Dr. Ambedkar Advocacy: आपने भारतीय कानून की एक बात कभी न कभी जरूर सुनी होगी, भले ही 100 अपराधी छूट जायें लेकिन किसी एक बेगुनाह को कभी सजा नहीं होनी चाहिए.. कई बार इस कारण कानून की कमियों की वजह से अपराधी छूट जाते है, तो वहीं कानूनी कमियो के कारण कई बार आपने जजो के किए गए फैसले भी बदलते देखें होंगे, लेकिन क्या आप ये जानते है कि कानून की इस कमी के कारण बाबा साहब ने एक जज के फैसले को बदलने पर न केवल मजबूर किया।
बल्कि उन्होंने एक फांसी की सजा पाये शख्स को भी मौत से बचा लिया था, अपने इस लेख में हम जानेंगे कि आखिर क्या हुआ था ऐसा, औऱ कैसे बाबा साहब ने फांसी की सजा मिलने के बाद भी उसे अपनी दलीलो से मरने से नहीं दिया था.. और बाबा साहब की दलीलो का जवाब खुद कोर्ट के जजो के पास भी नहीं था।
बाबा साहब की वकालत
दरअसल बाबा साहब 1923 में लंदन से पढ़ाई कर के बॉम्बें हाइकोर्ट में बतौर वकील प्रेक्टिस शुरु करने तो आये थे लेकिन वहां भी जातिगत भेदभाव ने उनका पीछा नहीं छोड़ा.. कोर्ट के अंदर ब्रिटिश और ब्राह्मणवादी वकीलों का ही दबदबा था, नतीजन बाबा साहब को कोर्ट परिसर के अंदर जगह ही नही दी गई। उनके साथ छुआछूत किया जाता था, लेकिन बाबा साहब अपनी आंखो में दलितों को आजाद कराने की प्रण लेकर कोर्ट में दाखिल हुए थे तो भला उन्हें ये भेदभाव और उत्पीड़न कहां की परेशान करता।
वो इसे अपनी जिंदगी का हिस्सा मानते थे.. उनके मन में तो केवल ये विचार कौंधता था कि उन्हें दबे कुचले लोगो के लिए हमेशा खड़ा रहना है जिसके लिए उन्होंने शिक्षा हासिल की थी, पैसा कमाना तो उनका ध्येय कभी था ही नहीं.. वो केवल न्याय चाहते थे, वो जानते थे कि भेदभाव के कारण पिछड़े दलित लोग आर्थिक रूप से कमजोर है, ऐसे में वो भला बाबा साहब की फीस कहां से देते… बाबा साहब कम फीस में या मुफ्त में ही मुकदमा लड़ते थे।
सेठ के इकलौते बेटे पर हत्या का आरोप
इसी दौरान बाबा साहब के पास एक केस आया.. ये केस था मुम्बई के एक धनी सेठ के बेटे का.. सेठ के इकलौते बेटे पर हत्या का आरोप लगा था औऱ निचली अदालत पहले ही अपने फैसले में उसे फांसी की सजा दे चुकी थी। लेकिन सेठ हर हाल में अपने बेटे को मरने से बचाना चाहता था, सेठ ने उस समय शहर के बड़े से बड़े वकीलो से बात की, लेकिन कोई भी एक हारे हुए केस को नहीं लेना चाहता था, सजा पहले ही मुकरर हो चुकी थी,
सबूत गवाह सब उसके खिलाफ थे तो भला सेठ के बेटे को मरने से कैसे बचाया जा सकता था। सेठ कोर्ट के चक्कर लगाता रहा, वो कोई भी कीमत चुकाने के लिए तैयार था।
