BNS Section 308: क्या है जबरन वसूली और इसके लिए क्या है कानून?

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308 BNS in Hindi: अक्सर हम अखबारों में हैं और अपने आस-पास भी ज़बरदस्ती वसूली के कई मामले देखते हैं जहाँ तकताक्वर व्यक्ति ज़बरदस्ती करके या फिर उसके साथ मारपीट करके वसूली करता है। तो ऐसे मामले में BNS की कौन की धारा लगती है। और ऐसे मामले में किस तरह की सज़ा होगी?  तो आपको बता दें, ऐसा करने पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 308 लागू होती है। तो चलिए आपको इस लेख में बताते हैं कि ऐसा करने पर कितने साल की सजा का प्रावधान है और बीएनएस (BNS) में इसके के बारे में क्या कहा गया है।

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धारा 308 क्या कहती है? BNS Section 308 in Hindi

जैसा कि आप जानते हैं कि अलग-अलग धाराओं में अलग-अलग अधिनियम और दंड हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि बीएनएस (BNS) की धारा 308 क्या कहती है, अगर नहीं तो आइए जानते हैं। भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 308 मुख्य रूप से धोखे से या जबरन वसूली करने वाले पर लागू होती है। वही एक्सटॉर्शन तब होता है जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति या खुद को नुकसान का डर दिखाकर बेईमानी से प्रॉपर्टी, कोई कीमती सिक्योरिटी, या साइन किया हुआ डॉक्यूमेंट (जिसे किसी कीमती चीज़ से बदला जा सकता है) देने के लिए उकसाता है।

BNS 308 Important Points

  • यह कानून स्क्रीनशॉट, चैट लॉग या रिकॉर्डेड कॉल का इस्तेमाल करके ब्लैकमेल करने वालों पर भी लागू होता है।
  • अपराधी का इरादा और पीड़ित को डराने की धमकी ज़रूरी है। प्रॉपर्टी का ट्रांसफर सफल हो, यह ज़रूरी नहीं है; सिर्फ़ धमकी भी अपराध है।

बीएनएस धारा 308 का उदहारण 

For Example: मान लीजिए कोई व्यक्ति किसी महिला का वीडियो बनाता है या उसकी फोटो खींचता है और उसे ब्लैकमेल करता है और जबरदस्ती पैसे मांगता है, तो इस मामले में अपराधी के खिलाफ यह सेक्शन लगाया जा सकता है।

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बीएनएस धारा 308 की और सजा

इसके अलावा, क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (CrPC) के सेक्शन 308 में दोषी पाए जाने पर सज़ा का प्रावधान है। यह तब लागू होता है जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति से प्रॉपर्टी चुराता है या धोखे से लेता है। इस सेक्शन के तहत, अपराधी को सात साल तक की साधारण जेल और जुर्माना हो सकता है। गंभीर मामलों में, सेक्शन 308 (2) के तहत, अगर जान से मारने या गंभीर शारीरिक नुकसान पहुंचाने की धमकी दी जाती है, तो सज़ा 10 साल तक की जेल और जुर्माना है। इसके अलावा, यह एक नॉन-कॉग्निजेबल अपराध है, इसलिए पुलिस को जांच के लिए मजिस्ट्रेट की इजाज़त चाहिए होती है। इस अपराध के लिए ज़मानत मिलना भी बहुत मुश्किल है।

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