Bombay High Court: ये समय था 1920 का दशक..,पहला विश्व युद्ध समाप्त हो चुका था, और जलियांवाला हत्याकांड के बाद भारतीयों का विश्वास अंग्रेजी हुकूमत से उठ चुका था, वहीं अंग्रेजो ने उनके खिलाफ उठने वाली आवाजों को दबाने के लिए झूठे दंगे कराने, कानून तोड़ने जैसे झूठे आरोप लगा कर मासूम लोगो के खिलाफ फर्जी मामले लगा कर जेल मे डाल देने का काम शुरु कर दिया था। वहीं 1920 में अंग्रेजी हुकुमत की दमनकारी नीतियों, रोलेट एक्ट और खिलाफत आंदोलन और उनके द्वारा जबरन थोपे गए विदेशी सामानों के उपभोग को रोकने के लिए गांधी जी ने असहयोग आंदोलन शुरु किया था।
1922 को चौरा चौरी में पुलिस स्टेशन में लगाई आग
वैसे तो ये एक अहिंसक आंदोलन था, लेकिन 5 फरवरी 1922 को चौरा चौरी में पुलिस स्टेशन में लगाई गई आग में मारे गए 22 पुलिस कर्मियों की मौत की खबर सुनने के बाद गांधी जी ने आंदोलन वापिस ले लिया था, लेकिन गांधी जी के पीछे हटने से अंग्रेजी हुकुमत को और मौका मिला भारतीयो का दमन करने का.. खासकर जो गरीब, कमजोर और पिछड़े है, उन्हें झूठे मामलों में फंसा कर जेल में डाल दिया जाता था.. लेकिन उसी दौर में 1923 में एंट्री होती है बैरिस्टर डॉक्टर भीम राव अंबेडकर की।
जिन्होंने लंदन के ग्रेज इन से बैरिस्टर की डिग्री हासिल की और वापिस आकर बॉम्बे हाइकोर्ट में प्रेक्टिस शुरु कर दी थी… बाबा साहब का व्यक्तित्व और उनका ज्ञान ऐसा था कि उनकी दलीलो के आगे अंग्रेजी जज भी झेंप जाते थे। अपने इस लेख में हम बाबा साहब के एक ऐसे मुकदमे के बारे में बात करेंगे, जब जजों को भी पहली बार एहसास हुआ कि दलित अब कमजोर नहीं है।
बॉम्बे हाइकोर्ट में बाबा साहब वकालत करते थे
क्या है यशवंत सतवा चौगुले मामला- दरअसल 1920 के दशक में बाबा साहब ने एक ऐसे मामले को ब्रिटिश जजो के सामने अपनी दलिलों से उनके लूप होल्स को सामने रख दिया था, जिसकी बदौलत ब्रिटिश हुकुमत की पुलिस कमजोर और निर्दोषों पर जबरन आरोप मढ़ कर उन्हं सलाखो के पीछे धकेल देते थे। कुछ ऐसा ही हुआ था यशवंत सतवा चौगुले मामले में, जब उन्हें एक भीड़ के साथ गिरफ्तार किया गया था, जबकि उन्हें इस बारे में पता ही नहीं था कि उनका अपराध क्या है, और क्यों वो कटघरे में खड़े हुए है, जबकि वो तो गरीब मजदूर थे।
उन दिनों बाबा साहब बॉम्बे हाइकोर्ट में वकालत करते थे.. और चबूतरे वाले वकील के रूप में प्रसिद्ध हो चुके थे, जो गरीब और कमजोरो के लिए मुफ्त में केस लड़ा करते थे, बस फिर क्या था ये मामला बाबा साहब के हाथों में आया और जो शांत स्वर में ताकतवक दलीले बाबा साहब ने दी.. उन दलीलो के आधार पर ब्रिटिश कानूनों में न केवल बदलाव लाया गया बल्कि पहली बार विपक्षी वकील और जजो को अपना मुंह बंद करना पड़ा।
क्यों हुई थी गिरफ्तारी
अब जानते है कि आखिर यशवंत सतवा चौगुले की गिरफ्तारी किस आधार पर हुई थी, दरअसल जब आप ब्रिटिश संविधान की पुरानी प्रतिया देखते है तो पायेंगे कि भारतीय दंड संहिता आईपीसी 141, जो गैरकानूनी रूप से लोगो की भीड़ जमा करने और किसी गलत इरादे से जमा होने के खिलाफ कानून को दर्शाता है, अगर एक समान उद्देश्य से लोग इकट्टठा होते है और सरकारी सामानों को नुकसान पहुंचाते है, या कोई ऐसै भाषण देते है जिससे शांति बिगड़ सकती है तो वो कानूनन अपराध है। वहीं क्रिमिनल कोड प्रोसीजर 1898, सेक्शन 225 के अनुसार ये कानून था कि कोर्ट में दायर की गई चार्जशीट में कोई बिंदु छूट जाता है, जिससे आरोपी गुमराह न हो, या उससे न्याय बाधित हुआ हो, तो उस कमी को बड़ी भूल नहीं माना जायेगा, औऱ मामला आगे बढ़ता रहेगा।
