Ambedkar Jayanti 2026: 14 अप्रैल को संविधान शिल्पीकार बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की 135वी जयंति है.. और उसी के साथ केवल भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया के कई हिस्सों में बाबा साहब अंबेडकर की जयंति पर बड़ा आयोजन किया जा रहा है. बाबा साहब का योगदान वैसे तो केवल भारत में ही दिखा लेकिन उनके ज्ञान, दलितो के लिए उनका संघर्ष और आम लोगो के लिए जो लड़ाई उन्होंने लड़ी, उसने पूरी दुनिया में उन्हे एक प्रसिद्ध चेहरा बना दिया.. आपको जानकर हैरानी होगी कि पूरी दुनिया में केवल बाबा साहब अंबेडकर ही एक ऐसी शख्सियत है जिनकी सबसे ज्यादा मूर्ति और तस्वीरे लगी हुई है.. जो सबूत है कि बाबा साहब का केवल भारत की ही धरती पर नहीं विदेशी धरती भी बेहद सम्मान किया जाता है।
आजाद की मुहीम ने अमेरिका में काम किया
अनगिनत संस्थायें बाबा साहब के नाम पर दुनिया में पिछड़ो और दलितों के लिए लड़ाई लड़ रही है लेकिन भारत में ही बाबा साहब के लिए लड़ना मुश्किल हो गया है.. मगर भीम आर्मी चीफ चंद्र शेखर की एक मुहीन का असर अब अमेरिकी धरती पर भी साफ नजर आने लगा है। भारत में 14 अप्रैल को समानता दिवस के रूप में मनाने की लड़ाई का असर अब अमेरिका, कनाडा समेत कई पश्चिमी देशों में दिखाई दे रहा है। जी हां, आजाद की मुहीम ने अमेरिका में काम किया और अमेरिका के हर राज्य में मेयर को आदेश जारी किये गए है कि वो बाबा साहब अंबेडकर की जयंति को बड़े स्तर पर सेलीब्रेट करें। अमेरिका कनाडा में सरकार की तरफ से नोटिस जारी किया गया है कि 14 अप्रैल को सरकारी दफ्तरों और शैक्षणिक संस्थानों में छुट्टी की घोषणा की जायें।
अंबेडकर की अमेरिका यात्रा का असर
भारत में भीम आर्मी चीफ और आजाद समाज पार्टी कांशीराम के मुखिया चंद्र शेखर आजाद रावण इस वक्त भारत में दलितों और पिछड़ो का प्रमुख चेहरा बन चुके है, जो बाबा साहब के सम्मान के साथ साथ दलितों और पिछडो के हक की आवाज भी बुलंद कर रहे है. दलितों के लिए उनके योगदान के लिए बीते साल अंबेडकर जयंति के मौके पर उन्हें अमेरिका आमंत्रित किया गया था, जहां वो अंबेडकरवाद को बढ़ावा देने पहुंचे थे.. जिसका असर भी इस साल देखने को मिला।
अमेरिका के साथ साथ आजाद की इस मुहीम का असर यूके, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया में भी बड़े स्तर पर देखा जा रहा है। बाबा साहब की जयंति को समानता दिवस के रूप में मनाने की ये लड़ाई केवल भारत में ही नहीं अन्य देशों में भी व्यापक रंग ले चुकी है.. जो सबूत है कि विदेशों में भी बाबा साहब के संघर्षों को कितना सम्मान दिया जाता है।
जयंति को नेशनल फेस्टिवल के रूप में मनाने की अपील
आजाद ने संसद में भी बाबा साहब के जयंति को नेशनल फेस्टिवल के रूप में मनाने की अपील की है। बता दें कि अब तक देश में स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस और गांधी जयंति को राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाया जाता है, लेकिन आजाद ने दलील दी कि जिस व्यक्ति ने दलितों और पिछडो को न केवल सम्मान दिलाने की लड़ाई लड़ी, बल्कि सभी को बराबरी का हक दिया.. मजदूर हो या महिला.. आज सभी सम्मान से जी सकते है, उन्होंने एक ऐसा संविधान बनाया जिसे पूरी दुनिया सम्मान देती है.. ऐसी शख्सियत के जन्म दिवस को भी राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाया जाना चाहिए।
हालांकि पूरे देश में पक्ष हो या विपक्ष, सबकी अंबेडकर जयंति पर अपनी अपनी भव्य और विशाल तैयारी है, तो वहीं विदेशों में भी बड़े स्तर पर होने वाली तैयारी ने बता दिया है कि आखिर क्यों बाबा साहब अंबेडकर की जयंति एक ग्लोबली क्रांति है.. जो सही मायने में सबको एकजुट करने की ताकत बताती है। जो बाबा साहब के समानता और सम्मान के साथ जीवन जीने की अवधारना को और मजबूत करती है।
कमजोर और पिछड़ो तबको को मजबूत करने की लड़ाई
बाबा साहब के संघर्षों पर चर्चा तो होती है लेकिन उसे सम्मान कितना मिलता है, वो अंबेडकर की जयंति पर होने वाली तैयारी से साफ हो जाता है। आजाद की देश को ही नहीं बल्कि विदेशो में भी कमजोर और पिछड़ो तबको को मजबूत करने की लड़ाई एक बेहतर रूप ले चुकी है। ऐसे में देखना ये होगा कि क्या बाबा साहब अंबेडकर को लेकर आजाद की मुहीम क्या आगामी विधानसभा चुनावो में भी असर दिखायेंगी.. या फिर सरकार की तैयारियां आजाद के रंग को फीका कर देगी। वैसे आपको क्या लगता, क्या आजाद की मुहीम के बाद बाबा साहब अंबेडकर के सम्मान और दलितो के लिए बराबरी की लड़ाई और तेज हुई है।



