Rohith Vemula: 17 जनवरी 2016, ये वो तारीख हैं जब हैदराबाद विश्वविद्यालय (यूओएच) के एक दलित phd छात्र रोहित चक्रवर्ती वेमुला की आत्महत्या करने की खबर ने न केवल यूनिवर्सिटी में बल्कि पूरे भारत में जातिगत भेदभाव के प्रति छात्राओं में गुस्सा भर दिया था। एक 26 साल का छात्र जो अपने समाज के बच्चों के लिए कुछ करना चाहता था, जो उपनी बूढ़ी मां के सपनो को साकार करने के लिए हैदराबाद विश्वविद्यालय में आया था, तब किसी को इस बात का अंदाजा नहीं था।
कि एक खुशमिजाज दिल वाला लड़का भी जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न से इस कदर तंग आ सकता है कि वो भी खुदकुशी कर सकता है। एक तरफ 2016 में रोहित वेमुला की मौत हुई तो वहीं उनकी मौत के करीब 9 सालो के बाद 2025 में रोहित वेमुला अधिनियम को लाया गया, जिसे आधिकारिक तौर पर कर्नाटक रोहित वेमुला बहिष्कार या अन्याय की रोकथाम, शिक्षा व गरिमा का अधिकार विधेयक 2025 लाया गया।
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9 साल पहले एक दलित युवक की मौत
ये अधिनियम शैक्षणिक संस्थानों में दलित और पिछड़ी जाति के छात्रों के साथ होने वाले जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न को रोकने के लिए लाया गया था। इस अधिनियम के तहत अगर किसी अनूसूचित जाति, अनूसूचित जनजाति, पिछड़े औऱ अल्पसंख्यक वर्ग के छात्रों के साथ किसी तरह का भेदभाव किया जाता है तो वो एक गैर जमानती अपराध माना जायेगा जिसमें आरोपी को 3 साल की सजा और 1 लाख रूपय का जुर्माना लगाया जायेगा.. इसके अलावा जो भी शैक्षणिक संस्थान इसका अनुपालन नहीं करेंगे उनकी राज्य नीधि को वापिस लेने का अधिकार सरकार के पास होगा। इस अधिनियम को कर्नाटक के सभी नीजि सरकारी और मान्यता प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों में लागू किया गया।
अब सवाल ये उठता है कि 9 साल पहले एक दलित युवक की मौत होती है और 9 सालो के बाद उसके सम्मान में एक विधेयक लाया जाता है.. लेकिन सवाल ये है कि क्या ये कानून संस्थानों में होने वाले भेदभाव को दूर करने में सफल होगा.. रोहित वेमुला की मौत कोई पहली मौत नहीं थी.. लेकिन ये भी सच है कि रोहित की मौत ने एक राष्ट्रीय बहस को जन्म दे दिया था। मगर उस बहस के बाद की स्थिति कैसी है .ये भी जानना जरूरी है.. और क्या क्या बदला अब तक –
रोहित वेमुला ने जातिगत अन्याय के मुद्दों पर उठाई आवाज
दरअसल रोहित वेमुला एक अंबेडकरवादी छात्र थे, और दलित जाति से होने के कारण लगातार उन्हें जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ रहा था, यहां तक कि कई शिक्षकों के नाम भी सामने आये जो इस भेदभाव को बढ़ावा दे रहे थे, नतीूजा ये हुआ कि वेमुला अंबेडकरवादी छात्र संगठन अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन (एएसए) के बैनर तले परिसर में जातिगत अन्याय के मुद्दों को उठाने में शामिल हो गए थे।
मगर कॉलेज परिसर में एक ऐसे मुद्दे पर खुल कर बोलने का नतीजा ये हुआ कि , जुलाई 2015 में विश्वविद्यालय ने उनका ₹ 25,000 का मासिक वजीफा बंद कर दिया। जिसकी शिकायत उन्होंने की थी, इतना ही नहीं वेमुला के दोस्तो ने खुलासा किया कि जानबूझ कर वेमुला को निशाना बनाया गया ताकि वो एसोसिएशन से दूर रहे।
