रिवाज के नाम पर अत्याचार! बाबा साहेब की एक दलील ने दिलाया विधवा को न्याय

Dr. B. R. Ambedkar, Widow Rights in India,
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महाराष्ट्र का एक छोटा सा गांव.. परंपरा के नाम पर विधवा हुई महिलाओं को सती करने की परंपरा का तो अंत हो चुका था लेकिन उनकी जिंदगी विधवा होने के बाद किसी अभिशाप से कम नही थी.. न केवल उनके कपड़ो का रंग छीन कर सफेद कर दिया जाता था बल्कि परंपरा का नाम लेकर उनके सिर को मुंडवा दिया जाता था, उन्हें बाकि समाज के अलग थलग कर दिया था, किसी भी सामूहिक कार्यक्रम का हिस्सा बनना तो उनकी छाया को भी वहां से दूर रखा जाता था, और ऐसी ही जानवरों की तरह जीवन जी रही थी रुक्मिनी।

जिसके पति की मौत के बाद परिवार ने अत्याचार की सारे हदें पार कर दी थी। एक विधवा के लिए जीवन कितना कठिन हो सकता था, वो रूक्मिनी की जिंदगी देखकर अंदाजा लगाया जा सकता था, लेकिन सबसे बुरा था परिवार का रवैया.. परिवार का लालच.. पति ने मरने से पहले एक छोटा सा जमीन का टुकड़ा खरीदा था।

पति की आखिरी निशानी बचाने निकली विधवा,

रूक्मिनी की कोई औलाद नहीं थी.. जीवन जीने के लिए वहीं टुकड़ा सहारा था, लेकिन उस पर भी रूक्मिनी के जेठ और गांव के एक जमींदार की घटिया नजर पड़ चुकी थी, रूक्मिनी के परिवार ने जमीन के टुकड़े को उससे हथियाने के लिए अत्याचार के सारी हदें पार कर दी थी.. लेकिन बेचारी रुक्मिनी हर अत्याचार को सह कर भी किसी तरह से अपने पति की धरोहर को बचाने की कोशिश कर रही थी।

उसकी जिंदगी ऐसी ही चल रही थी, कि एक बार वो गांव के कुएं से पानी भरने गई थी जहां विधवा होने के कारण सबसे अंत में पानी भरने की इजाजत थी, वो घंटो धूप में खड़ी रही, लेकिन तभी उसने वहां से गुजरते राहगीरो की बातें सुनी.. वो आपस में बात कर रहे थे कि मुम्बई में एक ऐसा मसीहा है जो गरीबो और जरूरतमंदों के लिए सदैव खड़े रहते है, मुफ्त में उनके मुकदमें लड़ता है और न्याय दिलाता है।

रूक्मिनी ने बाबा साहेब से मांगी मदद

रूक्मिनी ने उनकी बातें सुनी तो उसे अपने लिए उम्मीद की एक किरण दिखी। उसने उन लोगो से उस मसीहा का नाम पूछा.. उन लोगो ने उनका बताया डॉक्टर बाबा साहब भीम राव अंबेडकर..  उसने तय किया कि वो मुम्बई जाकर बाबा साहब से अपने पति की अंतिम धरोहर को बचाने की अपील करेगी। बस फिर क्या था रूक्मिनी ने बड़ी हिम्मत दिखाई और कुछ पैसे ले कर रात के अंधेरे में घर से निकल गई..और पहुचं गई मुम्बई। मुम्बई की भीड़भाड़ और अनजान लोगो के बीच वो डरी सहमी बाबा साहब का पता पूछने लगी।

दिल में डर लेकिन चेहरे पर आत्मविश्वास दिखाते हुए वो कई दिनों तक भटकने के बाद बाबा साहब के ऑफिस के पहुंच ही गई, जब वो बाबा साहब के सामने पहुंची तो उन्हें देखने के बाद रूक्मिनी की आंखो में आंसू आ गए.. उसे लगा कि कोई भगवान बैठा है जो उसकी सारी मुसिबतें हर लेगा.. वो बाबा साहब के पैरो में गिर पड़ी और फूट फूट कर रोते हुए बाबा साहब ने उसे और उसके पति की अंतिम निशानी को बचाने की गुहार लगाने लगी।

