History of Chamar Regiment: 15 वी सदी की बात है, अछूत जाति से आने वाले संत रविदास ने पहली बार एक निम्न जाति से आने के बाद भी अध्यात्मिक शक्ति को महसूस किया, उन्होंने भक्ति का मार्ग चुना.. और पहली बार दुनिया के लोगो को ये बताया कि पूजा पाठ, धर्म कर्म किसी के बाप की जागीर नहीं है.. ईश्वर चुनिंदा लोगों का नहीं बल्कि पूरे संसार का है.. जिसने जाति की दीवार नहीं बनाई..उसने केवल मनुष्य बनाये थे, जिन्हें वो जाति धर्म के बंधनो से उठ कर देखता है, बस फिर क्या था संत रविदास ने जातिवाद का, वर्ण व्यवस्था का पुरजोर विरोध किया.. और तब पहली बार उन्हें मानने वालों को रविदासिया कहा जाने लगा।
कौन है चमार?
हालांकि शायद रविदासियां कहने के पीछे एक ऐसा शब्द भी रहा होगा जिसे समाज में अपमान के रूप मे लिया जाता था.. चमार.. संत रविदास खुद इसी जाति से आते थे.. और 15वी सदी में चमार जाति अछूत, निम्न और समाजिक तौर पर बहिष्कृत जाति मानी जाती थी.. नतीजा,… उस वक्त के लोगो ने खुद को नए पहचान के साथ अपना परिचय देना शुरु कर दिया.. लेकिन क्या आप ये जानते है कि चमार असल में थे कौन… उनका ऐसा इतिहास.. जो आपको सोचने पर मजबूर कर देगा कि आखिर एक मेहनती और साहसी जाति कैसे बहिष्कृत हो गई।
जाति व्यवस्था और वर्ण व्यवस्था क्या है?
हिंदू धर्म में वैदिक परंपरा को बढ़ावा देने वाले चारों वेदों में से पहले औऱ सबसे पुराने वेद ऋग्वेद में जाति व्यवस्था और वर्ण व्यवस्था के बारे में बताया गया। ऋग्वेद के दसवे मंडल के पुरुष सूक्त में चारों वर्णों की उत्पत्ति कैसे ब्रह्मा के मुख से ब्राहमण, भुजा के क्षत्रिये, जांघों से वैश्य औऱ पैरों से शूद्र का जन्म हुआ है, इसके बारे में कहा गया है। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि कहीं भी ये नहीं लिखा कि शूद्रो को समाज से बहिष्कृत कर दिया जायेगा।
या उन्हें जातिगत भेदभाव का सामना करना चाहिए या उनके साथ छुआछूत होना चाहिए.. वो ब्रहामणों की पैरो की जूती है.. हां ये जरूर कहा गया कि जो सेवा करते है वो शूद्र है.. ऋग्वेद कहता है कि किसी का भी वर्ण या जाति जन्म के आधार पर नहीं बल्कि व्यक्ति के गुणों, कर्म और व्यवसाय पर आधारित होना चाहिए.. लेकिन क्या अब ऐसा है।
चमारो का इतिहास बेहद शक्तिशाली
इन तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया.. जिसका सबसे ज्यादा असर पड़ा उन लोगो पर जो ऐसे काम करते थे जिन्हें घृणा की दृष्टि से देखा गया.. जिसमें जानवरों के चमड़े को उतारने वाले और उनसे सामान वालों को सबसे हीन माना गया। चमड़े का काम करने के कारण वो चमार बन गए.. और समाज की नजरों में मृत जानवरो के चमड़े के साथ ऐसा व्यवहार पूरी तरह से घृणित करार दे दिया गया। लेकिन जब आप इतिहासकारो की बात सुनेंगे तो आपको पता चलेगा कि चमारो का इतिहास बेहद शक्तिशाली और गौरांवित करने वाला है।
ब्रिटिश इतिहासकार कर्नल टाड मानने है कि चमार मूल रूप से अफ्रीका के हो सकते है जो काम के लिए भारत आये थे, लेकिन वहीं मशहूर लेखक डॉक्टर विजय सोनकर ने अपनी एक फेमस किताब ‘हिंदू चर्मकार जाति: एक स्वर्णिम गौरवशाली राजवंशीय का इतिहास’ में चमार जाति को एक राजकीय वंश का हिस्सा बताया है। उन्होंने किताब में लिखा कि ये लोग असल में राजस्थान के चंवर वंश के क्षत्रिय थे।
वैदिक काल में जन्म आधारिक जाति व्यवस्था
