क्या दैत्य होना एक चाल थी? जानिए पौराणिक कथाओं का असली सच – Bahujan king history

Daitya
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जब आप भारत में वैदिक इतिहास के बारे में बात करते है तो आपने हमेशा ऐसा ही देखा या सुना है कि जो सभ्यता से रहते है, देव पूजा करते है वो देवता है, और जिनका स्वरूप भयावाह है, जो पाताल में रहते है, लोगो को परेशान करते है, वो दैत्य कहलाते है.. लेकिन आपने कभी सोचा है कि देवता और दैत्य का ये कॉंसेप्ट कहां से आया है.. और वाकई में जिन दैत्य को वेदों और पुरानों में बुरा बताया गया है क्या वो वाकई में मानवता के लिए खतरा थे या केवल उनके द्वारा आर्यो की चली चाल को फॉलो न करने के कारण उनकी छवि को ऐसा बताया गया, और उन्हें मानवता का दुश्मन बता कर खुद को महान और परतापी साबित किया गया। अपने इस लेख में हम बात करेंगे ऐसे दलित बहुजन महान प्रतापी राजा के बारे में, जिनका सही इतिहास शायद आज तक हमारे युवाओं तक पहुंचा ही नहीं है।

पहले आप ये बताइये कि भारत में वर्ण व्यवस्था, जातिवाद और भेदभाव लेकर कौन आया था.. जवाब बहुतों को पता ही होगा.. आर्य.. उत्तर भारत में रहने वालों को आर्य और दक्षिण भारतीयों को द्रविड़ कहा जाता है.. एक तरफ दक्षिण भारतीय ये मानते है कि आर्य विदेशी है और उन्होंने ही भारत में आकर अपना वर्चस्प कायम रखने के लिए मूल भारतीय राजाओं की छवि खराब की.. उदाहरण है कि लिए .. हम सबसे पहले बहुजन राजा के बारे में बात करेंगे वो है हिरण्य कश्यप। ये नाम सुनकर शायद ज्यादातर हैरान होंगे, लेकिन जब आप दक्षिण भारतीय ग्रंथो को खंगालेंगे तो पायेंगे कि हिरण्यकश्यप को दैत्य नहीं था..और न ही विष्णु के नरसिंह अवतार ने उसका वध किया था।

इतिहासकार बताते है कि यूरोप और एशिया के बीच के एक स्थान यूरेशिया है, जहां गोरी चमड़ी वाले लोग रहा करते थे, जिन्हें आर्य कहा जाता था, वो बेहद खूंखार जाति के लोग हुआ करते थे, ईसा से करीब 3000 साल पहले यूरेशिया से आर्य की मनमानी के चलते वहां के पुरुषों को राजा ने पानी के जहाज में बिठा कर देश से बाहर निकाल दिया था। वो पानी के रास्ते दक्षिण भारत के समुद्र तट पर पहुंचे थे। आर्य गोरी चमड़ी के हुआ करते थे तो वहीं भारत के मूल निवासी सांवली चमड़ी हुआ करते थे। कहा जाता है कि आर्यो की छल कपट और प्रपंच को मूल निवासी समझ ही नहीं पायें और उनकी बातों में फंसने लगे। वो उनकी महिलाओं से शादी करके उनसे रिश्ता बनाने लगे.. जिससे आर्य उनका समाज का हिस्सा बन गए। मगर उन्हें खुद को अमीर और उंचा उठाना था इसलिए धीरे धीरे अंधविश्वास फैलाया गया।

पूजा पाठ यज्ञ जैसी प्रथाओं को समाज का हिस्सा बना दिया गया, ताकि प्रथाओं  नाम पर मूल निवासियों को छला जा सकें, उनके धन धान्य को हड़पा जा सकें, मूल निवासियों के धन पर आर्य अय्याशी करते, उनके जानवरों की बलि देते थे। आर्यों की इन दकियानूसी परंपरा का पहली बार विरोध किया हरदोई प्रांत के राजा हिरण्यकश्यप ने। राजा एक नागवंशी राजा था, उसने आर्यों की खुल्लम खुल्ला लूट, व्याभिचार, और मूल निवासियों के साथ किये गए अत्याचार का खुल कर विरोध किया था और आर्यो की सभी परंपराओ जिसे पूजा, यज्ञ, बलि जैसी प्रथाओं को बंद करने का आदेश दिया था। लेकिन आर्यों ने यहां चाल चली और ये साबित कर दिया था हिरण्यकश्यप असल में एक राक्षस है जो संसार का बुरा चाहता है, इसलिए उसने वैदिक परंपरा को मानने से इंकार कर दिया।