बाबा साहब ने कोर्ट में दायर की याचिका

बाबा साहब ने तुंरत रुक्मिनी को उठाया और कहा कि एक महिला को कभी भी किसी भी हाल में इस तरह से नहीं झुकना चाहिए.. तुम मुझे सब कुछ बताओ की क्या हुआ है तुम्हारे साथ.. रूक्मिनी ने सारी आपबीती बाबा साहब को सुना दी। बाबा साहब ने जब रूक्मिनी के अत्याचार की कहानी सुनी तो वो बुरी तरह से क्रोधित हो उठे.. वो पहले से ही महिलाओ के साथ होने वाले भेदभाव और मनुवादी मानसिकता के खिलाफ थे। रूक्मिनी की कहानी ने उनकी नफरत को और बढ़ा दिया था।

कोर्ट का नोटिस मिलते ही पैरो ताले जमीन खिसकी

बाबा साहब ने गरजती आवाज में कहा कि रूक्मिनी को किसी के आगे हाथ फैलाने की जरूरत नहीं है न ही उसे किसी के सहारे पूरा जीवन बिताने की जरूरत है, एक स्त्री खुद में शसक्त है और वो रूक्मिनी को न्याय और उसका अधिकार दिला कर रहेंगे। बाबा साहब ने तुंरत एक ऐसी याचिका बनाई, जिसमें केवल रूक्मिनी के पति के जमीन की याचिका नहीं थी, बल्कि रूक्मिनी के साथ हुए शारीरिक शोषण,. मानसिक प्रताड़ना, उसकी हत्या करने की कोशिश, महिला के मानव अधिकारों का हनन जैसे संगीन मुद्दे शामिल थे। कोर्ट का नोटिस जब रूक्मिनी के घर औऱ पंचायत पहुंचा, तो उनके पैरो तले जमीन खिसक गई.. रूक्मिनी के जेठ ने शहर का एक मंहगा वकील किया।

बाबा साहेब ने दिलाया विधवा को उसका अधिकार

सुनवाई वाले दिन जब विपक्षी वकील ने दलील दी कि रूक्मिनी विधवा है औऱ उसका संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं है ये रिती रिवाज है, और रूक्मिनी की मानसिक हालात ठीक नही है.. लेकिन बाबा साहब पहले से ही रूक्मिनी पर हुए अत्याचार के कारण काफी गुस्से में थे, वो अदालत में खड़े हुए.. औऱ उन्होंने बोलना शुरु किया । ये कैसे रीति रिवाज है..जहां महिला को भूखा रखा जाता हो, उसे पीटा जाता हो, विधवा होने के कारण उसे अंधेरे कमरे में रखा जाता हो, उसकी संपत्ति हथियाने के लिए गर्म चिमटे से दागा जाता हो। ये रीति रिवाज का हिस्सा कैसे हो गया.. सच तो ये है कि ये मानव अधिकार का मामला है, जो उन्हें जीने का हक देता है, जिसे कोई छीन नहीं सकता है।

एक विधवा औरत का आखिरी सहारा छीनने के लिए उसके ऊपर हुए अत्याचार का एक एक सबूत बाबा साहब ने कोर्ट में पेश किया.. उनकी दलीलों के आगे आरोपी पक्ष की बोलती बंद हो गई.. जिसके बाद जज ने फैसला सुनाया.. जो हमेशा के लिए इतिहास बन गया। जज साहब ने आदेश दिया था रूक्मिनी के पति की सारी जमीन उसे दी जायेगी, साथ ही उसे अच्छा खासा मुआवजा भी दिया गया। वहीं उसके जेठ और जमींदार को उम्रकैद की सजा सुनाई गई।

रूकमिनी बाबा साहब के पैरो में फिर गिर गई,. उसकी आंखो में आंस थे लेकिन ये जीत के आंसू थे, बेबसी के नहीं.. बाबा साहब ने उसे फिर से रोका और हिम्मत देते हुए कहा कि तुम बहुत हिम्मत वाली हो, तुमने कुछ गलत नहीं किया, इसलिए सिर झुका कर नहीं सिर उठा कर जीना। तभी समाज तुम्हें सम्मान की दृष्टि से देखेगा। रूक्मिनी की जीत ने बताया कि अगर आप सही है, सच्चे है तो जीत आपकी ही होगी।

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