अभी हाल ही में नेपाल की राजनीति में उस वक्त बड़ी सनसनी मच गई जब नेपाल के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री बालन शाह ने ये ऐलान कर दिया कि वो आने वाले 15 दिनों में देश के हर उस दलित और पिछड़े वर्ग से माफी मांगेंगे, जिन्हें सदियों से जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानता के कारण प्रताड़ित होना पड़ा है। बालेन शाह के इस कदम की पूरी दुनिया में काफी तारीफ हो रही है तो वहीं भारत में एक नई बहस शुरू हो गई है। क्योंकि नेपाल के बाद तो भारत ही ऐसा देश है जहां दलित, पिछड़े वर्ग के लोग सदियों से इस प्रताड़ना को झेल रहे है।
नेपाल के पीएम का कदम जातिगत भेदभाव खत्म करेगा
ऐसे में कई सवाल उठने लगे है, जिनके जवाब अब भारत के दलित भी चाहते है। वहीं नेपाल के पीएम का क्या ये कदम जातिगत भेदभाव खत्म कर सकता है। वहीं पड़ोसी देश के इस फैसले का भारत पर क्या असल पड़ेगा। साथ ही क्या ये माफी उस दर्द पर मरहम का काम करेगा जिसका दर्द सदियों से झेल रहे है। वहीं नेपाल में दलितों और पिछड़ों को लेकर जो फैसले किए गए है उसका अब कि राजनीति तौर पर और सामाजिक तौर पर क्या असले पड़ने वाला है। और क्या ऐसा भारत में संभव है या नहीं। अपने इस वीडियो में हम जानेंगे कि नेपाल का ये कदम किस बदलाव को जन्म देगा। साथ ही ऐसा भारत में संभव है या नहीं। इस मुद्दे पर चर्चा करेंगे।
हिंदू धर्म से कभी भी जातिवाद नहीं जायेगा..
आपको भारत के संविधान निर्माता बाबा साहब अंबेडकर के धर्म बदल कर बौद्ध अपनाने का कारण याद है। वो मानते थे कि हिंदू धर्म से कभी भी जातिवाद नहीं जायेगा.. और न ही ये भेदभाव को कभी खत्म सकेगा.. ये बात कहीं न कहीं पूरी तरह से सही भी है.. भारत में जहां धर्म निरपेक्षता है वहां जब जातिगत भेदभाव की स्थिति इतनी खराब है तो जरा सोचिये जिस देख ने खुद को हमेशा एक हिंदू राष्ट्र कहा..वहां दलितों और पिछड़ो की स्थिति क्या होगी..नेपाल में करीब 13 से 15 प्रतिशत आबादी दलित पिछड़ो की है।
नेपाल में दलितों की स्तिथि बेहद दयनीय
जिन्होंने सदियों से जातिगत भेदभाव झेला है. जातिगत भेदभाव में मामले में नेपाल भारत से कहीं से कमतर नहीं है। मंदिरों में प्रवेश देने पर, उनके साथ अछूतों वाला व्यापार करना, उनके बच्चों की शिक्षा पर रोक या फिर उनके साथ एक पंक्ति में खाने की बात हो.. भारत औऱ नेपाल की स्थिति एक समान ही रही है। शिक्षा देने के मामले में भी नेपाल में दलितों की स्तिथि बेहद दयनीय है, खासकर हाइ एजुकेशन मेंतो शायद आपको गाहे बगाहे की सुनने को मिले की किसी दलित को उंचाई हासिल हुई हो.
.न तो वो आर्थिक रूप से मजबूत है और न ही बेहतर कार्य कर सकते है और इसी स्थिति में सदियों से लोग रह रहे थे, लेकिन अब बालेन शाह ने अपने 100 दिन के एजेंडे के तहत बड़ा फैसला लिया.. उन्होंने दलितों औप पिछड़ो को बराबरी और समानता देते हुए माफी का ऐलान कर दिया था।
क्या भारत में मुम्किन है
अब सवाल ये है कि क्या भारत में ये संभव है, तो जवाब होगा शायद नहीं.. क्योंकि जहां नेपाल ने भेदभाव को अपनी गलती मानकर स्वीकार कर के आगे बढ़ने की पहल शुरु की तो वहीं भारत में संविधान होते हुए भी देश को मनुस्मृति पर लाने की प्रयास किया दा रहा है। राजनैतिक पार्टियां अपनी अपनी जाति में बंटी है, जहां बराबरी की बल्कि ताकत की बात की जाती है।
जिसकी लाठी उसकी भैंस होगी। भारत में कभी इस बात को स्वीकार ही नहीं किया जायेगा कि जातिगत भेदभाव उनके साथ अन्याय था। क्योंकि मानसिकता ऐसी है कि वो उनका दायित्व था। दलितों को कभी भी मुख्यधारा का हिस्सा बनते हुए नहीं देखना चाहते है। ऐसे में नेपाल ने जो कदम उठाया वो भारत में केवल एक सुनहरा कल्पना मात्र की है। नेपाल ने जिस तरह से स्कूल कॉलेज राजनीति बैन की है.. उससे बच्चे वहां शिक्षा पर ध्यान देंगे, लेकिन ऐसा भारत में होता है तो कई राजनैतिक पार्टियों की तो दुकान ही बंद हो जायेगी।
विदेशी शिक्षा प्रणाली नेपाल में नहीं चलेगी
सबसे अच्छा कदम ये उठाया गया कि अब से विदेशी शिक्षा प्रणाली नेपाल में नहीं चलेगी.. पांचवी तक के बच्चो के इग्जाम नहीं होंगे.. पढ़ाई पढ़ाई की तरह होगी रेस की तरह नहीं.. लेकिन क्या ये भारत में हो सकता है जहां आज के समय में शिक्षा सबसे ज्यादा मुनाफा कमाने वाला व्यापार बन गया है।
हालांकि नेपाल का ये स्वीकार करना कि दलितों के साथ अन्याय हुआ है, एक बड़े बदलाव की निशानी है। भारत में ये बदलाव होना लगभग नामुमकिन है, क्योंकि यहां पर इस सच को स्वीकार करना ही नामुमकिन है, कि उनके साथ अन्याय हुआ है।
नेपाल का ये कदम बड़े बदलाव का इशारा है। हालांकि भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश में अगर बदलाव लाने की भी कोशिश होती है तो वो कहां तक सार्थक होगी.. .ये कहना मुश्किल है। वैसे हम आपसे पूछना चाहते है कि नेपाल ने जो कदम उठाया है..अगर भारत में ये उठाया जाये तो किन बदलावों को देखने को मिलेगा। क्या जातिवाद भारत से कभी खत्म हो सकता है.. ये भी बतायें।



