भारतीय न्याय संहिता (BNS) क्या है? आसान भाषा में समझें कानून के बड़े बदलाव

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जब बाबा साहब अंबेडकर ने भारत के संविधान को बनाना शुरु किया था तब उन्होंने 10 देशो के संविधान को मिलाकर भारत का संविधान तैयार किया था जिसमें उन्होंने कानूनी प्रावधान ब्रिटेन के संविधान से लिया था, जो कि ब्रिटिश औपनिवेशिक काल 1880 के समय तैयार किया गया था। बाबा साहब ने खुद लंदन से लॉ की पढ़ाई पूरी की थी इसलिए वो ब्रिटेन के कानून को बखूबी समझते थे और भारतीय दंड संहिता को  जारी रखा, लेकिन साल 2024 में केंद्र की मोदी सरकार ने भारतीय कानून व्यनस्था में बड़ा बदलाव किया।

दिसंबर 2023 में संसद में प्रस्ताव लाया गया कि  इंडियन पीनल कोड (IPC), कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर (CrPC) और इंडियन एविडेंस एक्ट (IEA) में बड़ा बदलाव लाने का प्रस्ताव पास किया गया और करीब 160 साल पुराना औपनिवैशिक काल का कानून बदल दिया गया और 1 जुलाई 2024 को लागू हुआ भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA)।

क्या है भारतीय न्या संहिता- इंडियन पीनल कोड की जगह अब BNS यानि भारतीय न्याय संहिता, 2023 का इस्तेमाल शुरु हो गया। इसी के साथ कुछ धाराओं को जोड़ा गया तो कुछ को मर्ज कर दिया गया। जहां पहले आईपीसी में 511 धारायें थी वहीं अब बीएनएस में 20 अध्याय और 358 धारायें ही रखी गई है। इसी के साथ नए धाराओं को जोड़ा गया जिसमें आतंकवाद के लिए धारा 111, धोखे से किसी महिला के साथ यौन संबंध बनाने के लिए धारा 69, संगठित होकर अपराध करने, जिसमें लिंचिग जैसे मामले शामिल है उसके लिए धारा 109 जैसे धाराओं को गंभीर अपराध की श्रैणी में रखा गया है।

वहीं पहली बार चोरी करने, उपद्रव करने के लिए सजा के तौर पर अब से आरोपियो को सामुदायिक सेवा देने का प्रावधान बनाया गया। साथ ही बीएनएस में देशद्रोह कानून को खत्म कर दिया गया और धारा 150 जोड़ा गया जो भारत की एकता और संप्रुभता को खत्म करने या खतरे में डालने के अपराध को लेकर कानूनी प्रावधान है। इसके अलावा महिला और बच्चों की सुरक्षा के मामले में कानून को और सख्त कर दिया गया है। खासकर नाबालि से दुष्कर्म के मामले में सजा ए मौत, उम्र कैद और कठोर सजा का प्रावधान लागू किया गया।

वहीं अब भारतीय दंड संहिता  के बजाय भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता का इस्तेमाल होने लगा, जहां  भारतीय दंड संहिता में 484 धाराएं थीं, तो वहीं भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में  531  धारायें है। वहीं बीएनएसएस के अनुसार अब से अधिकतम सजा काट चुके कैदी को प्राइवेट बॉन्ड पर रिहा किया जा सकेगा।  पीड़ित कहीं भी जीरो एफआईआर कर सकता है और 15 दिनों के भीतर  मूल ज्यूरिडिक्शन यानी जहां अपराध हुआ है, वहां मामले को ट्रांसफर करना अनिवार्य है, साथ ही 120 दिनो के अंदर किसी भी सरकारी अधिकारी पर मुकदमा चलाया जायेगा, अगर ऐसा नहीं होता तो वो भी कानून के खिलाफ एक्शन माना जायेगा।

मामला दर्ज कराने के 90 दिनों के भीतर चार्जशीट दायर करने और 60 दिनों के अंदर अदालत को आरोप तय करने का प्रावधान बनाया गया। वहीं पीड़ित और पीड़ित परिवार को राहत देते हुए उन्हें ये अधिकार दिया गए है कि वो जांच अधिकारी से अपने मामले की जानकारी कभी भी ले सकता है, उससे वो जागरूक रहेंगे कि उनका मामला कहां तक पहुंचा। अब से  गवाहों के बयान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये भी लिये जायेंगे, जिसके लिए लक्ष्य रखा गया है कि 2027 तक देश के सभी अदालतों को कंप्यूटरीकृत कर दिये जायेंगे। बीएनएसएस में एक तरफ  177 प्रावधानों में संशोधन हुआ तो 14 नई धाराओं को जोड़ा गया। वहीं 9 नई धाराएं और 39 नई उप धाराएं जोड़ी गई। वहीं सरकार ने इंडियन एविडेंस एक्ट को भी बदल दिया औऱ उसे भारतीय साक्ष्य अधिनियम बना दिया। जहां पहले 167 धाराये थी वहीं अब 3 औऱ बढ़ा दिये गए और 170 धारायें हो गई, हालांकि इसमें दो नई धाराएं और 6 नई उप धाराएं जोड़ी गई तो वहीं 6 धाराओं को हटा दी गई।

पीएम मोदी की सरकार ने नए कानूनो को लाकर प्रगतिशील सोच का उदाहरण पेश किया है, जो कि आज के समाज की मांग है। भारत सरकार का कानून मं बदलाव करने का एक ही लक्ष्य है कि कानूनी ढाँचे को समकालीन आवश्यकताओं के अनुसार ढाला जायें और उसका सही इस्तेमाल हो सकें। इन नए बदलावों से न्याय व्यवस्था में, शासन में, रेलवे नियमों में, बैंकिंग सेक्टरों और धार्मिक संस्थानों में बड़े बदलाव होंगे, वहीं मामलो का जल्दी निपटान होने से कानून व्यवस्था के सुस्त और लचर होने के धब्बे से भी निजात मिलेगी।

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