद्ध की चिता नहीं जली थी। बुद्ध के लिए उनका उत्तराधिकारी एक शिष्य बना.. कोई अपमा नहीं। जो बौद्ध धर्म में मुक्ति का प्रतीक है।



