बाबा साहब ने कभी आजादी की लड़ाई में हिस्सा क्यों नहीं लिया, अंग्रेजी नीतियो के कभी भी खिलाफ क्यों नहीं बाबा साहब

Dr. BR Ambedkar, Dr. BR Ambedkar Struggle
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ये समय था करीब 1914 – 1915 के बीच का,  बाबा साहब डॉ भीमराव अंबेडकर अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर रहे थे.. तो वही दूसरी तरफ संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में ही 1913 में गदर पार्टी द्वारा गदर आंदोलन की शुरुआत हुई थी। यह गदर आंदोलन भारत से ब्रिटिश हुकूमत को उखाड़ फेंकने के लिए शुरू हुआ था जिसे कई नेताओं ने, जिसमें लाला हरदयाल, सोहन सिंह भाकना पार्टी के अध्यक्ष, करतार सिंह सराभा, और भाई परमानंद ने मिलकर एक बड़े स्तर पर पहले विश्व युद्ध की स्थिति का फायदा उठा कर भारत में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत करने की प्लानिंग की थी।

ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जाने से इनकार

1914 में दुनिया में पहला विश्वयुद्ध शुरु हो गया था, लेकिन अंग्रेजो को इस बगावत की जानातकी हो गई, और वो बगावत सफल नहीं हो पाई थी लेकिन क्या आप ये जानते है कि उस दौरान गदर पार्टी के नेताओं ने बाबा साहब को भी अपने इस आंदोलन का हिस्सा बनने के लिए कहा था लेकिन बाबा साहब ने न केवल ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जाने से इनकार कर दिया था बल्कि वो दूसरे कई ओर मंचों पर भी ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ नहीं हुए। क्या अपने सोचा है कि ऐसा क्यों था।

एक तरफ  भगत सिंह, लाल लाजपत राय, चंद्र शेखर आजाद जैसे महान क्रांतिकारियों ने आजादी के लिए अपने प्राण दे दिए , तो वहीं महात्मा गांधी, नेहरू, सरदार पटेल, सावरकर जैसे दिग्गत स्वतंत्रता सेनानी अंग्रेजों की नीतियों के खिलाफ लड़ रहे थे लेकिन बाबा साहब ने इन सबका का हिस्सा बनने से ही इनकार कर दिया था। क्या था कारण कि उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत की कभी खिलाफत नहीं की। अपने इस वीडियो में हम जानेंगे कि क्या था वो कारण।

आजादी के बाद भी नहीं होगा आजाद भारत

बाबा साहब आंबेडकर को कभी भी अग्रेजों हुकूमत की नीतियों से कोई समस्या ही नहीं थी। क्योंकि उनका मानना था कि भारत आजाद भी हो जाएगा तब भी वो गुलामी में ही जिएंगे, क्योंकि बाहरी गुलामी से पहले आंतरिक गुलामी से निकलना जरूरी है। अंग्रेजों हुकूमत से स्वतंत्रता से ज्यादा जरूरी उनके लिए सामाजिक स्वतंत्रता मायने रखती थी। जिसमें वो दलितों, पिछड़ों और वंचितों को शोषण से स्वतंत्रता दिलाना चाहते थे। ब्रिटेन हो या अमेरिका, दोनों ही देशों में बाबा साहब ने देखा कि वहां छुआछूत जैसी कोई चीज़ ही नहीं थी।

इसलिए वो शायद इतने डेवलप और आगे थे। उन्हें जाति धर्म के नाम पर बांटा नहीं जा सकता था, वो अंधविश्वास पर भरोसा नहीं करते थे। सामाजिक समानता के कारण ही ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देश भारत से कई गुना ज्यादा आगे और विकसित देश था। इसलिए बाबा साहब जानते थे कि अंग्रेज न भी रहे तब भी भारत की गुलामी तब तक खत्म नहीं होगी जब तक उन्हें सामाजिक स्वतंत्रता न मिल जाए।

अंग्रेजों से आजादी के कोई मायने नहीं

महात्मा गांधी के स्वतंत्रता आंदोलन में बाबा साहब ने कभी कोई भागीदारी नहीं दी क्योंकि उनका मानना था कि गांधी जी और नेहरू जैसे लोग दलितों के हितों की बात तो करते है लेकिन सही मायने में उनकी नीति दलितों को ताकतवर बनाने की थी ही नहीं। बाबा साहब ने जब अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग की तो अंग्रेजों ने उनका साथ दिया था लेकिन गांधी जी राजी नहीं हुए, उनकी दलील थी कि इससे समाज बंट जायेगा,लेकिन बाबा साहब ने दलितों की जिंदगी को जिया था, वो पहले से ही जानते थे कि समाज तो उनके लिए पहले ही बांटा हुआ था, वो तो केवल बराबरी चाहते थे।

बाबा साहब एक सामाजिक क्रांतिकारी

अगर बाबा साहब के क्रांतिकारी होने पर सवाल उठाते हैं तो हम कहना चाहते कि आप गलत है क्योंकि बाबा साहब एक सामाजिक क्रांतिकारी थे, जो देश को अंग्रेजों की गुलामी से पहले जातिवाद से भी मुक्त कराने की लड़ाई लड़ी थी। तभी सही मायने में आजादी मिल पाती..अंग्रेजों ने भारत पर शासन तो किया लेकिन कभी भी जातिगत भेदभाव नहीं किया, वो सबको समान मौका देते थे.. बिना जातिगत भेदभाव के..  हां वो अलग बात है कि उन्होंने भारत की धार्मिक और सामाजिक अवधारणा को बदलने की भी कोशिश नहीं की, लेकिन दुख की बात तो ये है उनसे सीख कर भी सामाजिक कुरीति में उलझे लोग कभी मानसिक रूप से विकसित ही नहीं हो पाए।

हालांकि 15 अगस्त 1947 के दिन भारत अग्रेजों की गुलामी से तो आजाद हो गया लेकिन वो आज भी सामाजिक गुलामी में जकड़ा हुआ है, और न जाने कब तक जकड़ा रहेगा। बाबा साहब की लड़ाई सही मायने में 100 या 200 सालों की गुलामी से नहीं बल्कि सदियों की गुलामी से थी। जिसमें वो भले ही जीत न सक हो, लेकिन उन्होंने देश को संविधान देकर दलितों और पिछड़ों को बड़ी ताकत देने का प्रयास जरूर किया। आप किस लड़ाई को ज्यादा महान मानते है।

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