होली क्यों जलाई जाती है? बाबासाहेब अंबेडकर की सोच से जानिए इतिहास – Ambedkar Saheb

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बाबा साहब कहते थे कि जब भी किसी को गुलाम बनाना है तो सबसे पहले उन्हें उनकी जमीनी संस्कृति, जिससे उनकी पहचान है, उससे दूर कर दीजिये, उनकी संस्कृति को मिटा दीजिये, वो कौम धीरे धीरे खुद ही बर्बाद हो जायेगी, इतना ही नहीं बाद में ये दिखाया जाता है कि वो संस्कृति उनके लिए सही नहीं थी, इसलिए उसका खत्म होना जरूरी थी इसके लिए उन्हें जश्न मनाना चाहिए, धीरे धीरे वो अपनी संस्कृति भूल कर नई संस्कृति के गुलाम हो जाते है। हिंदू धर्म में उनके धार्मिक त्यौहार होली, दिवाली रक्षाबंधन, दुर्गापूजा.. ये ऐसे त्योहार है, जो सदियों से हिंदू धर्म की संस्कृति का हिस्सा है।

लेकिन क्या आप ये सोच सकते है कि इन्ही में से एक, होली का त्योहार दलितो के खिलाफ किसी बड़ी साजिश का हिस्सा हो सकता है। शायद नहीं, लेकिन बाबा साहब ने एक ऐसा खुलासा किया जिसके बाद ये समझ आता है कि होलिका दहन, होली का त्यौहार ऐतिहासिक रूप से बड़े साजिश का शिकार हुआ है..वहीं ये असल में दलितों, पिछड़ो का अपमान का जश्न मात्र है… ऐसा क्यों सोचते थे बाबा साहब.. इस मुद्दे पर क्या था बाबा साहब की राय.. जानेंगे सबकुछ विस्तार से।

होलिका को जलाना स्त्री अस्मिता का अपमान

होली के त्योहार से एक दिन पहले किया जाता है होलिका दहन, होलिका जो कि एक स्त्री थी, हर साल ये कह कर लकड़ियों का ढेर जलाया जाता है, की इस पर राक्षसी होलिका ने भक्त प्रहलाद को जलाने की कोशिश की थी, इसलिए हर साल उसे जलाया जाता है, लेकिन सवाल ये है कि क्या एक स्त्री के साथ ऐसा करना सही है। जिसकी एक बार मृत्यु हो गई है तो फिर उसे बार बार जलाया जाना, क्या अपमान नहीं है।

कहते है कि मृत्यु के लिए सबसे पीड़ादायक तरीका है जल कर मरना। ऐसे में जो स्त्री इतनी कष्टकारी मौत से गुजरी हो, उसकी मौत को इतना ग्लोरिफाई करके समाज को इस गुलामी में जकड़ा गया कि होलिक बुरी है तो उसे जलाया जाना चाहिए, यानी कि समाज में स्त्रियों के खिलाफ ये संदेश दिया गया कि अगर स्त्री बुरी है, राक्षसी प्रवृत्ति की है तो उसका एकमात्र उपाय है जला कर मारना। जाने अंजाने इस कुरीति का, इस विकृत सोच का हिस्सा समाज के सभी वर्ग बन गए है।

किताबों में जानबूझ फैलाई गई भ्रांति

बाबा साहब ने अपनी बात को साबित करने के लिए कहा कि विडंबना ये है कि हमने ब्राह्मणी सोच को तो बढ़ावा दे दिया, उनके लिखे वेदों पुराणों पर भी भरोसा कर लिया लेकिन ये सोच ही नहीं सकें कि ये तो केवल ब्राह्मणी विचारधारा है। सिक्के का दूसरा पहली क्या कहता है। दरअसल जब आप कुछ दलित पिछड़े समाज सुधारकों की लिखी किताबें पढ़ेंगे तो पाएंगे कि जैसा किरदार ब्राह्मणों ग्रंथों में लिखा है इसके विपरीत है समाज सुधारकों के किताबों में।

