ये दौर 1943 का था, पूरी दुनिया दूसरे विश्वयुद्ध की आग मे जल रही थी। भारत पर ब्रिटिश हुकुमत का राज था, इसलिए भारतीय सिपाहियों को भी भारी संख्या में लड़ने के लिए बेजा गया था, लेकिन तब भी सिपाही कम पड़ गए.. और ऐसे में जाति व्यवस्था की सारी कुरीति को तोड़ते हुए पहली बार उनका आगमन हुआ। जिन्होंने अपनी बहादुरी से दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिये थे। जिन्हें दुनिया ने चमार रेजीमेंट कहा था.. ये शब्द एक निम्न जाति को दर्शाने के लिए इस्तेमाल होता है।
दलित लीडर जिन्होंने देश का नाम किया रोशन
चमार यानि की जिनके पूर्वज चमड़े को सुखाने और उनकी बनी चीजों का इस्तेमाल करते थे, लेकिन विडंबना ये है कि ये बहादुर जाति अछूत कैटेगरी में आने के कारण इनकी अवहेलना हमेशा की गई.. मगर ये 21 शताब्दी है और हम आजाद भारत में रहते है। जिनकी सदियों तक अवहेलना हुई.. आज उन्होंने ही देश का नाम रोशन कर रखा है.. जिनके नेतृत्व की ताकत के आगे केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया सिर झुकाता है। अपने इस लेख में हम भारत के ऐसे दलित नेताओं के बारें में बात करेंगे जिन्होंने चमार शक्ति से भूचाल ला दिया है। जिन्होंने साबित किया कि जाति से ऊपर होती है काबिलियत.. किसी की जाति उसकी काबिलियत तय नहीं कर सकती है।
दलित मुख्यमंत्री मायावती जी – Dalit Chief Minister Mayawati ji
सबसे पहले बात करेंगे- उत्तर प्रदेश की पहली महिला और दलित मुख्यमंत्री- बहन मायावती जी.. एक अकेली महिला की ताकत क्या कर सकती है इसका जीवंत उदाहरण पेश करती है उत्तर प्रदेश की लगातार 4 बार मुख्यमंत्री रही बहन मायावती जी.. कभी आईएस अधिकारी का सपना देखने वाली मायावती ने राजनीति में आने के लिए पिता से भी रिश्ते खराब कर लिये.. क्योंकि उन्हें यकीन था कि कांशीराम जिस मुहीम को चला रहे है वो यूपी के दलितों और पिछड़ो को उंचा उठने में मदद करेगी।
बस फिर क्या था, चल पड़ी राजनीति के रास्ते पर.. 14 अप्रैल 1984 को बाबा साहब अंबेडकर की जयंति के मौके पर कांशीराम ने दलितो के एक नई पार्टी बहुजन समाज पार्टी की नींव रखी.. और मायावती को उनका उत्तराधिकारी बनाया। मायावती ने कांशीराम के भरोसे को बनाये रखा औऱ शेरनी की तरह उनकी गर्जना ने जल्द ही बसपा को यूपी की एक प्रमुख पार्टी बना दी। मगर बहुजन की उपलब्धि में चार चांद तब लगे जब 1995 में बसपा की तरफ से पहली बार मायावती सीएम के पद पर बैठी थी।
उसके बाद मायावती ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा औऱ 1997 में , 2002 में और फिर 2007 में चौथी बार यूपी की सीएम बनी। एक साधारण पृष्ठभूमि से आकर इतना प्रभाशाली व्यक्तित्व बनने को पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने “लोकतंत्र का चमत्कार” कहा था। 2012 में बसपा की हार हुई, जिसके बाद अभी तक बसपा संभल नहीं पाई है लेकिन मायावती की प्रसिद्धि में कोई कमी नहीं आई है। एक दलित महिला का इतना ताकतवर होना ही समाज में बड़ी उपलब्धि है।
रामनाथ कोविंद-Ram Nath Kovind
