शाक्य मुनि गौतम बुद्ध ने केवल लोगो के दुखो के कारणों को जानने के लिए ही वैराग्य धारण नहीं किया था। तप नहीं किया था बल्कि उन्होंने लोगो को व्यक्ति के उन विकारों से भी मुक्त करने की मुहीन शुरु की थी, जिसके कारण की पापी हो जाता है, पाप करता है, गुनाह करता है.. भले ही कभी अंजाने में तो कभी जानबूझ कर.. और आगे जाकर उन गुनाहो का फल भोगना पड़ता..बुद्ध ने बताया कि उनकी नजरों में कोई उंचा नीचा, छोटा बड़ा, नहीं है बल्कि सभी एक समान है।
कोई अमीर है, कोई गरीब है, कोई चरित्रवान है या कोई चरित्रहीन.. ये उस वक्ति की भावना तय करती है। कि कोई किस भावना से अपने कर्म कर रहा है.. क्योंकि कोई धनी सेठ गलत भावना के अच्छे कर्म भी करें तो भी उसका फल उसे बुरा ही मिलेगा, लेकिन अगर कोई गलत कार्य भी बेहतर भावना के साथ कर रहा है तो उसका परिणाम सकारात्मक ही होगा। बुद्ध ने इस ज्ञान को समझाने के लिए पूरे गांव को चरित्रहीन होने का सही अर्थ समझाया था। जिसने गांव के हर पुरुष का सिर शर्म से झुकने पर मजबूर कर दिया था।
युवावस्था में हमारा शरीर युवा और आकर्षक
दरअसल कहा जाता है कि एक बार बुद्ध अपने शिष्यो के साथ किसी गांव में गए हुए थे। वहीं गांव में एक महिला के घर के बाहर जाकर बुद्ध ने भिक्षा मांगी.. घर के अंदर से सुंदर सी स्त्री, पूरे श्रृंगार में निकली थी। स्त्री ने देखा कि एक युवा युवक गेरूआ वस्त्र धारण करके भिक्षा मांग रहा है। स्त्री से रहा नहीं गया, उसने पूछा कि आप तो राजकुमार की तरह हो, लेकिन युवास्था में सुख भोगने के बजाये वैरागी क्यों बन गए। जिस पर बुद्ध ने बड़ी सरलता से कहा कि वो तीन प्रश्नों के उत्तर खोजने के लिए वैरागी बने..घर से निकले है।
पहला प्रश्न वृद्धावस्था क्यों आता है, बीमारी का क्या कारण है और मृत्यु क्या है। बुद्ध ने कहा कि युवावस्था में हमारा शरीर युवा और आकर्षक लगता है, लेकिन यह कुछ सालों के बाद बूढ़ा होगा, फिर बीमार और कमजोर हो जायेगा और अंत में ये शरीर मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा। वो जानना चाहते थे कि व्यक्ति को इन चक्रों से क्यों गुजरना पड़ा है। व्यक्ति के दुखो का क्या है.. और उन्होंने जाना की मोह और लालच हमारे दुखों का सबसे बड़ा कारण है।
महिला ने बुदध को भोजन पर बुलाया
बुद्ध की ज्ञान की बातें सुनकर महिला की आँखो से स्वतः ही आंसू निकल आये.. क्योंकि गांव का कोई भी व्यक्ति महिला को अच्छी नजरो से नहीं समझता था.. उसे चरित्रहीन कहते थे.. लेकिन बुद्ध ने महिला का केवल पवित्र मन था.. उसकी बाहरी आडंबरो को नहीं। महिला ने बुदध को भोजन पर बुलाया.. जिसे बुद्ध ने सहर्ष स्वीकार कर लिया था.. लेकिन ये बात गांव के पुरुषों को पसंद नहीं आई, बुद्ध जैसे महात्मा एक चरित्रहीन स्त्री के घर जायेंगे तो यो वो बुद्ध की छवि के लिए भी नुकसानदेह हो सकता था.. गांव के पुरुषों ने बुदध को समझाने की कोशिश की.. कि चरित्रहीन लड़की के घर न जाये।
महिला अकेले कैसे चरित्रहीन हो सकती है?
जिसपर बुद्ध ने बड़े लहजे में पूछा कि अगर पुरुष बुद्ध को उस महिला के घर नहीं जाने दे रहे है तो इसका मतबल है इस गांव के सभी पुरुष चरित्रहीन है। गांववालो को उनकी बात समझ नहीं आई, जिसके बाद बुद्ध ने गांव के सरपंच का एक हाथ पकड़ कर कहा कि वो एक हाथ से ताली बजायें… लेकिन भला एक हाथ से ताली कहा बजती है। को सभी पुरुषों ने हार मान ली.. जिसके बाद बुद्ध ने कहा कि जिस प्रकार एक हाथ से ताली नहीं बजती वैसे ही कोई महिला अकेले कैसे चरित्रहीन हो सकती है जबतक कि पुरुष उसे चरित्रहीन न बनायें..
बुद्ध की बातेंस सुनकर वहां मौजूद सभी पुरुषों के सिर शर्म से झुक गए..वो समझ गए कि किसी औऱ के चरित्र पर सवाल उठाने से पहले उन्हें अपने गिरेबान में भी झांगना चाहिए था। अगर पुरुष चरित्रहीन नहीं होते तो महिला भी नहीं होती. सभी ने बुद्ध के आगे सिर झुका लिया.. उन्हें अपनी गलती और पाप दोनो का अंदाजा हो गया था। इसिलए कहते है कि किसी पर उंगुली उठाने से पहले व्यक्ति को अपने गिरेबान में भी झांकना चाहिए। बुद्ध की इस शिक्षा पर आपकी क्या राय है हमें कमेंट करके जरूर बतायें।



