अंग्रेजी हुकुमत के दौरान अदालतें एक ऐसे क्लब की तरह हुआ करती थी, जहां अंग्रेजो के अलावा कुछ खास जातिवर्ग को एलीट बना कर रखा जाता था। भारत के रहीस लोग अंग्रेजी हुकुमत रहीसो की नकल करने की खूब कोशिशें करते थे। कानून का वो कमरा.. एक जातिवादि और सामाजिक भेदभाव की रूढ़ीवादि मानसिकता की गंध से भरा हुआ था,..जब इस माहौल में बाबा साहब दाखिल हुए तो वहां न तो उनके लिए जगह थी और न ही विदेश से शिक्षा हासिल किये हुए शख्स के रूप में कोई सम्मान… था।
अंबेडकर की वो दलील जिसने इतिहास बदल दिया
तो केवल तिरस्कार.. उनकी जाति का.. उन्हें पहले ही दिन अपमानित होना पड़ा.. उनसे कहा गया कि वो इस कमरे के काबिल नहीं है, बाबा साहब की जगह तो कोर्ट के बाहर चबूतरे पर है। बाबा साहब ने इस तिरस्कार को सुना लेकिन वो शांत लहजे में बोले- कि न्याय के लिए सब बराबर है,चाहे वो धूल हो या मखमली कालीन.. बाबा साहब को कई मौके मिले थे जब उन्होंने मुकदमा जीत कर करारा जवाब दिया.. जब उन्होंने गरीब मजदूरो को हड़ताल करने के लिए जन्मसिद्ध अधिकार दिलाया। जानेंगे कहानी 1934 के ऐतिहासिक केस के बारे में..
ऑल इंडिया टेक्सटाइल कॉंफ्रेस
जिसने हजारों मजदूरों को न केवल एकजुट करने की नींव रखी थी, बल्कि उन्हें समझाया कि अगर अधिकार चाहिए तो अलग अलग हो कर नही बल्कि एक साथ होकर मिल मालिको की दादागिरी से लड़ना होगा। दरअसल 1930 के दशक में पूरी दुनिया आर्थिक मंदी के दौर में जाने लगी.. नतीजा भारी संख्या में मिल मालिकों ने मजदूरों को काम से बाहर निकालना शुरु कर दिया, या आधा वेतन देने लगे।
1930 में अग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई को एक तरफ महात्मा गांधी ने मजबूती देना शुरू कर दिया था तो वहीं आर्थिक मंदी के बाद भी मजदूरों के काफी काम लिया जाता लेकिन मंदी का हवाला देकर वेतन के नाम पर कटौती की जाती, इतना ही नहीं जब भी कोई मजदूर बीमार होता तो उन्हें बिना वेतन के काम से बाहर निकल दिया जाता। कई बार बिना गलती के कोई भी बहाना बना कर मजदूरों को नौकरी से निकाल दिया जाता था।
बाबा साहब ने मजदूरो को हड़ताल करने का हक दिलाया
नतीजा मजदूर वर्ग में गुस्सा भरने लगा और तब ऑल इंडिया taxtile workers conference का आगाज हुआ, औऱ साथ ही कुछ ऐसे नेताओ को पहचान मिली..जिन्होंने मजदूरों के हक के लिए जेल तक जाना मंजूर किया। लेकिन कैसै इन नेताओ को बाबा साहब ने बचाया औऱ साथ ही बाबा साहब ने मजदूरो को हड़ताल करने का हक दिलाया था। ये भी सुनिया..मजदूरो ने मिल मालिकों के सामने कुछ मांगे रखी, जैसे की काम के निश्चित घंटे तय करना, काम को लेकर अच्छी परिस्थितियां औऱ माहौल रखना, बिमार पड़ने पर काम से निकालना, वेतन की कटौती करने पर रोक लगाना।
हजारों मजदूरों ने काम छोड़ हड़ताल को चुना
लेकिन मालिकों ने इन मंगो को मानने से इंकार कर दिया, नतीजा मजदूरों ने पहली बार एकता की ताकत दिखाई और एक साथ हड़ताल शुरु कर दी, हजारों मजदूरों ने काम छोड़ हड़ताल को चुना.. अंग्रेजी हुकुमत और मिल मालिकों ने सभी दाव लगा लिये कि वो मजदूर को तोड़ सकें लेकिन ऐसा नहीं हुआ.. इस र मजबूर वर्ग अपने हक के लिए जाग चुका था। लेकिन जब कोई चारा नहीं दिखा.. तब अंग्रेजो ने ट्रेड डिस्प्यूट एक्ट 1929 का इस्तेमाल किया.. एक काला कानून जो मजदूरो के हक के लिए उठने वाली आवाजो को दबाने के लिए लागू किया गया था।
ये काला कानून कहता था कि हड़ताल के कारण अगर लोगो को या सरकार को परेशानी हुई तो वो अपराध की श्रैणी में होगा.. और उससे जुड़े लोगो को गिरफ्तार कर लिया जायेगा। बस इस आंदोलन के साथ भी वहीं हुआ.. मजदूर नेताओ को जबरन जेल में डाल कर उन पर कई धाराये लगा दी गई। विडंबना ये थी कि नेताओ के बिना आंदोलन दिशाहीन हो रहा था तो वहीं दूसरा सवाल था कि अब उन्हें इस काले कानून और क्रूर अंग्रेजो से कौन बचायेगा। कोई अंग्रेजी हुकुमत से लड़ना नहीं चाहता था..ऐसे में उन गरीब मजदूरों के मसीहा बन कर आये बाबा साहब अंबेडकर..
कैसे लड़े बाबा साहब अंग्रेजो के खिलाफ
बाबा साहब मानते थे कि जातिवाद की ही तरह पूंजीवाद भी लोगो के उत्पीड़न का सबसे बड़ा कारण था, उन्होंने सबसे पहले ट्रेड डिस्पयूट एक्ट के बारे में जाना, फिर उन्होंने दुनिया भर के कई मजदूर कानूनो को पढ़ा, लेबर हिस्ट्री के बारे में पढ़ा था। ताकि वो कोई ऐसी कड़ी निकाल सकें जिससे मजदूर बेगुनाह साबित हो सकें। कोर्ट में जब सरकारी वकील ने मजदूरो को बरगलाने और काम ठप कराने का आरोप लगा कर मजदूर नेताओ को सजा दिलवाने की कोशिश की तो बाबा साहब ने सीधे दलील देना शुरू किया।
बिना वेतन के काम कराना अपराध नहीं
उन्होंने कहा कि हड़ताल कोई अपराध नहीं है, ये हर एक मजदूर का हक है जिसको उसकी सही मेहनताना नहीं दिया जाता है, हड़ताल करना भी उसका हिस्सा है। उल्टा उन्होंने मिल मालिकों की धूर्तता का पर्दाफाश करते हुए कहा कि मिल मालिक कम रोशनी में बंद कमरे में उनसे काम करवाते है। तो क्या ये अपराध नहीं है। बिना वेतन के काम कराना अपराध नहीं है.. अन्याय के खिलाफ उठाना अपराध है तो सबसे बड़ा अपराधी तो ये काला कानून है।
बाबा साहब के तर्को से कोर्ट को भी झूकना पड़ा
ये एक्ट केवल पूंजीपतियों के जेबें भरने के लिए होता है, न कि न्याय के लिए। और जरा बताइये कि ताकतवार मिल मालिकों के सामने क्या एक मजदूर टिक पायेगा.. इसलिए ये यूनियन ही कानूनी रूप से मिल मालिको तक लोगो की आवाज पहुंचा सकती है, इसलिए उन्हें आवाज उठाने का पूरा अधिकार है। बाबा साहब के तर्को से कोर्ट को भी झूकना पड़ा और उन्होंने माना कि केवल हड़ताल के लिए जमा होना कोई अपराध नहीं है। सभी नेता रिहा कर दिये गए थे। बाबा साहब ने न केवल मजदूरो के हक में आवाज उठाई थी, बल्कि मजदूरों को यूनियन की ताकत भी बताई। हड़ताल को कानूनी बना दिया गया था।
बाबा साहब मजदूरो के संघर्ष से काफी प्रभावित हुए थे औऱ 1936 में किसानो और दलित मजदूरो के लिए उन्होंने इंडिपेंड लेबर पार्टी की स्थापना की थी। ये बाबा साहब के ज्ञान ही देन है कि 1942 से लेकर 1946 तक वो वायसराय के कार्य़कारी परिषद में वो श्रम मंत्री रहे थे। बाबा साहब ने मजदूरो के लिए श्रम कानून बनाया था, उन्होंने गरीब मजदूरो को संगठन की, एकता की शक्ति से रूबरू कराया था। बाबा साहब का मजदूरों के लिए दिया गया योगदान हमेशा उनका हम पर ऋण रहेगा। जिसे कभी चुकाया नहीं जा सकता है।