भारत के 14 राष्ट्रपति चुने जाने वाले पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद यूपी के कोरी अथवा कोली जाति से आते है.. रामनाथ कोविंद एक ऐसी शख्सियत है जिन्होंने ये साबित किया कि शिक्षा को बाबा साहब ने शेरनी का दूध क्यों कहा था। एक गरीब परिवार से आकर भी उन्होंने खुद को शिक्षित करने का लक्ष्य पूरा किया, वकालत की पढ़ाई की और दिल्ली हाईकोर्ट में भी प्रेक्टिस की.. संघ लोक सेवा आयोग तीसरे अटेंप में पास की, औऱ 2014 में बिहार के राज्यपाल नियुक्त हुए। वो भाजपा दलित मोर्चा के अध्यक्ष और अखिल भारतीय कोली समाज के भी अध्यक्ष चुने गए थे। रामनाथ कोविंद के वकील होने औऱ संविधान की अच्छी समझ के कारण उन्हें राष्ट्रपति पद मिला.. जिन्होंने मानव कल्याण की दिशा में काफी काम किया।
जीतनराम मांझी-Jitan Ram Manjhi
बिहार के गया के एक दलित परिवार में जन्मे जीतनराम मांझी बिहार के 23 सीएम चुने गए थे। खेतिहर पिता की संतान जीतन राम मांझी मुसहर जाति से है, जो अछूतो की जाति कहलाती है। मांझी ने उस दौर में तमाम संघर्षों को करके शिक्षा हासिल की, ताकी अपने परिवार का समय बदल सकें। उन्होंने 1980 में राजनीति में प्रवेश किया था, जिन्होंने दलित राजनीति में काफी सक्रियता दिखाई थी, जिसके कारण ही उन्हें अचानक बिहार का सीएम चुना गया था लेकिन दुख की बात है कि वो एक ऐसे सीएम बन कर रह गए जो कुछ लोगों के इशारे पर काम कर रहे थे।
मांझी का सीएम के तौर पर कार्यकाल अच्छा नहीं रहा.. वहीं जीतनराम मांझी उन लोगों में से एक है जो ये कहते है ब्राह्मणवादी परंपरा खत्म होनी चाहिए और ब्राह्मण भारतीय नहीं बल्कि विदेशी है। जेडीयू से मिली अवहेलना के कारण मई 2015 में उन्होंने हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा नाम की एक नई राजनीतिक पार्टी बनाई थी। मांझी की लोकप्रियता ऐसी है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में मांझी सबसे उम्रदराज केंडीडेट होकर भी जीते थे।
चंद्रशेखर आजाद रावण – Chandrashekhar Azad Ravan
अब बात करते है उस नेता की जो इस वक्त राजनीति का सबसे लोकप्रिय नेता बन चुके है। टाइम मैग्जीन में 100 प्रभावशाली युवा नेताओं की सूची में शामिल आजाद ने अपनी शुरु बहुजनों के उत्थान के लिए 21 जुलाई 2015 को भीम आर्मी का गठन कर किया था। भीम आर्मी ने दलितो, और बहुजनो के साथ साथ अल्पसख्यंको के लिए भी न्याय की लड़ाई शुरु की थी.. लेकिन फिर उन्हें लगा कि अगर जातिवाद से लड़ना है तो उसकी जड़ तक पकड़ बनानी पड़ेगी.. बस फिर क्या था 2020 में उन्होंने आजाद समाज पार्टी का गठन किया और कुछ साल में ही उनका प्रभाव बहुजन समाज पर ऐसा था कि 2022 के .यूपी विधानसभा चुनाव में उनकी विशाल जीत हुई और वो नगीना से सांसद चुने गए।
आज केवल आजाद ही नहीं बल्कि उनकी पार्टी आसपा की भी लोकप्रियता कई गुणा ज्यादा बढ़ गई है.. पेशे से वकील रह चुके आजाद ने बहुजनो की जमीनी हकीकत और उनकी स्थिति को टारगेट किया है और वो हमेशा उनके लिए खड़े दिखते है.. जिसके कारण अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में भी उनकी सीएम बनने की दावेदारी लगभग पक्की हो चुकी है। आजाद ने असल में अपने गांव के बाहर द ग्रेड चमार लिखवा कर समाज में इस जाति को जो सम्मान दिलाया है वो काबिले तारीफ है। आजाद सही मायने में दलितों के लिए एक सुनहरा भविष्य लेकर आ रहे है। ये नेता आज भी काफी प्रभावशाली है, और दलित पिछड़ो के लिए काफी अहम कार्य कर रहे है।


