ये तो हम सभी जानते है कि बाबा साहब अंबेडकर ने अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले ही बौद्ध धर्म अपना लिया था.. उन्होंने किसी भी पुरानी परंपरा को चुनने और उसका पालन करने के बजाये भीम परंपरा जिसे नवयान परंपरा कहा गया, उसे शुरु किया.. इस दौरान उन्होंने 22 कठोर प्रतिज्ञायें ली थी.. शायद हर धर्म में परिवर्तन के कुछ नियम होंगे।
लेकिन बाबा साहब द्वारा ली गई इन 22 प्रतिज्ञाओं को लेकर हिंदुओ ने काफी नाराजगी जताई.. इन प्रतिज्ञाओ को लेकर ये भी कहा गया कि ये हिंदू धर्म के प्रति नफरत फैलानी वाली, उन्हें बरगलाने वाली परंपराएं है. जिनकी कुछ शपथों को लेकर आज भी विवाद जारी है। अपने इस लेख में हम जानेगें कि आखिर वो कौन कौन सी प्रतिज्ञायें है जिसे लेकर आज भी विवाद बना हुआ है.. जिसका हिदूं संगठन विरोध करते है.. और क्यों इन प्रतिज्ञाओं को हिंदू धर्म के खिलाफ बताया गया है।
बाबा साहब की 22 प्रतिज्ञायें
बाबा साहब ने 14 अक्टूबर 1956 में नागपुर की दीक्षाभूमि में बौद्ध धर्म अपनाया था, तब जो 22 प्रतिज्ञाएं उन्होंने बौद्ध अनुयायी बनते समय ली थी वहीं प्रतिज्ञायें उनके साथ बौद्ध धर्म अपनाने वाले करीब 3.85 लाख दलितों ने भी ली थी। बाबा साहब ने नवयान परंपरा के साथ ही 22 प्रतिज्ञाओं का एक घोषणापत्र पढ़ा था, जो संकेत था कि जो भी नवयान परंपरा को अपनायेगा उसे इन 22 प्रतिज्ञाओं को मानना ही होगा। बाबा साहब का कहना था कि ये 22 प्रतिज्ञाये ही आपको आपके पुराने धर्म के बंधन से काट पायेगी.. इसलिए इनका हर हाल में पालन करना अनिवार्य होगा।
राम कृष्ण को भगवान नहीं मानेंगे
बाबा साहब की 22 प्रतिज्ञाओं में 1 से लेकर 8 प्रतिज्ञाये पूरी तरह से हिंदू धर्म और उनके देवी देवताओ के खिलाफ है, जिसमें वो साफ कह रहे है कि वो ब्रह्मा, विष्णु और महेश में कोई विश्वास नहीं करेंगे, राम कृष्ण को भगवान नहीं मानेंगे, हिंदू देवी देवताओ का आना, उनका अवतार लेना सबकुछ मनगढ़ंत है और वो कभी भी इस पर विश्वास नहीं करेंगे। वो किसी भी तरह के हिंदू धर्म के मृत्यु पश्चात किये गए क्रियाकलापो का हिस्सा नहीं बनेंगे। साथ ही ब्राह्मणो द्वारा निष्पादित कार्यक्रमो का कभी हिस्सा नहीं बनेंगे… यानि की बाबा साहब ने न केवल हिंदू देवी देवताओ के अस्तित्व को लेकर सवालियां निशान खड़े कर दिये थे बल्कि उन्होंने ब्राह्मणी विचारधारा का पूरी तरह से त्याग कर दिया था।
मानवता के विकास में सबसे बड़ा बाधक हिन्दू धर्म
