Ambedkar Historic Case: अंग्रेजो ने भारत पर राज करने के लिए सबसे पहले यहां के धनी जमींदारों को अपने पाले में लाना शुरु किया,… उन्होंने जमींदारो को जमीन देकर ज्यादा धनवान बना दिया ताकि वो वक्त आने पर उनकी मदद करें,, वहीं गरीब किसानों को उन जमीनो पर काम करने का तो हक था लेकिन उस जमीन पर मालिकाना हक पाने का नहीं,. नतीजा एक बड़ा तबका शोषण का शिकार हो रहा था.. बाबा साहब अंबेडकर ने हमेशा शोषित वर्गो के लिए लड़ाई लड़ने की कसम खाई थी और वो भी पूंजीपती विचारधारा के खिलाफ थे।
बाबा साहब ने पहली बार पूंजीपतियों के लिए केस लड़ा
लेकिन जब आजादी के बाद कांग्रेस ने भूमि सुधार के नाम पर वंचितों और गरीबों को पूंजीपतियों की वो जमीने देनी शुरू कर दी, जिसपर वो सालो से काम कर रहे थे.. ऐसे में जब पूंजीपति मदद के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचे तो वकील के तौर पर बाबा साहब ही आगे आये थे। जी हां, ये बात आपको हैरान कर सकती है लेकिन यहीं सच है कि बाबा साहब ने पहली बार पूंजीपतियों के लिए केस लड़ने का फैसला किया। अब सवाल ये है कि हमेशा गरीबों को लिए लड़ने वाले दलितों के मसीहा बाबा साहब ने क्यों लड़ा अमीरों का केस? अपने इस लेख में हम अंबेडकर की उस ऐतिहासिक जंग के बारे में जानेंगे जिसने ये साबित किया कि जो सच्चा है बाबा साहब उनके लिए सदैव खड़े रहेंगे।
बिहार के नए नियमों को पटना के हाईकोर्ट में दी चुनौती
ये बात साल 1950 की है, बिहार की सरकार ने बिहार भूमि सुधार अधिनियम 1950 पारित किया। बिहार जो कि पूंजीपतियों का गढ़ कहलाता था, एक विशेष जाति वहां पर जमीनों के मालिकाना हक लिये बैठे थे, ऐसे में कोई भी अपनी जमीन क्यों देगा.. बस जमींदारों ने इस अधिनियम के खिलाफ लड़ने का फैसला किया। दरभंगा के महाराज कामेश्वर सिंह ने बिहार के नए नियमों को पटना हाईकोर्ट में चुनौती दे दी, कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई की और इस अधिनियम को अंसवैधानिक करार देते हुए खारिज करने की बात की।
लेकिन सरकार पूंजीपतियों के आतंक को खत्म करने पर आमादा थी, नतीजा हाल ही में बने सुप्रीम कोर्ट में फिर से बिहार सरकार ने याचिका दे दी। ये वक्त था 1952 का, तब बाबा साहब राजधानी दिल्ली में रह रहे थे। वकालत लगभग छोड़ चुके थे, और कानून मंत्री के तौर पर इस्तीफा दे चुके थे। ऐसे में जमींदारों का ये मामला पहुंचा बाबा साहब अंबेडकर के पास।
क्या कहता है अनुच्छेद 31
बाबा साहब भले ही चाहते थे कि भूमि सुधार हो, लेकिन उन्होंने उसके लिए किसी के अधिकारों को जबरन खत्म किया जाये ये नहीं चाहा था। संविधान के अनुच्छेद 31 के मुताबिक किसी की भी जमीन तभी ली जा सकती है जब वो किसी सार्वजनिक उद्देश्य और सबके भले के लिए हो, उसके बदले मुआवजा भी मिलना चाहिए। लेकिन जब पूंजीपतियों की जमीन ली जाने लगी तो न तो उन्हें ढंग के मुआवजा मिलता और न ही सरकार उनकी कोई मदद करती थी। मुआवजे के नाम पर पूंजीपतियों के साथ धोखा कर रही थी सरकार.. ऐसे में बाबा साहब न्याय के लिए खड़े हुए.. बाबा साहब ने कहा कि सरकार गरीबों और वंचितो का भला करने के नाम पर किसी अन्य के साथ अन्याय नही कर सकती है।
