Lord Buddha Relics: पूरे भारत में बौद्ध धर्म के होने और उसके फलने फूलने के अब तक अनगिनत अवषेष मिले है। बुद्ध और बौद्ध धर्म के प्रतीक के रूप में स्तूप तो सबसे बड़ा और सत्य प्रमाण है, लेकिन अयोध्या, सारथान औऱ जगन्नाथ पुरी मंदिर जैसे कई प्रसिद्ध मंदिर है जहां कई ऐसे प्रमाण मिले है जो ये बताते है कि इन मंदिरों में कभी बौद्ध धर्म का प्रभाव मौजूद थी। हालांकि आज के समय में भारत में एक तरफ बौद्ध धर्म कमजोर धर्म हो चुका है तो वहीं भारत की धरती पर जन्म लेने के कारण सबसे ज्यादा बुद्ध के अवशेष भी भारतीय भूमि पर ही मौजूद है.. और अभी हाल ही में बुद्ध के जुड़े पवित्र देवनीमोरी अवशेष काफी चर्चा में है।
क्योंकि ऐसा पहली बार हुआ जब श्रीलंका के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधो के बढ़ावा देने के लिए भारत की तरफ से पवित्र देवनीमोरी अवशेष को फरवरी महीने में श्रीलंका की राजधानी कोलंबो के प्रसिद्ध बौद्ध गंगारामया मंदिर में एक सप्ताह तक सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए रखे गए थे। ये प्रदर्शनी 4 फरवरी से 11 फरवरी 2026 तक आयोजित की गई थी..जिसे अब वापिस भारत लाया गया है..ये पहली बार हुआ था जब देवनीमोरि अवशेष भारत के बाहर भेजे गए थे.. अपने इस वीडियो में जानेंगे कि आखिर क्यों भारत से बाहर गए थे ये अवशेष..और क्या है बुद्ध से जुड़ा इन अवशेषों का इतिहास।
क्या है देवनिमोरि अवशेष
देवनिमोरि अवशेष, दरअसल गुजरात के अरावली जिले के शामलाजी में 1957 से लेकर 1963 तक किये गए उत्खनन के दौरान प्राप्त हुआ था। इस स्थान पर बौद्ध धर्म के अवशेष होने के कई साक्ष्य मिले थे, जिसके बाद उत्तखनन शुरु हुआ था..इस दौरान वहां बुद्ध के पवित्र अस्थि अवशेष मिले थे, साथ ही यहां एक हरे रंग की सिस्ट पत्थर की पेटिका यानि की कास्केट प्राप्त हुआ था, जिसपर ब्राह्मी और संस्कृत में लिखा है दशबल शरीर निलय..यानि कि बुद्ध के शरीर के रहने का स्थान..इसी के साथ यहां एक ताबें का बक्सी मिला था, जिसमें पवित्र राख, रेशमी कपड़ा औऱ मोती भी प्राप्त हुए.. इसकी जांच की गई तो ये तीसरी से चौथी शताब्दी के पाये गए।
शामलाजी संग्रहालय और बड़ौदा संग्रहालय
हालांकि तब से ये गुजरात में ही शामलाजी संग्रहालय और बड़ौदा संग्रहालय एवं चित्र दीर्घा में सुरक्षित रखा गया है। देवनी मोरी में बौद्ध मठो के होने के प्रमाण है जो कि पक्के ईंटो से बनाये गए थे, साथ ही ये उत्तर-पश्चिमी स्थलों जिसमें कालवान, तक्षशिला क्षेत्र या धर्मराजिका में बनाये गए पैटर्न के विहार है जिसमें प्रवेश द्वार के ठीक सामने एक प्रतिमा-कक्ष बनाया जाता था। साथ ही देवनीमोरी विहार में आवासीय गुफाएँ भी मिली है जिनमें पानी के कुंड भी बने हुए मिले, ये बिल्कुल जूनागढ़ के ऊपरकोट में पाए पैटर्न को फॉलो करते है। इन अवशेषों को बुद्ध की अस्थियों के रूप में पूजी जाता है, जिनका बौद्ध धर्म के लिए बेहद महत्व है।
प्रदर्शनी की कारण
दरअसल श्रीलंका एक बौद्ध बहुल देश है, वहीं भारत के साथ उसक संबंध काफी मधुर है लेकिन बीच में वहां हुए गृहयुद्ध के कारण काफी अशांति फैली थी.. जिसे लेकर अप्रैल 2025 में भारत के प्रधानमंत्री ने दोनो देशो के बीच शांतिवार्ता को लेकर श्रीलंका की यात्रा की थी। जहां ये तय किया गया कि भारत की साझा बौद्ध विरासत को श्रीलंका में भी प्रदर्शित किया जायेगा..ताकि शांति और करूणा का संदेश को बढ़ावा मिले। इसी कड़ी में फरवरी 2026 में देवनिमोरी अवशेषों को श्रीलंका भेजा गया था.. जिन्हें अब मध्य प्रदेश के राज्यपाल मंगुपाल पटेल और अरूणाचल प्रदेश के उपमुख्यमंत्री चोवनी मील समेत कई उच्च स्तर के भारतीय प्रतिनिधि मंडल के सदस्य मिलकर वापिस भारत लाये है।
भारत और श्रीलंका के बीच एक मैत्रीपूर्ण रिश्ते
इन पवित्र अवशेषों के श्रीलंका में प्रदर्शनी के दौरान करीब 10 लाख लोगो ने दर्शन किये थे… जो कि अपने में ही एक बड़ा रिकॉर्ड है। भारत और श्रीलंका के बीच एक मैत्रीपूर्ण रिश्ते को बढ़ावा देने के लिए ये कदम बेहद उपयोगी माना जा रहा है। इन प्रदर्शनी में प्रदर्शनी में श्रीलंका के प्रधानमंत्री, कैबिनेट मंत्री, संसद सदस्य, पूर्व राष्ट्रपति समेत कई वरिष्ठ श्रीलंकाई नेताओं ने भी पवित्र अवशेषों के दर्शन किये है। श्रीलंका में बौद्ध धर्म का क्या महत्व है, वो इन अवशेषों के लिए दर्शन के लिए आये श्रद्धालुओं की संख्या देखकर ही अंदाजा लगा सकते है, साथ ही ये संकेत है कि आने वाले भविष्य में श्रीलंका और भारत के बीच व्यापारिक हो या राजनैकित रिश्ते सभी मैत्रीपूर्ण और मजबूत होंगे।



