Buddhist Wedding Ceremony: बौद्ध धर्म के बारे में अक्सर लोगो को गलतफहमी है कि बौद्ध धर्म को मानने वाले वैराग्य को मानते है, क्योंकि वो मोंक बन कर रहते है, खासकर बौद्ध धर्म के संस्थापक सिद्दार्थ गौतम ने खुद राजसी जीवन छोड़ कर वैराग्य को अपनाया था, और उन्होंने सत्य की खोज के बाद बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार करने के लिए बहुत से लोगो को जोड़ा… वहीं महान सम्राट अशोक के बौद्ध धर्म को अपना के बाद उनके दोनो बच्चे भी बौद्ध भिक्षु बन गए थे।
ऐसी कई कहानियां है जिसके कारण बौद्ध धर्म को वैराग्य से जोड़ कर देखा जाता रहा है, लेकिन सच्चाई ये नहीं है, बौद्ध धर्म को मानने वाले हमेशा भिक्षु ही नहीं बनते..बल्कि वो ग्रहस्थ जीवन जीते है, उनकी शादियां होती है, उनके परिवार होते है.. बस अन्य धर्मों की तरह इस धर्म में शादी के नाम पर प्रपंच नहीं होते है..बल्कि इस धर्म में शादियां भी दुल्हा दुल्हन और उनके परिवार की सहूलियत के अनुसार होते है.. शुभ मूहूर्त के नाम पर कोई रूढीवादी परंपरा थोपी नहीं जाती है। तो चलिए इस लेख में जानते है बौद्ध धर्म में होने वाली शादी की परंपरा के बारे में जानेंगे, कैसे होती है बौद्ध धर्म में शादी और कौन कौन से होते रिचुअल है।
कैसे होती है शादी की शुरुआत
बौद्ध धर्म में शादी करने के लिए वधु पक्ष और वर पक्ष के साथ साथ वर वधु की स्वीकृति जरूरी है, साथ ही शादी के दिन के लिए किसी भी शुभ मुहुर्त का नहीं बल्कि एक ऐसे दिन का सेकेक्शन होता है, जब नॉर्मली सबकी छुट्टी हो, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग वर वधु को आशिर्वाद देने पहुंचे, और कोशिश की जानी चाहिए कि शादी रात को 11 बजे से पहले ही हो जाये, ताकी सभी शादी के अंत कर मौजूद रहे।
वहीं बौद्ध धर्म में कहा जाता है कि शादी जैसे संस्कारों पर ज्यादा पैसा खर्च नहीं करना चाहिए..हालांकि लोग अपनी सहूलियत से करने लगे है, शादी अमूमन बौद्ध विहारों में की जाती है, लेकिन इसका कोई नियम नहीं है। घरों, मैरेज हॉल में भी शादी होती है, लेकिन वहां कुछ तैयारियां की जाती है.. ताकि वो स्थान कुछ समय के लिए बौद्ध विहार बन सकें।
शादी से पहले वर वधु की रिंग सेरेमनी होती है, जिसमें परिवार के साथ साथ रिश्तेदार भी होते है, जो इस बात के साक्षी होते है कि दो परिवारों ने रिश्ते की हामी भरी है। वहीं शादी के दिन दूल्हा दुल्हन को औऱ उनके परिवार को सफेद रंग के पोशाक पहनाने का रिवाज है, सफेद रंग शांति और सादगी का प्रतीक है।
कैसे होती है शादी की रस्में
