Buddha and women power: क्या वास्तव में गौतम बुद्ध महिलाओं को संघ में शामिल करने के विरोधी थे?

Buddha
Source: Google

Buddha and women power:  बुद्ध यानि कि राजकुमार सिद्धार्थ.. जो बचपन से राजसी ठाटबांट से जिये थे, लेकिन जन्म के साथ ही सबसे पहले मां को खो दिया.. राजपुरोहितों ने भविष्यवाणी की थी कि बालक सिद्धार्थ या तो बहुत प्रतापी राजा बनेंगे या फिर वैरागी.. लाख कोशिशो के बाद भी पिता का डर जीत गया औऱ सोते हुए बेटे पत्नी को छोड़ कर वैरागी बन गए.. सालों तपस्या की, और तब जाकर ज्ञान मिला.. बुद्ध बनते ही सारनाथ गए और वहां भी अपने 5 अनुयायियों को ज्ञान दिया.. तब तक बुद्ध ने ये तय कर दिया था कि बौद्ध भिक्षु केवल पुरुष ही बन सकते थे।

. महिलाएं नहीं.. लेकिन उनकी ये जिद हार गई जब उनकी मौसी देवी महाप्रजापति गौतमी ने बुद्ध की शरण में आने की इच्छा जाहिर की। लेकिन बुदेध ने उनका सानिध्य कभी स्वीकार ही नहीं किया.. अब सवाल ये है कि आज बौद्ध भिक्षुणी को स्वाकार किया जाता है तो फिर बुद्ध के काल में महिलाओं को भिक्षुणी के रूप में स्वीकार करना इतना मुश्किल क्यों था। क्या बुद्ध महिलाओं के खिलाफ थे.. और कैसे गौतमी की जिद के कारण बुद्ध को झुकना पड़ा था।

बुद्ध और गौतमी का विवाद

बुद्ध ने जब बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार शुरु किया तब वो जानते थें कि बुद्ध का रास्ता कितना कठिन है। भिक्षु बनने के लिए, उनके ज्ञान के अनुसार चलने और बौद्ध भिक्षु बनने के बाद उनके कठिन नियमों को मानना सबके बस की बात नहीं थी, खासकर अपने परिवार, अपने बच्चों को हमेशा के लिए त्याग कर आगे बढ़ना महिलाओं के लिए तो आसान नहीं था।

महिलाएं जिसे समाज सदैव ममता की मूरत कहता रहा है, जो अपने पति और संतान के लिए अपना पूरा जीवन न्यौछावर करने के लिए तैयार रहती है, उसके लिए एक बौद्ध भिक्षुणी का जीवन जीना आसान नहीं थी, वहीं भिक्षु बनने के बाद घने जंगलो से गुजरना, मीलो यात्रा करना, साधना करना महिलाओ के लिए आसान नहीं था। इसिलए जब महाप्रजापति गौतमी कपिलवस्तु के द्वार पर बुद्ध से मिलने आई तभी उन्होंने पहली बौद्ध भिक्षुणी बनने की इच्छा जाहिर की थी, लेकिन एक सन्यासी के जीवन की कठिवाइयो को देखते हुए उन्होंने महिलाओं के भिक्षुणी बनने पर रोक लगा दी थी।

बुद्ध सदैव समानता चाहते थे

बौद्ध धर्म का सबसे मूल आधार की बराबरी ही है, जिसमें सभी एक समान है, जातपात के बंधनो से परे है। जहां बाकि सभी धर्मों में उंच नींच का भेदभाव व्याप्त रहा वहीं बौद्ध धर्म ने महिलाओं और पुरुषों को बराबरी का ज्ञान दिया। बुद्ध महिलाओ के भिक्षुणी बनने के खिलाफ थे, इसलिए नहीं कि महिलाएं भिक्षुणी पर मोक्ष नहीं पा सकती थी, बल्कि वो महिलाओं के प्रति चिंतित थे। एक भिक्षु का जीवन जीना आसान नहीं, और महिलाएं नर्म स्वाभावकी ममतामई भावनाओं से परिपूर्ण होती है, बुद्ध के लिए हर महिला पूजनीय है, जो सबके लिए अपने जीवन का बलिदान करती है, ऐसे बलिदान करने वाली महिला का अपमान करने का सवाल ही नहीं उठता है।

बुद्ध ने बताया महिला और पुरुष एक समान

बल्कि अपनी चिंता के कारण उन्होंने महिलाओं से दूरी बनाने की बात की थी। वहीं महिलाओं का होना पुरुषों के मन को विचलित कर सकता है, इसलिए जरूरी था कि महिलाओं और पुरुषों के रास्ते अलग अलग हो, लेकिन जब महाप्रजापति गौतमी ने बौद्ध भिक्षुणी बनने की इच्छा जाहिर की तो बुद्ध ने उनकी जिद को मान लिया और महिला बुद्ध संघ की शुरुआत की थी। हिंदू धर्म में जहां महिलाओं को पर्दे में रहने, घर की चारदीवारी के भीतर रहने की सीख दी जाती थी, वैसे समय पर बुद्ध ने बताया कि महिला और पुरुष एक समान है, और जिस तरह से ज्ञान की प्राप्ति करके पुरुष बौद्धत्व को प्राप्त कर सकते है वैसे ही महिलाएं भी अपनी साधना और कठिन तप से बुद्धत्व को पा सकती है।

सच्ची भक्ति और साधना का रास्ता

ये वो समय था जब समाज में महिलाओं को पढ़ाई-लिखाई की आज़ादी नहीं थी। औरतों के लिए पढ़ाई-लिखाई को कोई खास अहमियत नहीं दी जाती थी। उनकी धार्मिक आज़ादी पर भी रोक थी, ऐसे में बुद्ध ने महिलाओं को न केवल धार्मिक आजादी दी बल्कि उन्हें मोक्ष के रास्ते पर चलने का मार्ग बताया, जो कि अन्य धर्मों की तरह पति की सेवा करने जैसा दकियानूसी नही था। वो सच्ची भक्ति और साधना का रास्ता बताते। उन्हें जीवन के दुखों से, आडंबरो से निकल कर अपनी इच्छा अनुसार जीने और बिना रोक टोक भक्ति करने का मार्ग बताते थे। औरत को परिवार पर बोझ माना जाता था, वहीं बुद्ध ने महिलाओं को पुरुषों से भी ऊपर स्थान दिया था। बुद्ध ने पत्नी को शक्ति का रूप कहा था जो कि पति के बराबर स्थान रखती थी।

बौद्ध धर्म में भिक्षुणी संध में महिलाओं ने अपनी काबिलियत साबित की और बुद्ध का सानिध्य प्राप्त किया। धम्मदिन्ना, खेमा और उप्पलवन्ना ऐसी ही भिक्खुनी थीं, जिन्होंने ये साबित किया कि महिला भी बुद्धत्व को प्राप्त कर सकती है। बुद्ध कभी भी महिलाओं के खिलाफ थे ही नहीं बल्कि उन्होंने तो महिला विरोधी सामाजिक कुरितियों का विरोध कर उन्हें आजादी दिलाई थी। शायद इसीलिए ही आज भी बौद्ध धर्म सबसे महान धर्म माना गया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *