Ambedkar and Savarkar: कैसे थे अंबेडकर और सावरकर के बीच के रिश्ते, सामाजिक सुधारों को लेकर दोनो ने किया काम, लेकिन फिर भी क्यों थे दोनो के रास्ते अलग अलग

Ambedkar and Savarkar
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Ambedkar and Savarkar: पूरी दुनिया में बाबा साहब अंबेडकर और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के बीच जातिवाद को लेकर जो वैचारिक मतभेद था वह जग जाहिर है। गांधीजी की सोच पिछड़ों और दलितों को लेकर जो भी थी उसे लेकर हमेशा बाबा साहब उनके अगेंस्ट रहते थे। उन्हें लगता था कि गांधीजी दो अलग-अलग व्यक्तित्व को लेकर चलते हैं और यही कारण था की उन दोनों की आपस में कभी भी नहीं बनी मगर गांधी जी के अलावा भी एक ऐसे शख्स हुए जिन्होंने सामाजिक सुधारो को लेकर भले ही बाबा साहब का समर्थन किया हो लेकिन कई मुद्दों पर दोनों के विचार बिल्कुल अलग थे, ये शख़्स थे वीर सावरकर।

बाबा साहब के लिए महार आंदोलन उनकी लड़ाई

सारी उम्र जातिगत भेदभाव के खिलाफ लड़ने वाले बाबा साहब के लिए महार आंदोलन उनकी लड़ाई का टर्निंग पॉइंट था। मगर फिर भी इस आंदोलन ने जातिगत भेदभाव को कम करने के बजाय के दलितों की स्थिति को और बद से बदतर कर दिया था। इस आंदोलन के समर्थन में कोई बड़ा नेता नहीं बोला था, ऐसे में सावरकर ने दलित को मंदिर में जाने और उनके सार्वजनिक स्थलों पर पानी पीने का समर्थन किया था। मगर फिर भी जातिगत विचारधारा के कारण दोनो का टकराव होता रहता है। अपने इस वीडियो में हम जानेंगे कि समाज सुधार के मुद्दों पर अंबेडकर और सावरकर के रिश्ते कैसे थे।

सावरकर के खिलाफ थे बाबा साहब

12 अप्रैल 1929 को बहिष्कृत भारत में एक लेख लिखा था, जिसके अनुसार वीर सावरकर ने जब रत्नागिरी में पतित पावन मंदिर बनाने की शुरुआत की थी, जो कि दलितों और पिछड़ो के लिए बनाई जा रही थी, तो बाबा साहब ने इसका विरोध किया था। क्योंकि ये मंदिर बराबरी का नहीं बल्कि जातिगथ भेदभाव का प्रतीक बन कर रह जायेगा… आज जिसे सामाजिक सुधार और बराबरी की दिशा में उठाया गया कदम बताया जा रहा है वो बाद में मात्र अछूतो के मंदिर बन कर रह जायेंगे, जहां केवल अछूत और पिछड़े ही आयेंगे, यहां कोई उंची जाति का नहीं आयेगा..जिससे मंदिर में प्रवेश को लेकर जो लड़ाई है वो वहीं की वहीं रह जायेगी।

बाबा साहब सावरकर के विचारधारा

दरअसल बाबा साहब सावरकर के विचारधारा से भली भांति परिचित थे कि वो भले ही जातिगत भेदभाव के खिलाफ नजर आते है लेकिन असलियत बिल्कुल इसके खिलाफ है। नवंबर 1930 से लेकर मार्च 1931 तक में केसरी अखबार में सावरकर के कई लेख छपे.. इन लेखों में सावरकर के दोहरे चेहरे का पर्दाफाश हो गया.. इन लेखों में सावरकर ने कहा कि वो जातिगत भेदभाव के खिलाफ तो है, लेकिन वर्ण व्यवस्था का समर्थन करते है।

वर्ण व्यवस्था को योग्यता का आधार बताया

जबकि बाबा साहब का मानना था कि वर्ण व्यवस्था ही जातिवाद की मूल जड़ है। 1933 में बाबा साहब ने सावरकर एक पत्र लिख कर उन्हें सच्चाई दिखाने की कोशिश की थी- जिसमें उन्होंने सावरकर के उस विचारों का निंदा की थी जिसमें सावरकर ने वर्ण व्यवस्था को योग्यता का आधार बताया था। ये बेहद ही दुर्भाग्यपूर्ण है, बाबा साहब ने कटाक्ष करते हुए कहा कि वो उम्मीद करते है कि सावर इस तरह के गैरजरूरी शब्द चाल से मुक्त होने की हिम्मत दिखा पाये। लेकिन सावरकर अपने विचारों पर अड़े रहे जिससे बाबा साहब का मोह सावरकर के समाज सुधारों के विचारों को लेकर टूट गया।

सावरकर ने बाबा साहब के विचारों पर निंदा की

बाबा साहब मानते थे कि वो हिंदू रहकर ही समाज में बराबरी और सम्मान मिले तो उन्हें किसी और धर्म में जाने की क्या ही जरूरत पड़ेगी, लेकिन एक बार हिंदू धर्म छोड़ दिया तो मंदिर जाने की कोई जरूरत ही नहीं पड़ेगी.. जिसे लेकर सावरकर ने बाबा साहब के विचारों पर निंदा की थी, सावरकर ने 1935 में निर्भित के अंक में लिखा था- कि हिंदू धर्म में भी हर गैर हिंदू धर्म की तरह इस धर्म में भी तर्कहीनता के कुछ तत्व मौजूद है लेकिन अन्य धर्म भी तर्कहीनता से अछूता नहीं है।

अंबेडकर को अपने ज्ञान का इस्तेमाल करके हिंदू रह कर समाज सुधारों में अपना योगदान देना चाहिए, धर्म बदल कर नहीं..वो केवल 10 साल और इंतजार करें, ये छुआछूत जरूर खत्म हो जायेगा, लेकिन बाबा साहब ने सावरकर को जवाब दिया कि हिंदू धर्म में जातपात 100 सालों तक भी खत्म नहीं होगी।

बाबा साहब ने सावरकर की तारीफ की थी

एक वक्त ऐसा भी था जब बाबा साहब सावरकर के विचारों से काफी प्रभावित थे, और उनके साथ रत्नागिरी में विट्ठल मंदिर के एक समारोह में उनके साथ मंच शेयर करने के लिए तैयार हुए थे, लेकिन किसी जरूरी कारण ने बाबा साहब को वापिस मुम्बई जाना पड़ा, 1927 में जब बाबा साहब मे चावदार तालाब का पानी पीने के लिए जब महार आंदोलन किया था, तो सावरकर ने बिना किसी लाग सपेट के इस आंदोलन का समर्थन किया था।

दलित बस्ती में भारी तबाही

हालांकि ये आंदोलन सफल नहीं हुआ था, सवर्णों ने दलित बस्ती में भारी तबाही मचाई, तालाब का फिर से शुद्धिकरण कराया गया। सावरकर ने छुआछूत की निंदा करते हुए धर्म के आदेश पर इसे समाप्त करने की वकालत की थी। न्याय और मानवता की व्य़वस्था इसे समाप्त करके ही कायम की जा सकती है।ये हर हिंदू का फर्ज का है कि वो हर हिंदू के अधिकारों की रक्षा की दिशा में कदम उठाये। बिना किसी भेदभाव के।

सावरकर भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते थे, लेकिन वर्ण व्यवस्था के खिलाफ नहीं थे, जिसके कारण बाबा साहब सावरकर के सामाजिक सुधारों के लिए जो विचार थे उसके विरोध में थे। दोनो ने समाज सुधार और जातिगत भेदभाव की दिशा में काम किया था, लेकिन सावरकर के उठाये कदमों को बाबा साहब बाकि हिंदुओं को दलित हिंदुओं से बांटने वाला मानते थे। जिसके कारण दोनो के विचारों में काफी असमानता था। समाज सुधारक होते हुए भी दोनो के रास्ते अलग ही रहे थे।

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