अब बात करते है कि बौद्ध धर्म में शादी की रस्में कैसी होती है.. दरअसल बौद्ध विवाह संस्कार एक ही दिन का होता है, विवाह स्थल पर कुछ चीजो का होना अनिवार्य है, अगर बौद्ध विहार में शादी है तो कुछ चीजे रहती है लेकिन अगर घर में या किसी अन्य स्थान पर शादी होती है तो उसके लिए सबसे बुद्ध की सुंदर मूर्ति या चित्र होना चाहिए, जिनका एक ऊंचा आसान होना चाहिए, शादी में शामिल होने वाले भिक्खु संघ के लिए उचित आसान, सफेद रंग का कपड़ा, सफेद धागा, मोमबत्ती, अगरबत्ती, फूल और पीपल के ताजे पत्ते, धातु या मिट्टी का लोटा, जिसमें साफ पानी हो, और अपने क्षमता अनुसार मीठा भोज्य पदार्थ, जिसमें खीर या फल भी हो सकते है।
बौद्ध धर्म में कन्यादान जैसी कोई मान्यता नहीं
इसके बाद प्रार्थना शुरु होती है। सबसे शील ग्रहण होता है, जिसमें सभी वज्र आसान में बैठ कर भदवान बुद्ध को पंचाग नमस्कार करते है। इसके बाद पुष्प पूजा, धूप पूजा, सुगंधि पूजा, प्रदीप, चैत्य पूजा, बोधि वंदना, बुद्ध वंदना जिसमें बुद्ध, धम्म और संघ वंदना की जाती है, जिसके बाद समर्पण किया जाता है। बौद्ध धर्म में कन्यादान जैसी कोई मान्यता नहीं है, कन्यादान का मतलब ही होता है कि आप दान की हुई चीज पर कोई अधिकार नहीं कर सकते है लेकिन बौद्ध धर्म में ऐसा नहीं होता है, इसलिए यहां समर्पण विधि होती है।
कन्या भी समर्पण की विधि निभाती
जिसमें वधु के माता पिता लड़की का हाथ वर के हाथों में देकर प्रार्थना करने है और सबको साक्षी मानकर वर से कहते है कि उन्होंने अपनी बेटी की सारी जिम्मेदारी वर को दी, वो आशा करते है कि भविष्य में वो अपने सारे दायित्व को निभायेगा। इसके बाद कन्या भी समर्पण की विधि निभाती है, फिर वर भी उस समर्पण को स्वीकार करके आजीवन त्रिरत्न को साक्षी मानकर हमेशा के लिए वधु को अपनी पत्नी स्वीकार करने के लिए राजी होता है।
कन्या और वर पक्ष एक दूसरे 5 -5 वचन
जिस तरह से हिंदू धर्म में फेरे लेते समय में वचन लिये जाते है, वैसे फेरे लेने का कोई रिवाज बौद्ध शादी में नहीं होता है, हां कन्या और वर पक्ष एक दूसरे 5 -5 वचन देते है, जो कि बौद्ध धर्म का अनुसरण करते हुए गृहस्थ जीवन को पूरी जिम्मेदारी और इमानदारी से निभाने का वादा होता है। इसमें सिंदूर या मंगर सूत्र का कोई रिवाज नहीं होता है। हां, वचन देने के बाद भगवान बुद्ध के अर्पित की गई वरमलाये वर वधु को दी जाती है जो वो एक दूसरे को पहनाते है, जिसे भगवान बुद्ध का आशिर्वाद माना जाता है।
शादी के वक़्त महामंगल सुत्त का पाठ
इसके बाद महामंगल सुत्त का पाठ होता है। जोड़े के लिए समृद्धी,सुख, स्वास्थ्य जीवन की कामना की जाती है। महामंगल सुत्त के पाठ के बाद वहां आये सभी लोग वर वधु को आशीष देते है, और इस तरह से शादी संपन्न होती है। बौद्ध धर्म में कहा जाता है कि शादा असल में दिखावे का नहीं बल्कि दो लोगो को आजीवन एक साथ जोड़ने की विधि है, जिन्हें एक दूसरे को आत्मा से स्वीकार करना होता है। शादी जितनी सादगी और शांति ये हो उतना बेहतर है। हालांकि मौजूदा समय में लोगो ने अपने शौक से काफी बदलाव किये है, लेकिन शादी की विधि इन नियमों का पालन अनिवार्य है। बौद्ध शादी की जानकारी आपको कैसी लगी हमें कमेंट करके जरूर बतायें।