यहीं हुआ था यशवंत सतवा चौगुले के केस में… उन्हें भी ये नहीं पता था कि आखिर उन्हें किस आरोप में पकड़ा गया था, बस उन पर गैरकानूनी रूप से जमा होने का आरोप लगा दिया गया था.. वो ब्रिटिश पुलिस के अत्याचारों के शिकार हो गये थे। जबकि चार्जशीट में कहीं भी ये मेंशन ही नहीं किया था कि चौगुले और उनके साथी किस उद्देश्य से जमा हुए थे।
जब बाबा साहब की दलील सुन चुप हुए सब
बाबा साहब कोर्ट में विपक्षी दल की दलीले सुन रहे थे, कैसे वकील ने इतनी बड़ी खामी को मात्र कागजी पत्र की गलती बता दी थी, उस वक्त हालात ऐसे थे कि ब्रिटिश जजों की काउंसिल भी पुलिस वालो की इन छोटी मोटी गलतियों पर ध्यान नहीं देते थे। लेकिन बाबा साहब ने इसे ही अपनी सबसे बड़ी ढाल बनाया. बाबा साहब ने तर्क दिया कि केवल जमावड़े के कारण उन्हें गैर कानूनी कहना और ऊपर से समान उद्देश्य का स्पष्ट न होना.. कोई छोटी चूक नहीं है, बल्कि पुलिस वालो की दमनकारी नीति का हिस्सा है. किसी को गिरफ्तार किया गया, उसपर सुनवाई हो रही है लेकिन पुलिस को ये ही नहीं पता कि आखिर आरोपी का अपराध क्या है फिर न्याय निष्पक्ष कैसे हुआ.. बाबा साहब ने कहा कि जो आरोप लगा है।
उसका आधार ही नहीं है, फिर य़े मामला किस आधार पर रखा गया है। बाबा साहब ने भी धारा 225 का जिक्र करते हुए कहा कि गलती तब तक माफ होगी जबकि आरोपी गुमराह न हो, और अपना बचाव कर सकें, लेकिन यहां तो आरोपियों को पता ही नहीं है कि उनपर मामला क्या चला फिर वो अपनी दलील कैसे देंगे और बचाव कैसे करेंगे। आरोपी को जब तक उसके आरोपो की पूरी जानकारी ही नहीं होगी.. वो किस आधार पर उन आरोपो का खंडन करेगा या बचाव करेगा। पुलिस की कमी कहीं न कहीं न्याय व्यवस्था की कमजोर कड़ी को दिखाता है।
बाबा साहब की दलीलों पर पुलिसवालो की गलती मानी
बाबा साहब की बोलने की शैली किसी को भी प्रभावित कर सकती थी, उनकी दलीले इतनी ताकतवर थी कि जज भी भोचक्के रह गए. उन्होंने पुलिसवालों की गलती को माफ करने के बजाय इस मामले में निष्पक्ष जांच फैसला की अपील की, ताकि पुलिस वाले सबक सीखे और भविष्य में कोई ऐसी गलती न करें… जो उनकी निरंकुश होने की छवि को दर्शाता है। जजो ने बाबा साहब की दलीलों पर पुलिस वालो की गलती मानी और फैसला सुनाया कि समान उद्देश्य की जानकारी अनिवार्य है।
जबकि यहां पुलिस वालों से ब्लंडर गलती हुई थी.. कोर्ट ने आरोपी पक्ष के पक्ष में फैसला सुनाया और आरोपी बरी हो गए, वहीं कोर्ट ने पुलिस को फटकार लगाते हुए साफ कहा कि वो किसी को भी यूहीं मनमाने ढंग से गिरफ्तार करके त्रृटिपूर्व आरोप पत्र दायन नहीं कर सकते है। हर आरोप का स्पष्ट कारण होना अनिवार्य है। बाबा साहब ने अपनी दलीलो से ब्रिटिश कोर्ट को भी झुका दिया था.. ऐसी थी बाबा साहब की कानून की समझ और उनकी ताकतवर शख्सियत।



