Caste-Based Movements: भारतीय समाज के दलितों को स्थिति को लेकर हमेशा जागरूकता फैलाने की बातें की जाती है, बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध ने जातिगत भेदभाव, छुआछूत को दूर करने और सबको समानता का संदेश देने के लिए एक नए धर्म बौद्ध धर्म की स्थापना की थी। हम सभी जानते की बौद्ध धर्म कितना महान होगा जिसे चक्रवर्ती सम्राट अशोक और महान समाज सुधारक दलितों के मसीहा कहलाने वाले बाबा साहब आंबेडकर ने भी अपने धर्म के रूप में चुना था।
हालांकि बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार के बाद भी भारत से कभी जातिवाद समाप्त नहीं हो सका, और पहली बार दलितों के अधिकारों के लिए 18वीं सदी में उठाई गई, जिसकी सफलत ने ही वाली दलित समुदाय को इस लिए प्रेरित किया कि अगर सम्मान चाहिए तो झुक कर नहीं आंखे मिलकर सामना करना पड़ेगा। जी हां अब तक दलितों के अधिकारों के लिए अनगिनत मूवमेंट किए गए है, अपने इस वीडियो में हम जाति आधारित आंदोलनों के बारे में जानेंगे जिन्होंने असल में में भारत में समानता, सम्मान और न्याय के लिए संघर्ष को एक नया रूप दिया था। जिसने दलितों को बताया को वो अछूत और बहिष्कृत नहीं बल्कि इसी देस के नागरिक है जिनके अधिकार समान है।। कोई छोटा या कोई बड़ा नहीं है।
सत्य शोधक समाज-जाति आधारित भेदभाव को चुनौती
18 वी सदी में पहली बार दलितों और महिलाओ को अहसास हुआ कि वो केवल गुलामी के लिए पैदा नहीं हुए है। उनकी भी अपनी पहचान बन सकती है… दलितों और महिलाओं में ये चेतना डालने वाले थे सत्य शोधक समाज संगठन (Satyashodhak Samaj Organization) के जरिए शिक्षा के महतव को समझाने वाले ज्योतिबाराव फूले। बचपन से जाति विरोधी व्यवस्था और महिलाओ के साथ होने वाले अत्याचार से तंग आकर उन्होंने पहली बार ब्राह्मणवादी विचारों को चुनौती दे दी थी। उनकी मेहनत काम कर गई और दलित और महिलायें शिक्षा का महत्व समझने लगे। कहा जाता है कि शूद्रों और बहुजनो को पहली बार दलित कहने वाले फूले ही थे। सत्य शोधक समाज ने न केवल जातिगत उत्पीड़न का विरोध किया था, बल्कि महिलाओं के अधिकारों, उनकी शिक्षा को भी बढ़ावा दिया था, जिसमें उनकी पत्नी सावित्री बाई फूले ने पूरा साथ दिया था।
जातिगत भेदभाव के खिलाफ द्रविड़ आंदोलन
2, द्रविड़ आंदोलन- तमिलनाडु में 20वीं शताब्दी के शुरुआत में जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न के खिलाफ पहली बार बिगुल बजा। इसके लिए वहां की दलित जनता ने दक्षिण भारत में ब्राह्मणवादी राजनीतिक वर्चस्व को खत्म करने की मांग रथी थी। द्रविड़ आंदोलन को पेरियार ई.वी. रामासामी नेतृत्व कर रहे थे, पेरियर ने समाजित और राजनीतिक ढांचा बदलने की मांग करते हुए राजनीति और शिक्षा के क्षेत्र में बड़े बदलाव लाने को कहा। धीरे धीरे ये आंदोलन पूरे भारत में फैल गया। लेकिन दक्षिण भारत में सामाजिक न्याय की वकालत करने को लेकर पेरियर ने कई छोटे बड़े आंदोलन किये। इस आंदोलन को आत्मसम्मान आंदोलन भी कहा जाता है। ये विचारधारा आज भी तमिलनाडु की राजनीति में मौजूद है।
शिक्षा के खिलाफ दलित आन्दोलन
3- दलित आंदोलन- बाबा साहब अंबेडकर ने जब शिक्षा हासिल करने के लिए विदेश की यात्रा की थी तभी उन्होने से दर्शा दिया था कि वो केवल दलितों के अधिकारों , उन्हें छुआछूत की सदियों पुरानी बेड़ियो से मुक्त कराना चाहते थे। इस कारण उन्होंने अमेरिका में गदर पार्टी में शामिल होने के प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया था। भारत में उनका महाड़ आंदोलन हमेशा याद किया जायेगा जो समाजिक बराबरी, शिक्षा का अधिकार, समानता का अधिकार लेने के लिए बाबा साहब ने 1927 में शुरु किया था।
पहली बार बाबा साहब ने बताया था कि सभी एक समान है और जाति व्यवस्था केवल कुछ खास लोगो द्वारा समाज के लोगों को दबाने के लिए शुरू की गई थी, जिसका विरोध बाबा साहब ने किया था। उन्होंने पहली बार दलितों के लिए समान सामाजिक दर्जा और राजनीतिक आरक्षण की मांग रखी थी, और जातिगत भेदभाव तो बढ़ावा देने वाले ग्रंथ मनुस्मृति को जला कर भेदभाव का कड़ा विरोध किया था. जिसने एक बड़ी क्रांति को जन्म दिया था।
मद्रास प्रेसीडेंसी न्याय आंदोलन – Madras Presidency Justice Movement
4, न्याय आंदोलन- मद्रास में बीसवी सदी की शुरुआत में मद्रास प्रेसीडेंसी में ब्राह्मणों के वर्चस्व को खत्म करने के लिए सीएम मुदलियार, टीएम नायर और पी त्यागराज चेट्टी ने 1916 में की थी.. जो आगे जा कर केवल का एक क्रांतिकारी आंदोलन बन गया। इस आंदोलन के तहत दक्षिण भारतीय लिबरल फेडरेशन की स्थापना हुई थी। केरल में न्याय आदोंलन का मुख्य उद्देश्य जातियों के एकीकृत गठन का समर्थन करते हुए उंती जातियों को उनकी शक्ति और सत्ता से गिराना था।
जिसका नेतृत्व श्री नारायण गुरु ने किया था, उन्होंने राज्य में महिलाओं के अधिकारों और राजनीतिक व्यवस्था में उनकी भागीदारी के लिए भी आवाज उठाई थी। ये आंदोलन इतना व्यापक था कि जनता सशक्त हुई और भेदभावपूर्ण प्रथाओं को खत्म करने के लिए कानून तक पारित करना पड़ा। ये आंदोलन सबूत है क जब भी उत्पीड़न की पराकाष्ठा हुई है तब तब जनता ने अधिकारो के लिए आवाज उठाई है.. औऱ केवल आंदोलन ही उन्हें न्याय दिला सकता है।



