Ambedkar life story: बाबा अंबेडकर ने अपना पूरा जीवन संघर्षों और अभावों में इसलिए गुजारा, ताकि उनका संघर्ष आगे की पीढ़ी के लिए मजबूती दे सकें। उनके चेहरे पर हमेशा एक शांत मुस्कान रहती थी.. औऱ उनकी गंभीरता किसी को भी झकझोर कर रख देने के लिए पर्याप्त थी, वो जानते थे कि उनका कमजोर पड़ना पूरे देश के दलितों और पिछड़ो को कई सौ साल पीछे फेंक देगा.. इसलिए वो तमाम दुख और तकलीफों को अपनी संघर्ष के आग में तपाते गए औऱ वो बन कर उभरे, जिसे दुनिया ने बाबा साहब भीम राव अंबेडकर के रूप में जाना, संविधान के शिल्पीकार के रूप में जाना, दलितो के मसीहा के रूप में जाना।
डॉ. भीमराव अंबेडकर का अनसुना संघर्ष
लेकिन क्या आप ये जानते है कि ऐसा कई बार हुआ जब बाबा साहब ने हार मान ली थी.. जब वो जातिगत भेदभाव के आगे टूटने लगे थे, लेकिन वो गिरते थे, कमजोर पड़ते थे, लेकिन फिर से खुद को मजबूत करके अपने लक्ष्य पर ध्यान देते थे कि उन्हें अपने लोगो को न्याय, समानता और सम्मान की जीवन देना है… उन्हें हार मानने का तो हक ही नहीं है.. मगर ऐसा एक बार हुआ जब बाबा साहब का संघर्ष इतना बढ़ गया कि वो एक पेड़ के नीचे बैठ कर फूट फूट कर रोये थे। जानते है कि क्या था वो कारण, जिसके कारण बाबा साहब जैसे चट्टान जी मजबूत शख्सियत भी टूट कर रो पड़ी थी।
पढाई लिखाई के बाद भी जातिगत भेदभाव का साया
बाबा साहब के जीवन से जुड़े कई किस्से आपने अब तक सुने होंगे, जब उन्हें महार जाति से होने के कारण बचपन में जातिगत भेदभाव झेलना पड़ा था, स्कूल में दाखिला लेने से लेकर स्कूर के अंदर जा कर भी कक्षा में न पढ़ने का वाक्य.. भीषण गर्मी में भी पियोन के न होने पर सुबह से शाम तक प्यासे रहना.. जैसी तमाम घटनाएं उनके साथ हुई थी..जिसे खुद बाबा साहब ने बताया था, लेकिन अंग्रेजी हुकुमत को देखकर वो ये समझ पाये कि केवल शिक्षा ही उन्हें सम्मान से जीवन दे सकती है। उन्होंने जी तोड़ मेहनत की, शूद्र होते हुए भी बड़ी जाति वालो को कांटे की टक्कर देने लगे। हालांकि पढाई लिखाई के बाद भी जातिगत भेदभाव का साया उनसे दूर नहीं हटा।
वो बड़ौदा रियासत के गायकवाड़ के यहा नौकरी करते थे, लेकिन वहां उनके खाने पीने तक के बर्तन तक अलग रखे हुए थे, जिसे खुद बाबा साहब को ही साफ करना पड़ता था, वो तब की सामाजिक व्यवस्था थी, पद कोई भी हो अगर जाति छोटी है तो सम्मान तो मिलने से रहा, लेकिन फिर भी बाबा साहब ने हार नहीं मानी.. वो और ज्यादा उच्च शिक्षा पाने के लिए पहले अमेरिका और फिर लंदन गए.. यहां बाबा साहब ने बिना जातपात के एक ऐसे समाज को देखा, जहां आपका टैलेंट देखकर आपको जज किया जाता था न की आप किस जाति में पैदा हुए है। मगर मास्टर और डबल पीएचडी की डिग्री भी तब काम नहीं आई जब वो अपने लिए एक आशियाना तक नहीं खोज सकें।
क्यों रोये बाबा साहब फूट फूट कर
