Dalit IAS Officer Case: 2009 के घोटाले से लेकर अब तक भेदभाव की वो कहानी जिसने IAS राही को इस्तीफा देने पर किया मजबूर

IAS Rinku Singh Rahi
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Dalit IAS Officer Case: हाल ही में दलित आईएएस रिंकू सिंह राही को लेकर हैरान और परेशान करने वाली खबर सामने आई है। भ्रष्टाचार और जातिगत भेदभाव से तंग आकर इस्तीफा देने वाले दलित अधिकारी का मामला अब सीधा देश की राष्ट्रपति तक पहुंच रहा है। रिंकू सिंह ने अधिकारी रिंकू सिंह राही ने वर्ष 2009 में छात्रवृत्ति घोटाले का खुलासा किया था, लेकिन उसके बाद से ही वो निशाने पर आ गाए थे।

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100 करोड़ के घोटाला का पर्दाफाश

दलित समुदाय से आने वाला एक ऐसा IAS ऑफिसर जिसने भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने पर 7 गोलियां खाई, जिससे उनकी एक आंख चली गई, जबड़ा खराब हो गया, लेकिन हौसला नहीं टूटा, ये कहानी है उत्तर प्रदेश के जांबाज अधिकारी रिंकू सिंह राही की…रिंकू अलीगढ़ के रहने वाले हैं, नौरंगाबाद क्षेत्र स्थित डोरी नगर में उनका घर है, प‍िता आटा-चक्की चलाते थे हर कदम पर संघर्ष था, लेकिन रिंकू का लक्ष्य बड़ा था उन्होंने 2004 में UP PCS पास किया और समाज कल्याण अधिकारी बने…साल 2009 में मुजफ्फरनगर में रहकर उन्होंने 100 करोड़ के घोटाला का पर्दाफाश किया, इसका अंजाम क्या हुआ?

IAS के पद से इस्तीफा दिया

र‍िंकू पर हमलावरों ने ताबड़तोड़ फायरिंग की और उन्होंने अपनी एक आंख की रोशनी गंवा दी, लेकिन वो नहीं रुके इतने बड़े हादसे के बाद उन्होंने UPSC की तैयारी की और IAS बने, अभी हाल ही में, शाहजहांपुर में एसडीएम रहते हुए एक विवाद के बाद उन्होंने उठक-बैठक लगाई थी, जिसका वीडियो वायरल हुआ था, जिसके बाद उन्हें राजस्व परिषद से संबद्ध किया गया. कई महीनो तक काम न मिलने पर उन्होंने ‘नो वर्क नो पे’ के आधार पर वेतन लेने से इनकार कर दिया. और 31 मार्च को IAS के पद से इस्तीफा दे दिया.

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मुफ्त की सैलरी लेना मंजूर नहीं

उनके पिता ने कहा ‘बेटे को काम नहीं मिल रहा था, और मुफ्त की सैलरी लेना उसे मंजूर नहीं था’ 7 गोलियां खाने वाला शरीर तो नहीं टूटा, लेकिन शायद सिस्टम की बेरुखी ने एक ईमानदार दिल को तोड़ दिया, वहीं ये मुद्दा अब तूल पकड़ चुका है, दलित संगठनो ने राष्ट्रपति मुर्मू से गुहार लगाई है कि रिंकू का इस्तीफा नामंजूर करें, और उनके लगाए आरोपों की निष्पक्ष जांच की जाए. हैरानी की बात है दलित होने के कारण एक ऊंचे पद पर बैठे व्यक्ति को भी प्रताड़ित करने से बाज नहीं आते हैं, तो भला मासूम गरीब पिछड़ों को कहां से न्याय मिलेगा, क्या हमारे सिस्टम में अब ईमानदारी की कोई जगह बची है.

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