लेकिन 19 प्रतिज्ञा में उन्होंने घोषणा की कि वो हिंदू धर्म का इसलिए त्याग कर रहे है क्योंकि असल में हिंदू धर्म मानवता के लिए हानिकारक है…लोगों की वास्तविक उन्नति और मानवता के विकास में सबसे बड़ा बाधक है हिंदू धर्म, क्योंकि यह असमानता पर आधारित है.. जिसमें जातिगत असमानता सबसे पहले है, जो व्यक्ति को एक दूसरे के प्रति हीन भावना सिखाता है। वो ऐसे धर्म का त्याग कर रहे है। बाबा साहब ने सीधे तौर पर 19वीं प्रतिज्ञा में बता दिया था कि हिंदू धर्म एक ऐसा धर्म है जो जोड़ना नहीं तोड़ना जानती है, और ऐसे धर्म का नाश होना ही चाहिए.. चुंकि भारत हमेशा से एक हिंदू प्रधान देश रहा है ऐसे में भले ही धर्म बदलने का फैसला करने पर विरोध कम हुआ लेकिन हिंदू धर्म को शपथ के नाम पर बदनाम करने की कोशिश के कारण हिंदुओ ने नाराजगी जताई।
क्या कहते है हिंदू संगठन
हिंदू संगठन का साफ कहना है कि धर्म बदलने का फैसला उनका नीजि थी, लेकिन वो उसके लिए किसी और धर्म पर कटाक्ष नहीं कर सकते है उन्हें बदनाम नहीं कर सकते है। जबकि दुनिया का सबसे पुराना धर्म सनातन है। जिसका पालन सदियों से, युगो युगो से किया जा रहा है.. ऐसे पवित्र धर्म के बारे में अपशब्द कहना बिल्कु उचित है। सनातन के धर्म ग्रंथो को आज पूरी दुनिया मान रही है।
लेकिन बाबा साहब ने उनका त्याग करने को कहा है..बौद्ध धर्म अपनाना,, और लाखों लोगो को अपने साथ बौद्ध धर्म की तरफ ले जाना उनका अपना फैसला था, जिसे लेकर पहले भी कई लोगो ने बाबा साहब को समझाया भी थे, लेकि बाबा साहब हमेशा से जिद्दी थे और वो हिंदू धर्म छोड़ने के फैसले पर अड़े रहे थे।
धार्मिक परंपराओं का अपमान
हिंदू संगठनो का साफ कहना है कि किसी नए धर्म को अपनाने के लिए आप दूसरे धर्म के देवी देवताओं, उनकी धार्मिक परंपराओं का अपमान करने का अधिकार नहीं होना चाहिए। सीधे और साफ लहजे में कहा जाये तो ये विवाद असल में समानता की सोच रखने वाली बौद्ध विचारधारा औऱ वर्ण व्यवस्था की आड़ में लोगों का शोषण करने वाली हिंदू वर्ण व्यवस्था के बीच है। जो आज भी जारी है। बाबा साहब ने हिंदू धर्म में रहकर ही पहले धर्म के साथ बराबरी की कोशिश की थी, जिसका एक सटीक उदाहरण है महार आंदोलन.. वो तो केवल दलितो और पिछड़ो को पानी पिलाने का हक दिलाना चाहते थे लेकिन बदले में क्या हुआ।
जातिवादी दबंगो ने दलितो को बुरी तरह के मारा..ताकि वो ये दुबारा हिम्मत न कर सकें.. तो बात साफ है जिस धर्म में दलितों पिछड़ो को इंसानो के कैटेगरी में भी नहीं रखा जाता है ऐसे धर्म को छोड़ देना ही बेहतर है। इसलिए जो गलतफहमी इन 22 प्रतिज्ञाओं को लेकर फैलाई गई वो पूरी तरह से गलत है.. इसमें उन्होंने केवल उनका त्याग किया है जो बांटना सिखाते है.. किसी के कोई एक देव तक नहीं है उनके तो भगवान भी बंटे है.. भला ऐसा धर्म जो भगवान को भी बांटने से पीछे नहीं हटता है वो भला इंसालो का कहां अपने साथ बराबरी करने देगा।



