Ghaziabad-Kanpur crime news: भारत में दुष्कर्म के मामलों के आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की नवीनतम ‘क्राइम इन इंडिया’ रिपोर्ट (2023-24) के अनुसार, भारत में औसतन हर दिन 81 से 87 दुष्कर्म के मामले दर्ज किए जाते हैं। इसका अर्थ है कि हर 17 से 18 मिनट में एक महिला इस हैवानियत का शिकार होती है।
सवाल सिर्फ उस दरिंदे का नहीं, बल्कि उस दूषित सोच का भी है जो आज भी हर हाल में पीड़िता के चरित्र में ही खोट ढूंढती है। और यह कोई इकलौता मामला नहीं है, ऐसे अनगिनत जख्म हैं जो सुर्खियों तक भी नहीं पहुंच पाते, वरना हकीकत तो यह है कि हर घंटे देश की कोई न कोई बेटी इस दरिंदगी का शिकार हो रही है।
देश की कानून व्यवस्था पर सवाल
दूसरा सवाल प्रशासन से है क्या यही हमारे देश की कानून व्यवस्था है, जहां बेटियां ऐसे ही हैवानों का शिकार होती रहेंगी? इन दरिंदों के मन में कानून का खौफ खत्म हो चुका है। विडंबना देखिए, कल से शारदीय नवरात्रि शुरू हो रही है, जहां नौ दिनों तक कन्याओं को देवी मानकर पूजा जाएगा, लेकिन क्या सड़क पर चलती या घर में खेलती उसी ‘देवी’ की सुरक्षा की गारंटी यह समाज दे सकता है? क्यों हम सिर्फ कैलेंडर की तारीखों पर सम्मान दिखाते हैं, जबकि हकीकत में बेटियां असुरक्षित हैं?
चाहे दिल्ली एम्स की वह महिला डॉक्टर हो, कानपुर की 11 साल की बच्ची या गाजियाबाद की 4 साल की मासूम इनका कसूर आखिर क्या था? बस इतना कि ये लड़कियां थीं? हम कहते हैं कि ‘ज्ञान अंधकार को मिटाता है’, लेकिन यह बात अब बेमानी लगती है। जब समाज का सबसे शिक्षित वर्ग (डॉक्टर), जिस पर जान बचाने की जिम्मेदारी होती है, वही अपने ही सहकर्मी के साथ ऐसी घिनौनी हरकत (पार्टी के दौरान) करे, तो शिक्षा और भरोसे पर से विश्वास उठने लगता है।
हैवानियत का शिकार हुई दलित बच्ची
उस 11 साल की बच्ची की क्या गलती थी, जो अपनी बहन के साथ खेत में बकरी चराने गई थी? महज़ कुछ मिनटों के लिए जब उसकी बहन घर गई, उसी बीच वह हैवानियत का शिकार हो गई। वहीं, गाजियाबाद की वह 4 साल की मासूम तो सुरक्षित समझी जाने वाली अपने घर की दहलीज पर खेल रही थी। न खेत सुरक्षित हैं, न घर के आंगन और न ही किसी सहकर्मी या दोस्त का साथ। दरिंदगी की अब कोई सीमा नहीं बची है।
आज हम उस समाज में सांस ले रहे हैं जहां कहने को तो सब एक ही पायदान पर खड़े हैं, लेकिन हकीकत यह है कि सबको एक तराजू में नहीं तोला जाता। हम विज्ञान के दम पर चांद तक तो पहुंच गए, लेकिन पीछे मुड़कर देखते हैं तो वही घिनौनी और रूह कंपा देने वाली वारदातें सामने खड़ी मिलती हैं। अक्टूबर 2025 में दिल्ली एम्स की एक महिला डॉक्टर के साथ हुई हैवानियत ने एक बार फिर सबको स्तब्ध कर दिया है। पुलिस ने मामले में केस दर्ज कर लिया है और कानूनी शिकंजा कसता जा रहा है। हालांकि, न्याय की धीमी प्रक्रिया और रसूख के बीच पीड़िता अब भी इंसाफ की आस में दर-दर भटक रही है।
पड़ोसी ने टॉफी दिलाने के बहाने अगवा किया
वहीं, 18 मार्च 2026 में कानपुर की 11 साल की बच्ची के साथ जो हुआ, उसकी दास्तां उसका शव चीख-चीख कर बयां कर रहा है। उसके साथ एक नहीं, बल्कि 3 लोगों ने दुष्कर्म किया, जिसके बाद उसका गला दबाकर उसकी हत्या कर दी गई। इसके बाद उसे निर्वस्त्र अवस्था में खेत में गड्ढा खोद कर दफना दिया गया, पोस्टमार्टम में उसके शरीर पर 10 से ज्यादा चोटों के निशान मिले हैं। पुलिस अभी मामले की तहकीकात कर रही है। इसके साथ ही, 16 मार्च 2026 की शाम को गाजियाबाद के नंदग्राम इलाके में अपने घर के बाहर खेल रही 4 साल की उस दलित मासूम को पड़ोसी ने टॉफी दिलाने के बहाने अगवा किया और उसके साथ दरिंदगी की।
नन्हीं सी जान के शरीर पर 11 जगहों पर गहरे घाव
हैवानियत की इंतहा देखिए, दुष्कर्म के बाद बच्ची के सिर पर ईंट से वार कर उसकी निर्मम हत्या कर दी गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उस नन्हीं सी जान के शरीर पर 11 जगहों पर गहरे घाव मिले हैं, जो उस वक्त की चीख और तड़प को बयां कर रहे हैं। कानपुर से लेकर गाजियाबाद और दिल्ली के आलीशान अस्पतालों तक, दरिंदगी का यह सफर थमने का नाम नहीं ले रहा।
सवाल यह है कि क्या हमारा कानून इन हैवानों के मन में वो खौफ पैदा कर पाएगा जिससे किसी और मासूम की चीख न गूंजे? कल से नवरात्रि का उत्सव शुरू होगा, पूरा देश ‘नारी शक्ति’ की जय-जयकार करेगा। लेकिन क्या हम उन बेटियों को वो सुरक्षित समाज दे पाएंगे जिनकी मुस्कान इन दरिंदों ने छीन ली? वक़्त आ गया है कि हम सिर्फ मोमबत्तियां न जलाएं, बल्कि उस सड़ी-गली मानसिकता को जलाएं जो आज भी बेटियों को सिर्फ एक वस्तु समझती है।



