डॉ. अंबेडकर और बौद्ध धर्म, क्या एक ब्राह्मण शिक्षक ने ही दिखाया था बुद्ध का मार्ग?

Baba Saheb, 22 Vows of Ambedkar
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बाबा साहब आंबेडकर ने अपने बचपन से हिंदू धर्म में होने वाले छुआछूत और जातिगत भेदभाव के कारण हिंदू धर्म के प्रति घृणा महसूस करना शुरूबिर दिया था। हम सभी जानते हैं कि बाबा साहब ने हिंदू धर्म छोड़ने से पहले इस्लाम, सिख, पारसी, ईसाई, बौद्ध समेत कई धर्मों पर रिसर्च की थी। सभी धर्मों पर रिसर्च करने के बाद ही बाबा साहब ने अंत में बौद्ध धर्म अपनाने का फैसले किया था, लेकिन इससे पहले ही उन्होंने बौद्ध धर्म पर एक किताब लिखने का फैसला किया था, जबकि उन्होंने बाकी धर्मों को लेकर कोई किताब नहीं लिखीं थी। बाबा साहब को बौद्ध धर्म ने पहले ही प्रभावित किया था और ये किताब उस प्रभाव का जीवंत उदाहरण भी थी।

जी हां बाबा साहब ने पहली बार बुद्ध और बौद्ध धर्म को दसवीं की परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद जाना था जब उनके पिता के एक परम मित्र और ब्राह्मण जाति से आने वाले दादा केलुस्कर यानी कि कृष्ण अर्जुन केलुस्कर ने उन्हें बुद्ध चरित्र की एक किताब भेंट की थी। जिसने बाबा साहब के चरित्र निर्माण में अहम भूमिका निभाई थी। यहां तक कि बाबा साहब दादा केलुसकर का बेहद सम्मान करते थे। फिर सवाल ये है कि क्या बाबा साहब को बौद्ध धर्म के प्रति लगाव कराने के पीछे एक ब्राह्मण व्यक्ति का ही हाथ था। तो क्या बाबा साहब ब्रह्मा से नफरत नहीं करते थे। अपने इस लेख में हम जानेंगे कि बाबा साहब का ब्राह्मणों के प्रति नफरत होने के पीछे क्या था । और कैसे वो एक ब्राह्मण के कारण ही बौद्ध धर्म के प्रति लगाव जागा था..

दरअसल बाबा साहब को पढ़ने के लिए कितना संघर्ष करना पड़ा था ये हम सभी जानते है, लेकिन इस संघर्ष ने ही उन्हें सबसे अलग और सबसे खास बना दिया। बाबा साहब के पिता रामजी सकपाल जो कि महू में कार्यरत थे, वो बाबा साहब के 2 साल के होने के बाद वापिस अपने पैतृक निवास स्थान पर चले गए थे। जातिगत भेदभाव के बाद भी उनके पिता की दोस्ती उस वक्त के प्रसिद्ध मराठी लेखक और जातिवाद के खिलाफ लड़ने वाले समाज सुधारक कृष्ण अर्जुन केलुस्कर से थी। बाबा साहब के पिता रामजी सकपाल कबीर पंथ को मानते थे, लेकिन उसूलो के पक्के थे। बाबा साहब ने जब दसवी की परिक्षा पास की तो उनका पूरा गांव जश्न मनाना चाहता था। लेकिन उनके पिता ने इसकी इजाजत नहीं दी।

जिसके बाद गांव वालो ने दादा केलुस्कर से आग्रह किया कि वो रामजी सकपाल को मनायें. तब बाबा केलुस्कर ने उन्हें मनाया और गांव में जश्म मनाया गया। इस जश्न में वो स्वयं भी शामिल हुए थे औऱ उन्होंने ही पहली बार बाबा साहब को बुद्ध से परिचित कराया था। बाबा केलुस्कर ने उन्हें बुद्ध चरित्र नाम की किताब दी थी, जिसे उन्होंने बड़ोदा सयाजीराव ओरिएंटल के लिए लिखी थी, जिसे पढ़कर बाबा साहब बौद्ध धर्म और बुद्ध से काफी प्रभावित हुए थे और काफी भावुक भी। यानि की सही मायने में कहे तो बुद्ध से पहली बार परिचय उनका एक हिंदू ब्राह्मण के कारण ही हुआ था।

हिंदू धर्म से नफरत- बाबा साहब ने सही मायने में कभी हिंदू धर्म से नफरत नहीं की, बल्कि वो हिंदू धर्म में फैली जातिवाद कुरितिया, अंधविश्वास से नफरत करते थे। वो उससे मुक्ति चाहते थे, वो उन ब्राह्मणी सोच से घृणा करते थे जिसके अनुसार शूद्र सबसे नीचे होंगे औऱ ब्राह्मण सबसे ऊपर स्थान पर होंगे, वो उन ब्राह्मणी सोच से नफरत करते थे जिसके कारण लोगो को उनकी जाति के आधार पर बांटा गया था। वो हिंद धर्म ग्रंथो को ब्राह्मणों द्वारा ही लिखी गई मानते थे तो भला वो कुछ भी अपने खिलाफ क्यों ही लिखते… केवल उनके पढ़े लिखे होने का फायदा उन लोगो ने सदियों तक उठाया.. और एक वर्ग को शोषित करते रहे, जबकि वो शोषण और अलगाव भी ब्रहाम्णों की कुंठा और चिढ़ के कारण ही होने शुरु हुई थी।

जैसा कि बाबा साहब ने शूद्र कौन है…नाम की अपनी किताब में लिखा था। उनका मानना ता कि ब्राह्मण चाहते थे न्याय कर सकते थे, सबको उनका अधिकार दिला सकते थे, लेकिन उन्होंने अपने आप को श्रेष्ठ दिखाने के लिए एक वर्ग का बहिष्कार कर दिया..जिसका विरोध बाबा साहब ने किया था। हिंदू धर्म में इसी अपमान और इसी बहिष्कार से नफरत करते थे बाबा साहब.. चुंकि वो सदियों से हिंदू धर्म की जड़ो में समा गई है इसलिए उससे लड़ कर बदलना आसान नहीं .. इसिलिए बाबा साहब ने बौद्ध धर्म अपना लिया था.. बुद्ध के विचारों का उन पर काफी गहरा प्रभाव रहा था इसलिए वो बुद्ध के ही शरण में गए। बाबा साहब हिंदू धर्म से नहीं बल्कि उनकी विकृत कुरीतियों से नफरत करते थे.. जिसके कारण शूद्रो को सदैव प्रताड़ित होना पड़ा था।

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