UP Upcoming Elections 2026: साल 2027 है करीब.. और भारत के सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य श्रीराम और श्रीकृष्ण की नगरी उत्तर प्रदेश में होने वाले है विधानसभा चुनाव.. विकास के मुद्दों पर, लुभावने वादों के मुद्दे पर तो काफी बहस होती ही है लेकिन इस बार एक मुद्दा सबसे ज्यादा उछल रहा है.. और वो है अबेंडकरवाद.. जी हां, एक तरफ सपा बसपा जैसी पार्टियां दलितो को साधने के लिए बाबा साहब के नाम का सहारा ले रही है तो वहीं सत्तारूढ़ बीजेपी ने भी कई बड़े दाव खेल दी है.. अभी हाल ही में खबर आई थी कि यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने बाबा साहब की मूर्तियों के सौंदर्यीकरण और उनकी देखभाल के लिए सीसीटीवी कैमरा लगाने के लिए 403 करोड़ रूपय का आवंटन किया है।
चुनाव आते ही ‘दलित प्रेरणा स्थल’ की याद
वहीं नोएडा अथॉरिटी ने भी नोएडा में बने दलित प्रेरणा स्थल की मरम्मत और रखरखाव के लिए 107 करोड़ 77 लाख रुपये खर्च करने की मंजूरी दे दी है। यानि की बीजेपी भी अब राज्य की 22 प्रतिशत दलित वोटर्स को साधने में लगी है। जाहिर सी बात है कि बीते साल हुए बिहार विधानसभा चुनावों में दलित कार्ड ने काफी धमाल मचाया था..और बीजेपी को इससे काफी फायदा भी हुआ था.. लेकिन सवाल ये है कि क्या सेम दाव यूपी में काम करेगा। अपने इस लेख में हम जानेंगे कि आखिर क्यों अब बीजेपी में अंबेडकरवाद जोर मार रहा है। क्या होगा फायदा या होगा नुकसान।
राज्यव्यापी स्वच्छता अभियान चलाने का फैसला
14 अप्रैल को बाबा साहब भीम राव अंबेडकर की 135वी जयंती है, जाहिर है कि दलित संगठन हो या राजनैतिक पार्टी बाबा साहब का नाम लेकर दलितो पिछड़े जनसंख्या को लुभाने की पुरजोर कोशिशें करेगी .. लेकिन इसमें ज्यादा हैरान करता है बीजेपी का दांव.. दरअसल 2020 में ही नवनिर्वाचित आजाद समाज पार्टी की तरफ से बाबा साहब की जयंती के मौके पर कार्यक्रम करने की परमिशन न मिलने को लेकर विवाद जारी है तो वहीं बीजेपी ने यहां बाबा साहब की जयंति का फायदा उठाते हुए 13 अप्रैल को बाबा साहब अंबेडकर, संत रविदास, वाल्मिकी जी से जुड़े स्थलों पर राज्यव्यापी स्वच्छता अभियान चलाने का फैसला किया।
जरा गौर किजिये.. नाम बाबा साहब का.. और प्रचार स्वच्छता अभियान का.. ऑफ्कोर्स ये अभियान चलाने वाले कौन.. बीजेपी के कद्दावर नेता.. और देश के पीएम नरेंद्र मोदी.. मतलब दलितों को खुश भी कर दिया और बीजेपी का प्रचार भी। इतना ही नहीं यूपी के सभी अबेंडकर स्मारकों में ‘पुष्पांजलि’ कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। ताकि ये दिखाया जा सकें कि बीजेपी की नजरों में बाबा साहब का स्थान केवल मसीहा भर नहीं है बल्कि वो एक भगवान की तरह के है जिनकी पुष्पांजलि करके पूजा की जा रही है।
आजाद पर आरोप और दलित वोट बैंक की सेंध
भीम आर्मी चीफ, नगीना से सांसद और आजाद समाज पार्टी कांशीराम (Azad Samaj Party (Kanshi Ram) के संस्थापक चंद्र शेखर आजाद पर उनकी कथित एक्स प्रेमिका रोहिणी घावरी कई बार संगीन आरोप लगा चुकी है कि उन्हें राजनीति में लाया ही इसलिए गया है ताकि वो दलित नेता होने का चोला पहन कर समाजवादी पार्टी (SP) और बहुजन समाज पार्टी (Bahujan Samaj Party) के वोट को काट सकें.. जिसका फायदा बीजेपी को ही होना है।
प्रेरणा स्थल के लिए खोला खजाना
यूपी की पूर्व सीएम और दलितों की नेता बहन मायावती ने करोड़ो रूपय पैसे खर्च करके दलित प्रेरणा स्थल बनवाया था..जिसके लेकर बीजेपी ने हमेशा मायावती को घेरा है, लेकिन अब जब चुनाव नजदीक आने वाले है तो बीजेपी ने अपने चुनाव लड़ने का एजेंडा ही बदल दिया। बीजेपी दलितों के मसीहाओं का सम्मान करने के नाम पर ‘ अपने देश विकास’ और ‘कट्टर राष्ट्रवाद’ के एजेंडे को भी इसी के साथ जोड़ कर पेश करने में लगी है।
स्मारको के कारण सपा की हुई थी किरकिरी
बसपा सुप्रीमों मायावती ने सपा पर हमेशा से इन स्मारको की अनदेखी करने का आरोप लगाया.. जिसके कारण सपा को दलितों की नाराजगी भी झेलनी पड़ी थी, तो वहीं सपा को अनदेखी करने का आरोप झेलना पड़ा और सरकार हाथ से निकल गई,. लेकिन 2024 में सपा ने फिर से वापसी की पीडीए फॉर्मिले से.. अखिलेश यादव के विनिंग फार्मूले ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) को एक साथ लेकर चलने का वादा उन्हें फायदा पहुंचाने वाला निकला था.. जिसके कारण लोकसभा चुनाव में बीजेपी को काफी भारी नुकसान झेलना पड़ा था। ऐसे में बीजेपी काफी फूंक फूंक कर कदम रख रही है.. और यूपी के 22 प्रतिशत दलितो को साधने के लिए दलितों के सम्मान से बड़ा क्या ही कदम हो सकता है।
अंबेडकरवाद बीजेपी के लिए मील का पत्थर साबित होगा
हालांकि ये बेहद हास्यस्पद है कि यूपी दलितों के साथ अत्याचार के मामलों में टॉप 3 में शामिल है.. लेकिन बावजूद इसके बीजेपी हर हाल में उनके वोट को अपने पाले में लाना चाहती है। ऐसे में सोचने वाली बात है कि क्या बीजेपी की ये चाल काम करेगी। दलित महापुरुषों के प्रति बीजेपी का ये सम्मान उन्हें कितना फायदा पहुंचायेगा..अंबेडकरवाद बीजेपी के लिए मील का पत्थर साबित होगा या नहीं.. ये तो चुनाव के नतीजो के बाद ही पता चलेगा लेकिन ये तो तय है कि बीजेपी का ये कदम बताता है कि उन्हें भी बखूबी पता है कि दलितों को साधे बिना बीजेपी फिर से वापसी तो नहीं करने वाली.. वैसे आप क्या सोचते है.. क्या सपा बसपा या आसपा से बंटने से दलित वोट बैंक नहीं बटेंगे.. और किसे होगा इसका फायदा।