वेमुला समेत 5 साथियों को छात्रावास से निष्कासित
मामला जब तूल पकड़ने लगा तब 17 अगस्त 2015 को बीजेपी सांसद और केंद्रीय मंत्री बंदारू दत्तात्रेय ने मानव संसाधन विकास मंत्री को चिट्ठी लिख कर हैदराबाद विश्वविद्यालय में जातिवादी गतिविधियों, चरमपंथी और राष्ट्रविरोधी राजनीति की तरफ ध्यान देने की अपील की, इतना ही नहीं इसमे उन्होंने एएसए के सदस्य का जिक्र करते हुए उन्हें ‘जातिवादी’ और ‘राष्ट्र-विरोधी’ गतिविधियों में लिप्त होने का भी आरोप लगाया था। जिसके कारण विश्वविद्यालय ने राष्ट्रविरोधि गतिविधियों मे शामिल होने और अशांति फैलाने के आरोप में वेमुला समेत उनके 5 साथियों को पहले अगस्त मे छात्रावास से निष्कासित कर दिया गया, और सितंबर 2015 में निलंबित कर दिया.. ये निलंबल 17 दिसंबर पर चलता रहा था।
दलित होने पर ही सवालियां निशान खड़े
फिर जब जाच कमेटी ने भी निलंबन को बरकरार रखा तब 3 जनवरी 2016 को वेमुला अपने साथियो के साथ परिसर के अंदर लगाए गए एक तंबू में चले गए और ‘अंतरराष्ट्रीय भूख हड़ताल’ शुरू कर दी थी। मगर यूनिवर्सिटी अपने फैसले पर अडिग थी, जिसके कारण परेशान होकर 17 जनवरी 2016 को एएसए के बैनर से फांसी लगा ली.. और अपनी मौत का कारण कॉलेज की व्यवस्था को बताया।
उन्होंने अपने सुसाइडनोट में वो दर्द बयां किया जब बचपन से उन्हें जातिहत भेदभाव और अकेलापन सहना पड़ा। दुख की बात तो ये थी एक होनहार छात्र इसभेदभाव की भेंट चढ़ गया था और उसके मृत देह पर राजनीति की जा रही थी। हैरानी की बात तो ये थी कि सरकार ने भी हर संभव कोशिश की कि इसे जातिगत मुद्दा न बनाया जाये, रोहित वेमुला के दलित होने पर ही सवालियां निशान खड़े कर दिये गए।
दलित छात्र की आत्महत्या
रोहित वेमुला की मौत के बाद शैक्षणिक संस्थानों में होने वाले जातिगत भेदभाव के खिलाफ एक बड़ी मुहीम शुरु की गई। यूजीसी की गाइडलाइंस लाई गई, ताकि जो उत्पीड़न का शिकार हो रहे है वो सीधा शिकायत कर सकें, लेकिन विड़बना ये है कि ये उत्पीड़न कम होने के बजाय बढ़ ही रहे है। चाहें वो केरल के दलित छात्र की आत्महत्या की बात हो या धर्मशाला की दलित छात्रा को लगातार 2 महीनों तक इतना टॉर्चर किया जाना, कि उसकी मौत ही हो गई.. सिस्टम मे कुछ नहीं बदला.. भले ही कानून सख्त करने के तमाम वादें होते है, संसद में दलित पिछड़े छात्रों के अधिकारो की मांग उठाई जाती है मगर हालात आज भी बद से बदतर है।
कॉलेजो में एंटी डिस्क्रिमिनेशन सेल
स्कूलो में दलित बच्चो को सबसे अलग बिठाया जाता है तो वहीं कॉलेजो में एंटी डिस्क्रिमिनेशन सेल होने के बाद भी कोई कमी नहीं आई। इसके पीछे का एक कारण ये भी हो सकता है कि कुछ संस्थान खुलेआम ब्राह्मणवादी विचारधारा को फॉलो करते है, खास कर कुछ शिक्षक भी इस भेदभाव में शामिल होते है। कहीं न कहीं ये मानसिकता कि दलितों औऱ पिछड़ो को उच्च शिक्षा हासिल नहीं करनी चाहिए.. जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न का बड़ा कारण बन गई है।
जानबूझ कर इस तरह का माहैल बनाया जा रहा है जिससे संस्थागत मौत को पूरी तरह का तोड़ मरोड़ा जा सकें। सच्चाई तो यहीं है कि भले ही अब ये एक राष्ट्रीय मुद्दा है, लेकिन न तो उत्पीड़न में कमी आई है और न ही कोई बदलाव हुआ है। क्या सख्त कानून बनाने से उत्पीड़न रूप जायेगी।



