Mini Tibet in Chhattisgarh: क्या बौद्ध धर्म की शक्ति से रुक जाता है ग्रेविटी का नियम? जानिए मैनपाट का सच

Mainpat, Mini Tibet in Chhattisgarh
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Mini Tibet in Chhattisgarh: अपने झरने का पानी गिरते तो देखा ही होगा। वो खूबसूरत पहाड़ों से नीचे की तरफ पानी का गिरना एक तरफ काफी भयावह लगता है तो दूसरी तरफ काफी मनोरम भी। पानी का ऊपर से नीचे गिरना गुरुत्वाकर्षण के कारण होता है, जिसे लगभग हम सभी ने पढ़ा होगा, लेकिन अगर हम आपको ये कहे कि बौद्ध धर्म की शक्ति के आगे ये नियम भी फेल हो जाता है तो आप क्या कहेंगे। जी हां, भारत की अलग अलग संस्कृति के बारे में सुना होगा लेकिन क्या हो जब बौद्ध धर्म के प्रभाव से बाहरी देश तिब्बत की संस्कृति के भी दर्शन कर सकते है आप छत्तीसगढ़ में।

छत्तीसगढ़ में छुपा है मिनी तिब्बत

जी हां यहां कई सौ सालों से मौजूद है एक मिनी तिब्बत। जहां न केवल तिब्बती लोग निवास करते है बल्कि इसी जगह मौजूद है गुरुत्वाकर्षण के नियम को चुनौती देने वाला एक झरना, जो ऊपर से नीचे नहीं बल्कि नीचे से ऊपर बहता है। अपने इस वीडियो में हम छत्तीसगढ़ में मौजूद मिनी तिब्बत के बारे में जानेंगे साथ हु जैसे बना छत्तीसगढ़ में ये मिनी तिब्बत, और बौद्ध धर्म के लिए क्यों महत्व रखता है ये क्षेत्र।

साल 1962 में जब भारत और चीन के बीच युद्ध हुआ तब सीमा पर रहने वाले तिब्बती शरणार्थियों ने चीन के अत्याचार से बचने के लिए तिबब्त के शरणार्थियों ने भारत के कई स्थानों को अपना ठिकाना बनाया था, जिसमें.. धर्मशाला, कर्नाटक का बायलाकुप्पे, बीर हिमाचल प्रदेश, जीरांगो ओड़िशा, दार्जिलिंग, के साथ कई अन्य क्षेत्र शामि है. और उन्ही में से एक है छत्तिसगढ़ के सरगुजा जिले के खूबसूरत वादियों के बीच बसा मैनपाट.. जिसे असल में छत्तीसगढ़ का शिमला कहा जाता है। कभी खूबसूरत वादियों, टाइगर पॉइंट वाटलफॉल और हिल स्टेशन के लिए जाना जाने वाला मैनपाट आज एक प्रमुख बौद्ध क्षेत्र के लिए जाना जाता है।

हिल स्टेशन के रूप में मिली पहचान

जिनका क्रेडिट जाता है यहां के कैंप नंबर 5 और 6 में कई दशकों से अपना घर बना कर रहे वाले तिब्बती शरणार्थी.. जिन्होंने मैनपाट को न केवल बौद्ध धर्म के रंग में डुबोया साथ ही यहां प्रसिद्ध सुंदर बौद्ध मंदिर का निर्माण भी करवाया, जिसे स्थानिय लोग टाकपो मठ कहते है.. यहां भगवान बुद्ध कई ऐसी प्रतीमा है जो आपको भावविभोर कर सकती है। इसके अलावा ठिन-थोन बौद्ध मठ समेत कई बौद्ध मंदिर मौजूद है। मैनपाट समुद्र तल से करीब 3500 फीट की उंचाई पर स्थित है। तिबब्ती शरणाथियों के कारण बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र बनने के कारण आज यहां के लोग इसे छत्तीसगढ़ का मिनी तिब्बत कहते है।

हैरानी की बात है कि तिबब्ती शरणार्थियों के रचने बसने में खुद सरकार भी पूरा समर्थन करती है, उनके लिए विशेष सुविधाएं, स्कूल, घर, खेती के लिए जमीन जैसी सुविधायें देकर उन्हें बसाया था। जिससे बौद्ध धर्म को भारत में औऱ बढ़ावा मिला। बौद्ध धर्म को मानने वाले तिब्बतियों के आने के कारण यहां बौद्ध भिक्षुओं का आना हुआ जिससे एक हिल स्टेशन के रूप में भी इसे बड़ी पहचान मिली।

बौद्ध मठ, अद्भुत संस्कृति और उल्टा पानी

इस क्षेत्र को मिनी तिबब्त कहने के पीछे का एक और मुख्य कारण है इस इलाके की संस्कृति। इस इलाके में रहने वाले लोग तिबब्त त्योहार  ‘लोसर तो बड़ी धूमधान से मनाते है, इसके अलावा तिब्बती मोमोज, थुपका और नूडल्स यहां के पारंपरिक खानपान है.. जिसका मांग इस इलाके में सबसे ज्यादा है। साथ ही यहां के लोग मुख्य रूप से तिब्बती कालीन बनाने का काम करते है, जो असल में तिब्बती परंपरा की पहचान है। पर्यटक इस इलाके में  टाईगर प्वाइंट, मछली प्वाइंट और उल्टा पानी का झरना तो देखने आते ही है उससे ज्यादा यहां रचे बसे बौद्द धर्म और तिब्बती धरोहरों को महसूस करने आते है.. जो उन्हें अहसास दिलाता है कि भारत में रह कर भी उन्होंने तिबब्त की यात्रा कर ली है। इस इलाके में उगने वाले औषधीय पौधों की काफी मांग है।

कहा जाता है कि पहले यहां करीब 1400 तिबब्ती शरणार्थी थे लेकिन जब साल 2013 में दलाई लामा ने मैनपाट का दौरा किया औऱ वहां के डागपो शेड्रूप्लिंग मट में प्रार्थना की थी और वहां तिब्बती शरणार्थियों को आशीर्वाद दिया था, तब से यहां शरणार्थियों की संख्या के साथ साथ मैनपाट की भी वैल्यू बढ़ गई। ये स्थान आपको याद दिलाता है कि भारत और तिब्बत के बीच के मैत्रीपूर्ण धार्मिक सौहार्द की.. जो बताता है कि आखिर क्यों भारत आतिथि देवों भवः की नीति पर चलता है।

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