बौद्ध धर्म में ईश्वर के अस्तित्व को हमेशा से नकारा गया है। बौद्द धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध के ज्ञान पर लिखा ग्रंथ त्रिपिटक में बताया गया है कि बुद्ध ने ईश्वर के न होने की बात को एकमात्र सत्य कहा है। उन्होंने कहा कि कोई ऐसी अदृष्य और परम पूज्य शक्ति है ही नहीं जो संसार को चला रही है.. सच तो ये है कि हमारा अवचेतन मन ही ये अवधारना बना लेता है कि संसार में एक अलौकिक शक्ति विद्यमान है… जिससे संसार चलायमान है। न कोई सृष्टिकर्ता है और न ही कोई ईश्वर है.. बल्कि संसार कर्म और DEPENDENT ORIGINATION के नियमों से चलता है.. व्यक्ति के अज्ञान, उसकी तृष्णा और कर्मों के कारण ही चलता है।
यानि के प्रकृति के नियमों के आधार पर चलता है, न कि शास्वत आत्मा और भगवान के इशारों पर… हालांकि बुद्ध की इन बातो के कारण उस समय काफी विवाद भी हुआ था। ब्राह्मणों ने पहले बुद्ध को गलत साबित करने की काफी कोशिशें भी की.. इतना ही नहीं उन्होंने गौतम बुद्ध से ये साबित करने को कहा कि वो इस बात को प्रमाणित करें कि वो किस आधार पर ईश्वर के अस्तित्व को नकार रहे है। अपने इस वीडियो में हम जानेंगे कि कैसे गौतम बुद्ध ने ब्राह्मणी सोच और विचारधारा पर गहरा प्रहार करते हुए ये प्रमाणित किया कि ईश्वर का कोई अस्तित्व नहीं है।
ईश्वर की सोच कहां आई
बुदध ने कहा कि ईश्वर है या नहीं, सबसे पहले तो इसपर चर्चा करना ही व्यर्थ है, इन सवालों के जवाबों को जानने के बजाय व्यक्ति को अपने कर्मों को सही करने की आवश्यकता है। उन्होंने माना कि ईश्वर अगर परम पिता परमेश्वर है तो कौन सा पिता अपने बच्चे को दुखी देखना चाहता है, तो फिर संसार में दुख और अवसाद क्यों है। संसार में घटित होने वाली हर घटना के पीछे कुछ नियन है उनकी स्थितियां है। व्यक्ति को ईश्वर का नाम लेकर अपने कर्म से बचने की अच्छी आदत हो गई है, जब कि हर किसी को अपने दुखों का कारण और कर्मों का प्रभाव खुद देखना चाहिए।
बुद्ध ने कहा कि ईश्वर के नाम पर अँधविश्वासी होकर कर्म से दूर हो जाना आपको मोक्ष की राह से भटकाने का काम करता है। व्यक्ति का दुख का कारण कोई ईश्वर नहीं बल्कि उसकी खुद की इच्छायें ही है..केवल अपने प्रयास से ही और नैतिक नियमो का पालन करके ही दुखों और पाप से मुक्ति पाई जा सकती है।
कैसे साबित किया कि ईश्वर नहीं है
एक तरफ ईंशवर के नाम पर शूद्रों और दूसरी जातियों को सालों तक ब्राह्मणों ने छला था, जिसके खिलाफ बुद्ध ने एक तरह से मुहीम चलाई थी। जिससे ब्राह्मणों के नियमों को मानने के बजाये एक बड़ा तबका बुद्ध के मार्ग पर चल निकला..नतीजा..ब्राह्मणों को अपनी सत्ता हाथ से जाती दिखी.. जिस ईश्वर के नाम पर, उनके प्रकोप के नाम पर सदियों तक छला जा रहा था वो दुकान बंद होने लगी थी..बस फिर क्या था बुद्ध को ही गलत साबित करने के लिए ब्राह्मणों ने उनके खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया। और वो आमने सामने आकर बुद्ध से प्रमाण मांगने लगे कि वो किस आधार पर ईश्वर के अस्तित्व को नाकार रहे है।
मुक्ति का केवल एक ही मार्ग
जिस पर बुद्ध ने बड़ी शांति से जवाब दिया कि सत्य को जानना है तो केवल आपनी नीजि मान्यताओं या फिर शास्त्रों के आधार पर ही नहीं जाना जा सकता है। बल्कि उसे अनुभव करना होता है, जो कि आपका तप ही करा सकता है। बुद्ध ने कहा कि वो उस पाखंड के खिलाफ है जो ईश्वर के नाम पर किया जाता है। मुक्ति का केवल एक ही मार्ग है.. करुणा दया अच्छे कर्म… व्यक्ति सत्य के मार्ग पर चले, अपना कर्म पूरी निष्ठा से करें, और करूणा दिखाये तो वो स्वयं ही ईश्वर को पा लेता है।
केवल दूसरो के कहने पर किसी बात पर भरोसा नहीं करना चाहिए..जब तक आप खुद महसूस नहीं करते है तब तक आप किसी भी चीज के अस्तित्व को स्वीकार नहीं कर सकते है… चाहे वो ईश्वर ही क्यों न हो। सत्य का भान तभी होगा तब खुद से महसूस किया जाये.. कोई और हमेशा आपको भ्रमित ही करेगा।
बुद्ध ने इसी आधार पर ईश्वर के अस्तित्व को नकारा था… सबका ईश्वर अलग अलग हो सकता है क्योंकि सबका सत्य देखना का नजरियां अलग अलग है। ईश्वर के अस्तित्व को लेकर बुद्ध की सोच के कारण ही बौद्ध धर्म के अनुयायियों को नास्तिक करार दे दिया था.. जबकि वो केवल कही सुनी बात पर चलने के बजाये खुद आकलन करके आगे बढ़ने, सत्य खोजने के लिए प्रेरित करते है।



