Supreme Court Verdict: बीते दिन दलित इसाइयों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। जिसमे कहा गया है कि ईसाई धर्म अपनाने वाले दलित नहीं माने जाएंगे उन्हें SC कैटेगरी की सुविधा नहीं मिलेगी। इतना ही नहीं अदालत ने कहा कि ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था को मान्यता नहीं दी जाती है; इसलिए, धार्मिक धर्मांतरण के बाद अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा समाप्त माना जाएगा।
Also Read: Top 5 Dalit news: दतिया में सरपंच पति के साथ दरिंदगी, घटना के बाद भी पुलिस के हाथ अब तक खाली
दलित इसाइयों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला
सरकार ने दलितों के लिए विभिन्न योजनाएँ और आरक्षण नीतियाँ लागू की हैं, जिनसे उन्हें समय-समय पर लाभ मिला है। वही दलित इसाइयों (Dalit Christians) के लिए सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने उन्हें कमजोर करने वाला फैसला सुनाया है। जी हां, 24 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर फैसला सुनाया है जिसमें ये कहा गया था ईसाई धर्म अपनाने के बाद भी उन्हें एससी एसटी एक्ट (SC/ST Act) के तहत मिलने वाले फायदे मुहैया कराये जाये। जिसे लेकर 24 मार्च को कोर्ट ने कहा कि केवल हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के लोगो को ही अनुसूचित जाति (Scheduled caste) का दर्जा और उसके फायदे मिलेंगे। इनके अलावा किसी भी धर्म को अपनाने वाला एससी एसटी कैटेगरी (SC/ST Category) में नहीं माना जायेगा।
पादरी ने धर्म परिवर्तन कर लिया तो किस बात का आरोप
जस्टिस पी.के. मिश्रा (Justice P.K. Mishra) और जस्टिस मनमोहन (Justice Manmohan) की बेंच ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट (Andhra Pradesh High Court) के मई 2025 में पादरी चिंताडा आनंद (Pastor Chintada Anand) के शिकायत दर्ज करवाई थी जिसमे उन्होंने बताया था कि अक्काला रामिरेड्डी ने उनके साथ जाति-आधारित अपमानजनक टिप्पणियाँ कीं और भेदभाव किया। वही आनंद की शिकायत पर कार्रवाई करते हुए, पुलिस ने SC/ST एक्ट के तहत FIR दर्ज की। जिसके खिलाफ आरोपी रामिरेड्डी ने FIR को रद्द करवाने के लिए हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की।
हाई कोर्ट ने मामले को ही रद्द किया
जहाँ आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने उस मामले में सुनाये फैसले को सही करार देते हुए कहा कि जब पादरी ने धर्म परिवर्तन कर लिया तो फिर वो किस आधार पर किसी पर जातिसूचक गालियां देने या अपमान करने का आरोप लगा रहे है। बता दें कि पादरी ने आरोप लगाया था कि कुछ लोगों ने दिसंबर 2020 में उन्हें जाति-आधारित गालियाँ दी थीं, जबकि वो मडिगा जाति से है.. हालांकि हाई कोर्ट ने इस मामले को ही रद्द कर दिया था तो वहीं सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद ये साफ हो गया कि दलित ईसाई जो आरक्षण जैसे लाभ को लेने के बारे में लड़ाई लड़ रहे थे वो लड़ाई हार गए है। ऐसे में देखना ये होगा कि दलित ईसाई लोग अब कौन सी नई दलील देते है अपना हक पाने के लिए।