ज्योतिबा फुले और पेरियार जैसे समाज सुधारकों ने तथाकथिक हिंदू ग्रंथों में हिरण्यकश्यप के राक्षस कहे जाने का खंडन किया है। उन्हें कहा कि वो एक ऐसा राजा था जिसने अपनी प्रजा का पूरा ध्यान रखा था। जो ये जानता था कि धर्म और धार्मिक कर्मकांड लोगों को उनके मूल लक्ष्यों से भटकाता है। इसलिए उसने पूजा पाठ न करने का नियम बनाया, लेकिन राजा के इन नियमों के खिलाफ ब्राह्मणी विचारधारा की दुकान न बंद हो जाए, इसके लिए  उनलोगों ने राजा के ही बेटे को बरगलाया और पिता के खिलाफ कर दिया।

होलिका प्रहलाद को पाखंड और अंधविश्वास से बचाना चाहती थी

जबकि होलिका कोई राक्षसी नहीं थी बल्कि वो तो अपने भाई के, अपने लोगों के सम्मान के लिए लड़ी थी। जिसने अपने भतीजे को समझाने की कोशिश की थी, वो प्रहलाद को पाखंड और अंधविश्वास से बचाना चाहती थी, लेकिन उसे साजिश के तहत जला दिया गया। सोचने वाली बात है कि क्या किसी की बेटी के जलने के बाद कोई खुशियां मनाएगा, लेकिन सांस्कृतिक रूप से गुलाम हो चुके लोगों ने इसे परंपरा का हिस्सा बना लिया। दरअसल ये प्रमाण है कि जो भी रूढ़िवादी ब्राह्मणी सोच और व्यवस्था के खिलाफ जाने की कोशिश करेगा, उसका हश्र होलिका की तरह ही होगा। किसी परंपरा को केवस इसलिए मानना कि वो सदियों से चली आ रही है तो फिर अनपढ़ गवार औऱ पढ़े लिखे लोगो में क्या ही फर्क है।

डर पैदा करके ब्राह्मणी सोच को सबसे बेहतर साबित किया

अगर आप विज्ञान के समय में है तो खुद से ही तर्क किजिये। जिसे न जलने का वरदान था वो कैसे जल गई। वजह साफ है.. केवल लोगो में डर पैदा करके ब्राह्मणी सोच को सबसे बेहतर साबित किया जाये। हिंदी खासकर पाखंड, अंखविश्वास और चमत्कार जैसी चीजों पर भरोसा करके ब्राह्मणों को श्रेष्ठ मानकर पूजते रहे। खुद कभी एकजुट होकर न लड़े, सवाल जवाब न करें। जिसे धर्म का नाम दिया जा रहा है वो असल में हमारा अपना नुकसान है, होलिका दहन के नाम पर लाखों किलो लकड़िया फूंक दी जाती है, पर्यावरण का नुकसान होता है, लेकिन क्या सच में किसी एक शख्स की बुराई भी उस लकड़ी के साथ जली हो, क्या जातिगत भेदभाव भी जला हो।

पाखंड आडंबर के नाम पर महिला का अपमान

नहीं , उपर से अगले दिन त्यौहार के नाम पर हजारों खर्च किये जाते है, जो अमीर है तो उनका ठीक है लकिन दलित और पिछड़े तो अभावो में जीते रहे है, वो भला कहां से हजारों खर्च करेंगे, लेकिन धार्मिक समारोह के नाम पर उन्हें खर्च करने के लिए मजबूर होना पड़ता है क्योंकि अगर ऐसा नही होता तो वो समाज का हिस्सा ही नहीं होंगे। पाखंड आडंबर के नाम पर महिला का अपमान करने के बजाय एक महिला की इतनी दर्दनाक मौत पर शोक मनाया जाना चाहिए, जो कुरितियों से छुटकारा चाहते है वो ये संकल्प लें कि इस दिन जश्न नहीं मनाया जाना चाहिए।

तभी आप इस मानसिक गुलामी से निकल सकेंगे, वर्ना तो हम हमेशा ही इसी गुलामी के शिकार रहेंगे। हिंदुओ को अपना सही इतिहास जानने की जरूरत है खासकर दलितों और पिछड़ो को.. ताकि वो इस पाखंड से खुद को बचाये रखें। बच्चो को कलम की ताकत बतायें.. उन्हें बताये कि हम रक्षक है, किसी की मौत का तमाशा बना कर उसपर खुश होने वाले नहीं। इसलिए ये जागरूकता लोगो तक पहुंचनी चाहिए। बाबा साहब के विचार भले ही काफी विवादित है लेकिन जब आप गहीनता से सोचते है तो आपको अहसास होता है कि बाबा साहब के एक एक तर्क बिल्कुल सटीक थे।

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