आर्यों के भारत में आने से पहले प्रांरंभिक वैदिक काल में जन्म आधारिक जाति व्यवस्था थी ही नहीं। लोग अपने अपने आजीविका के आधार पर पहचाने जाते थे, जो कि वर्ण व्यवस्था का हिस्सा था, वर्ण व्यवस्था में एक ही परिवार के लोगो को अलग अलग कर्म करने की पूर्ण आजादी थी..जैसे कोई पुरोहित बन सकता था तो कोई योद्धा या फिर व्यापारी.. यहां तक कि जब तक आर्य भारत में नहीं आये थे तब तक सिँधु घाटी सभ्यता फलित हो चुकी थी, और उस सभ्यता में मिले प्रमाण कहते है कि वो भी प्रकृति की पूजा करते थे।
व्यापारी हुआ करते थे.. धर्म या नस्ल के आधार पर उस वक्त कोई भेदभाव नहीं था। आर्यो के आने के बाद उन्होंने अपनी धूर्तता से उत्तर वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था को कर्म से बदल कर जन्म के आधार पर तय कर दिया। जिसका नतीजा ये हुआ कि छुआछूत, घृणा,उंच नीच की भावना ने जन्म लेना शुरु कर दिया।
चंवर वंश को जानबूझ कर किया गया बहिष्कृत
प्राचीन काल में चंवर वंश एक ऐसा वंश था जिसके समय में लोग चमड़े और शिल्पकारी का काम करते थे.. लेकिन जब बाहर से आये लोगों के बताये नियमों और कुरीतियों को मानने से चंवर वंश के लोगो ने मना कर दिया तो उन्हें जानबूझ कर अपमानित करने के लिए उन्हें समाज के अलग थलग कर दिया, और उन्हें अपमानित करके वैदिक परंपरा से दूर कर दिया.. जिससे धीरे धीरे वो समाज से अलग थलग हो गए। मध्य काल में जब इस्लामिक शासकों का भारत पर शासन था तब उन लोगो ने इस्लाम अपनाने से साफ इंकार कर दिया था।
तब कुछ विशेष जाति के लोगो ने इस्लामिक प्रशासन के साथ मिलकर चमड़े का काम करने वालो को पूरी तरह से समाज के बहिष्कृत करने की चाल चली, जो धीरे धीरे एक कट्टर जाति व्यवस्था में बदल गई। चंवर वंश के लोगो को बंदी बना कर उनके सामने शर्त रखी गई कि या तो वो इस्लाम अपना लें, या ऐसे कार्य करें जिसमें सभ्य समाज में घृणा से देखा जाता है, औऱ फिर उन्हें चंवर के बजाय चमार कहने लगे। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी.. धीरे धीरे बहुत से चमार जाति के लोगो ने चमड़े का काम छोड़ दिया और खेती बाड़ी करने लगे।
चमार रेजिमेंट का इतिहास – History of the Chamar Regiment
इस जाति के लोगो ने केवल सामाज में ही एक अहम भूमिका नहीं निभाई, बल्कि देश की रक्षा के मामले में भी उनका साहस भरा इतिहास है। 1 मार्च 1943 में चमार जाति के लोगो ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान दुश्मनों से लोहा लिया। जिस जाति का भारत के लोगो ने बहिष्कार किया था, उन्हें अंग्रेजी हुकुमत ने अपना लिया और चमार रेजिमेंट बनाई। इस रेजीमेंट का नेतृत्व कैप्टन मोहनलाल कुरील कर रहे थे, चमार रेजीमेंट 268वीं भारतीय इन्फैंट्री ब्रिगेड का हिस्सा था, उस दौरान आजाद हिंद फौज अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ सिंगापुर में हल्ला बोल दिया था, जिनके खिलाफ चमार रेजीमेंट के सैनिकों को भेजा गया।
नेतृत्व करने वाले मोहनलाल कुरील ने अंग्रेजो की कुटिलता को समझा और उन्होंने अपने ही लोगों के खिलाफ हमला करने से इंकार कर दिया। जिसके कारण 1946 में चमार रेजीमेंट को भंग कर दिया गया। चमार रेजीमेंट से जुड़े सैनिको ने अंग्रेजों के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया.. सैकड़ो सैनिक शहीद हो गए.. लेकिन उनके साहस की ही देन है जो उन्होंने अपने लोगों के पीठ पर छुरा नहीं भोका.. जैसे कि उस वक्त उंची जाति के लोगो ने किया था। ऐसा था चमारों का इतिहास.. जिसे जानने के बाद आपको केवल गर्व ही महसूस होगा।