क्योंकि अगर उन्हें तब नहीं रोका गया तो एक वक्त ऐसा भी आयेगा जब दलितों और पिछड़ो की संपत्ति को भी छीन लिया जायेगा औऱ उन्हें न्यायगत मुआवजा भी नहीं मिलेगा। यानि की ये तय था कि बाबा साहब कोर्ट में किसी एक अमीर जमींदार की मदद करने के लिए नहीं लड़ने गए थे, बल्कि वो भविष्य में प्रताड़ित होने वाली पीढ़ियों को बचाने गए थे.. सरकार जो कर रही थी वो सार्वजनिक भला करने के नाम पर डकैती थी, जिसे कानून के दायरे में लाने का प्रयत्न किया जा रहा था।
क्या हुआ सुप्रीम कोर्ट में
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरु हुई, सामने जज के रूप कुर्सी पर बैठे थे चीफ जस्टिस पतंजलि बी.शास्त्री और सामने दलील देने के लिए खड़े थे भारत के एक महान वकील बाबा साहब अंबेडकर।
अपने बनाये अनुच्छेद का लिया सहारा- बाबा साहब अंबेडकर ने दलील शुरु करते ही संविधान का ही सहारा लेते हुए अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार, और अनुच्छेद 31, संपत्ति का अधिकार का जिक्र करते हुए बिहार सरकार पर आरोप लगाया कि बिहार सरकार का बनाया कानून जमीनों का अधिग्रहण करने के बजाये जब्त कर रहा है। मुआवजा हमेशा नुकसान की बराबरी के बदले बराबर मिलना चाहिए। बाबा साहब ने अपनी दलील में कहा कि सरकार को विशेष कार्य़ों के लिए जमीन लेने का अधिकार तो है लेकिन उसकी पहली शर्त यहीं है कि संपत्ति के बदले उचित मुआवजा मिले। लेकिन बिहार सरकार ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम में मुआवजे की जो जो शर्ते है, उससे तो जमींदारों को मुआवजा संपत्ति के दसवे भाग के बराबर भी नहीं मिल रहा है। जो कि जमींदारों के साथ अन्याय है।
जानें कोर्ट का फैसला क्या था?
सुप्रीम कोर्ट ने काफी सोचा विचारा.. क्योंकि न्याय ऐसा होना चाहिए था जो कि संवैधानिक भी हो और सामाजिक बदलाव की दिशा में भी.. इसलिए कोर्ट ने फैसला सुनाया कि भूमि सुधार उन्मूलन अधिनियम काफी हद तक संवैधानिक है लेकिन अधिनियम के 23F और 4b को अंवैधानिक ठहराया, जिसके आधार पर जमींदारों को लगभग कुछ प्रतिशत मुआवजा देकर उनकी लाखों करोडो की संपत्ति पर डाका डालने की कोशिश कर रहे थे उसे रद्द कर दिया गया। मुआवजे के नाम पर किसी से भी धोखा नहीं किया जा सकता है, चाहे वो अमीर जमींदार हो, या किसान। इस केस के कारण ही पहले पीएम नेहरू ने जमीन अधिग्रहण को न्याय पालिका में चुनौती न मिले उसके लिए पहला संविधान संशोधन 1951 किया गया।
जिसके तहत नौवी अनुसूचि जोड़ी गई। भूमि सुधार कानून को इसका हिस्सा बनाया गया.. ताकि उसके अनुसार ही अधिग्रहण और मुआवजे की बात हो। हालांकि बाबा साहब इस बदलाव के खिलाफ थे.. लेकिन वो कुछ नही कर पायें..बाबा साहब ने ये केस इसलिए लड़ा था कि सरकार का भले ही उद्देश्य अच्छा हो, लेकिन जमीनों को लेने का तरीका, और मुआवजा देने की पद्दति अन्यायपूर्ण थी। बाबा साहब ने ये मुकादमा लड़ कर न्याय औऱ संविधान की रक्षा की थी। जो एक बड़े बदलाव का कारण बना। बाबा साहब ने सही मायने में संविधान की ताकत का अहसास कराया था।