ऐसे में एक ब्राहमणी वकील जो कोर्ट के अंदर बैठता था उसने सेठ को तंज कसते हुए कहा कि तुम्हारे बेटे को तो वो बाहर चबूतरे पर बैठा महार जाति का वकील ही बचा सकता है, ये भले ही तंज था लेकिन जब कोई चारा नहीं दिखा तो अंत में सेठ ने बाबा साहब के सामने हाथ जोड़ कर उनके बेटे को बचाने की अपील की.. बाबा साहब जानते थे कि वो फांसी की सजा को नहीं रूकवा पायेंगे लेकिन सेठ को गिड़गिड़ाते हुए देखकर उन्हें अपनी मां की सीख याद आई… और उन्होंने सेठ को आश्वासन दिया कि वो सेठ के बेटे को मरने नहीं देंगे।
क्या दी बाबा साहब ने दलील
बाबा साहब ने केस की फाइल को बड़े ध्यान से पढ़ा और वो केस में से एक ऐसा लूपहोल निकाल लिया जिसके आधार पर वो सेठ के बेटे को मरने से बचा लेते। बाबा साहब ने सेठ को आश्वासन देकर अगली तारीख पर आने को कहा। समय बीतता गया औऱ मामले की सुनवाई करने के लिए हाई कोर्ट की तारीख आ गई। कोर्ट का पूरा परिसर उस दिन भीड़ से खचाखच भरा था, जिस केस को किसी वकील ने नहीं लड़ा उसे बाबा साहब ने लड़ने का फैसला किया.. वहीं दूसरी तरफ दूसरे वकील उनकी जाति के कारण हीन दृष्टि से देखते थे ऐसे में बाबा साहब अगर हारते तो वकीलो को मौका मिलता उन्हें नीचा दिखाने का।
सुनवाई शुरु हुई,,, उम्मीद थी कि बाबा साहब कुछ तो ऐसी दलील देंगे जिससे केस का रूख पलट जायें, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.. उल्टा उन्होंने जज को फैसला सुनाने को कहा.. ये देखकर सभी हैराना थे, तो कुछ तीखी मुस्कान दे रहे थे.. वकीलो ने सोचा जो बड़े बड़े वकील नहीं कर पाये वो भला बाबा साहब कहां से कर पाते.. वहीं सेठ ने सोचा कि शायद उनके साथ धोखा हो गया है। जज ने हैरानी से बाबा साहब की तरफ देखा और फैसला सुनाना शुरु कर दिया। फैसला निचली अदालत जैसा ही थी… कोर्ट ने सेठ के बेटे को दोषी मान कर फांसी पर लटकाने की सजा सुना दी..
जानें कैसे बची जान
फांसी की सजा पाने के बाद जब पुलिस वाले सेठ के बेटे को लेकर जाने लगे, तभी बाबा साहब ने अपना अंतिम दाव खेला.. उन्होंने जज से पूछा कि सेठ के बेटे के केवल फांसी पर लटकाने की सजा हुई है, उसे मारने की नहीं। जज को कुछ समझ नहीं आया। जिसके बाद शुरु हुई बाबा साहब की दलील. बाबा साहब ने कहा कि आपने सजा के तौर पर फांसी पर लटकाने की सजा दी है, लेकिन कहीं भी ये नहीं कहा कि उसका मरना जरूरी है। कानून की किताब के मुताबित सजा उतनी ही होगी जिसकी जज ने लिखी हो, वहीं जज साहब ने सेठ के बेटे को भी केवल फांसी दी थी, मरने तक फांसी पर लटकाने की सजा नहीं दी थी।
इस तर्क पर जज भी कुछ न कह सकें औऱ कोर्ट में मौजूद सभी वकील भी कानून की कमजोरी से रूबरू हो गए थे, उन्होंने पहली बार महसूस हुआ कि वाकई में बाबा साहब की काबिलियत क्या थी। जज ने सेठ के बेटे की फांसी को रद्द कर दिया और मामले की सुनवाई फिर से शुरु हुई। बाबा साहब की दलीलों के आगे जज भी नतमस्तक हो गए थे। ऐसी थी बाबा साहब की दलील देने की कला.. जिसके आगे सभी सिर झुकाते है।