लेकिन बावजूद उसके हिरण्यकश्यप अपने फैसले पर अडिग रहा.. कहा जाता है कि हिरण्यकश्यप की पत्नी कीयादू को आर्यो ने प्रेम जाल में फंसाया और एक संतान को भी जन्म दिया। जिसे प्रह्लाद कहा गया, आर्य अब प्रहलाद को राजा बनाना चाहते थे और इसलिए धोखे से एक शाम हिरण्यकश्यप को छल से मार दिया गया। जबकि वैदिक कहानियों में कहा गया कि विष्णु के नरसिंह अवतार ने राजा का वध किया। सच तो ये है कि राजा ने आर्यों की बनाई कुरीति और परंपरा को मानने से इंकार कर दिया था इसलिए उसकी हत्या की गई.. आर्यो ने काल्पनिक वेद पुराण बना कर सेनापतियों और ज्यादा शक्तिशाली लोगो को देवताओं की उपाधि दे दी,   और मूल निवासियों को असुर कह कर उनका बहिष्कार किया था।

इसके बाद बात करते है है महिषासुर की, महिषासुर के बारे में आपको पता है कि उसका वध आदिशक्ति रूपी देवी ने किया था, लेकिन सच्चाई ये है कि महिषासुर ने भी आर्यों की बनाई मनगढ़ंत परंपरा को मानने से इंकार कर दिया था, बाबा साहब अंबेडकर भी मानते थे कि महिषासुर एक महान उदार द्रविड़ शासक थे। वो ऐसी किसी भी कुरीति का पालन नही करते थे जिससे आम लोगो को नुकसान हो, या उनकी जिंदगी में मुश्किलें आये.. महिषासुर के समय में धातुओं से बने औजार काफी ज्यादा मात्रा में बनाये जाते थे, और विदेशो से लोग हथियार खरीदने आते थे, इसलिए वो एक संपन्न राज्य था। विभिन्न औषिधि और वनस्पति के बारे में जानकार महिषासुर कर्नाटक के मैसूर में शासन करते थे, महिषासुर के राज्यों में महिलाओं का अपमान नहीं होता था और न ही उनपर कोई हमला कर सकता था, इसलिए आर्यो ने अपनी महिलाओं को कपटपूर्ण तरीके से असुर राजाओं की हत्या करने के लिए भेजा था, जिसे बाद में ऐसा दिखाया गया कि इन असुरो को देवियों ने मारा है,.. जबकि सच्चाई कुछ और ही थी।

इसके बाद बात करेंगे पासी वंश के राजा बलि की.. सभी जानते है कि विष्णु ने वामन रूप लेकर राजा बलि को दान से बदले पाताल भेज दिया, मगर सच्चाई बिल्कुल अलग है। राजा बलि ने अपने राज्य को 9 खंडो में बांटा था और वहां की देखभाल के लिए खंडोबा की नियुक्ति होती थी। खंडोबा अपने क्षेत्र की देखभाल करने के लिए ऐसे लोगो की नियुक्ति करते थे जो राज्यों में खेती बाड़ी से लेकर प्रशासनिक कार्यों की देखभाल करते थे। आर्यो को पता था कि अगर उन्हें अपना वर्चस्व कायम करना है तो राजा बलि को वहां से जाना होगा.. जिसके बाद छल से राजा बलि से उनका राजपाठ छीना गया औऱ उन्हें गायब कर दिया गया। इसके बाद नंबर है 12वी शताब्दी के राजा  बिजली पासी का। जो राजा जयचंद के समकालीन का राजा है।   बिजली पासी का राज्य लखनऊ से 148 वर्ग मील की दूरी पर और उसके आस-पास के क्षेत्रों में हुआ  करता था।

जिन्होंने बिजनौर शहर बसाया था। बिजली पासी ने 12 ऐसे किलो का निर्माण कराया था जो किसी चक्रव्यू से कम नहीं थे और दुश्मनों का छक्के छुड़ा सकते थे। उनकी उपलब्धि से राजा जयचंद काफी चिढ़ गया औऱ उसने मसोबा के सरदार आल्हा उदल से संधि कर ली, जयचंद, आल्दा उदल और उसके साले जोगा मे मिलकर बिजली पासी पर हमला कर दिया था, लंबा भीषण युद्ध हुआ और इस युद्ध में बिजली पासी मारे गए.. लेकिन उनकी प्रसिद्धी ऐसी थी कि दुश्मन भी उनसे अकेले लड़ने की हिम्मत नहीं कर सकते थे। ये वो दलित समाज के राजा थे जिनके बारे में या तो गलत बात फैलाई गई या फिर उन्हें इतिहास में भुला दिया गया। मगर सच्चाई जानने के बाद आपको अहसास होगा कि आर्यो ने मूल निवासियों से क्या छीना।

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