दरअसल जब बाबा साहब लंदन में थे और अपनी पीएचडी पूरी कर रहे थे तब उनकी स्कॉलरशिप रूक गई, जिससे वो आधे में वापिस आ गए, मगर अनुबंध था कि वो बड़ौदा के रजवाड़े सयाजी गायकवाड़ के लिए काम करेंगे.. क्योंकि सयाजी गायकवाड़ ने ही उन्हें इसी शर्त पर छात्रवृत्ति दी थी। लेकिन विडंबना .ये थी कि इतनी शिक्षा हासिल करने के बाद भी जातिवाद ने उनका पीछा भारत में नहीं छोड़ा था.. गायकवाड़ का शानदार ऑफिस था, उन्हें मिलिट्री सेकेट्री का पद मिला था.. एक अधिकारी की तरह बाबा साहब का डेस्क था, लेकिन जब भी उन्हें फाइल चाहिए होती तो ऑफिस का चपरासी उन्हें फाइल दूर से फेंक कर देता था, जैसे बाबा साहब कोई इंसान नहीं कोई कूड़ादान हो.. जिनके छूने से चपरासी गंदा हो जायेगा।
पहचान छिपा कर एक पारसी सराय में कमरा लिया
लेकिन इससे भी बुरा तो तब हुआ जब बाबा साहब ने बड़ौदा रियासत में अपने रहने के घर ढूंढना शुरु किया। वो अनगिनत घरों में गए लेकिन सभी सबसे पहले उनसे उनकी जाति पूछते थे, यहां की मुसलमान समुदाय के लोगो ने भी उनकी जाति पूछी। बाबा साहब को घर नहीं मिला..लेकिन नौकरी तो करनी ही थी, उन्होंने चोरी छिपे अपनी जाति की पहचान छिपा कर एक पारसी सराय में कमरा किराये पर ले लिया.. लेकिन उसी दिन शाम को एक भीड़ उनके सराय के बाहर लाठी डंडा लेकर खड़ी थी जो लगातार ये चेतावनी दे रही थी कि वो इस कमरे को अभी के अभी खाली कर दें वर्ना मार दिये जायेंगे।
पेड़ के नीचे रोते रहे डॉ. अंबेडकर
बाबा साहब ने बिना किसी बहस के अपना सामान उठाया और सराय खाली कर सूनी सड़को पर चल पड़े। चलते चलते वो सयाजी बाग में पहुंचे, और एक पेड़ के नीचे बैठ गए। आज बाबा साहब की हिम्मत जवाब दे गई थी, वो फूट फूट कर रो पड़े.. और रोते रोते कहने लगे कि इतना शिक्षित होते हुए भी, एक अधिकारी होते हुए भी वो भेदभाव के कारण लावारिस की तरह पेड़ के नीचे पड़े है तो भला उन लोगो का क्या हाल होगा जो अशिक्षित है, गांवो में जातिगत भेदभाव का दंश झेल रहे है।
इतना पढ़ने लिखने के बाद भी क्या वो कभी जातिगत भेदभाव से दूर पायेंगे..लेकिन जी भर कर रोने के बाद बाबा साहब ने फिर से खुद को मजबूत किया औऱ तय किया कि अब उनकी लड़ाई पूरे सामाजिक अवधारना, सदियो से चली आ रही परंपरा और कुरितियों को दूर करके अपने साथ साथ दूसरो को भी बराबरी दिलाने की होगी..
ये था बाबा साहब का दलितो के मसीहा बनने की तरफ पहला कदम। भारत अब कुछ नया देखने वाला था… पहली बार दलित पिछड़ों को सही आजादी का मतलब समझ आने वाला था। बाबा साहब ने न केवल दलितो की स्थिति बदलने की नींव रखी बल्कि उन्होंने संविधान का निर्माण करके ये साबित किया कि वो सही थे, जाति से ऊपर आती है शिक्षा.. जिसके कारण ही वो संविधान निर्माता बने.. जिसने पूरे भारत का नसीब लिख दिया था। बाबा साहब का संघर्ष और उनका योगदान हमेशा अतुल्नीय है.. जिन्हें हर दलित आज सिर झुका कर प्रणाम करता है।



