युद्ध हो या शांति, हर मोर्चे पर डटे रहे भारत के पहले दलित मुख्यमंत्री डी. संजीवय्या

D. Sanjivayya, Andhra Pradesh first Dalit Chief Minister
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D. Sanjivayya: दलित के लिए कभी भी राजनीति आसान नहीं रही है.. जिस तरह से समाज में पहचान और जगह बनाने के लिए उन्हें संघर्ष करना पड़ा वैसे ही राजनीति में भी उनके लिए खुद को साबित करना आसान नहीं रहा.. लेकिन बावजूद इसके एक ऐसे दलित नेता हुए जो न केवल अपनी क्रांतिकारी सोच से दलितों के साथ साथ समाज के हर तबके में फेमस हुए बल्कि सबसे कम उम्र में वो एक भारतीय राज्य के मुख्यमंत्री बनने वाले पहले दलित नेता भी बने.. उन्होंने केवल राजनीति में ही नहीं बल्कि जब भारत युद्ध जैसे दौर से गुजर रहा था, तब भी उन्होंने भारतीय को राष्ट्रीय एकता और बलिदान की भावना के लिए प्रेरित किया था.. भारत में दलित नेताओं को सम्मान और उंचा दिलाने वाले नेता थे डी संजीवय्या।

कौन थे दामोदरम संजीवय्या

दामोदरम संजीवय्या, जिन्हें दुनिया डी संजीवय्या के नाम से जानती है.. उनका जन्म 14 फरवरी, 1921 को मद्रास प्रेसीडेंसी  के कुरनूल जिले के कल्लू मंडल क्षेत्र के पेद्दापाडु गांव में एक दलित परिवार में हुआ था। पेद्दापाडु गांव आज आंध्र प्रदेश में पड़ता है। कम उम्र में पिता को खोने वाले दामोदरम संजीवय्या का बचपन काफी मुश्किलों में बीता था, मगर फिर भी उन्होंने हालातो से हार मानने के बजाय नगर पालिका विद्यालय से अपनी स्कूलिंग पूरी की और मद्रास विधि महाविद्यालय से अपना ग्रेजुएशन पूरा किया। वो जब कॉलेज में थे तभी उन्होने गुलाम भारत को आजाद कराने के लिए कांग्रेस के साथ मिलकर स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में सक्रिय रूप से हिस्सा लेना शुरु कर दिया।

1948 में मद्रास लॉ कॉलेज से वकालत की

जिसके कारण वो कांग्रेस के उंचे नेताओं की नजरों में आ गए थे। जब भारत आजाद हुआ तो वो 26 साल के थे लेकिन उन्होंने दलित होते हुए भी मद्रास राजनीति में अहम जगह बना ली थी। मगर फिर भी उन्होंने 1948 में मद्रास लॉ कॉलेज से वकालत की डिग्री हासिल की ताकि वो देश के संविधान को दलितों की सही स्थिति का अवलोकन कर सकें। कांग्रेस के लिए एक अहम सूत्रधार बनने वाले डी संजीवय्या को संयुक्त मद्रास के मंत्री चुने गए.. उनका राजनीतिक सफर शुरु हो चुका था, और 1950 में वो मद्रास के ही अंतरिम सांसद चुने गए.. औऱ 1952 तक अंतरिम सांसद रहे थे।

39 वर्ष की उम्र में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने

संजीवय्या ने राजनीति में रहकर दलित उत्थान और उनके अधिकारों के लिए भी लड़ना शुरु कर दिया था। उन्होंने धीरे धीरे ये समझा कि जब तक दलित सक्रिय रूप से राजनीति का हिस्सा नहीं बनते तब तक उनका विकास संभव नहीं है.. वो कांग्रेस पार्टी से जुड़े रहे और मद्रास में जमीनी स्तर पर दलितों और पिछड़ो के लिए कार्य करते रहे। कहते है कि जब भी किसी रैली में उतरते तो लोग उन्हें सुनने के लिए दूर दूर से आते थे।

उनकी बढ़ती लोकप्रियता के कारण ही कांग्रेस ने उन्हें 1960 में 39 वर्ष की आयु में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री के पद पर आसीत किया। ये दलित समाज के हर तबके लिए  एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी, क्योकि वो किसी भारतीय राज्य के पहले और सबसे उम्र के दलित मुख्यमंत्री थे। उनका मुख्यमंत्री बनना असल में हाशिय पर पड़े लोगों के लिए राजनीति में एक मजबूत प्रतिनिधित्व माना गया।

बाबा साहब अंबेडकर की विचारधारा से काफी प्रभावित

वो बाबा साहब अंबेडकर की विचारधारा से काफी प्रभावित थे, और सीएम बनने के बाद उन्होंने सबसे पहले राज्य में शिक्षा व्यवस्था को सुचारू करने,  सामाजिक कल्याण के लिए कार्य करने, पिछड़े वर्गों के लोगो के लिए कल्याणकारी योजनाओ को जमीनी स्तर पर उतारने, वंचित समूहों तक भी सरकारी लाभ को पहुंचाने, उन्हें शिक्षा और स्वास्थ्य पहुंचाने की दिशा में क्रांतिकारी कार्य किया था। साथ ही भूमिहीन लोगों को भूमि वितरण किया, तेलुगु साहित्य को बढ़ावा देने के लिए कार्य किया। उनके ये कार्य असल में सामाजिक रूप से व्यवस्थागत असमानता को कम करने की कोशिश मानी गई। वो  एक सुधारवादी नेता  थे जिन्होंने वंचितो के लिए सबसे ज्यादा प्रयास किया था।

विधवाओं और बुजुर्गों के लिए पेंशन प्रणाली शुरू

इतना ही नहीं राज्य में भ्रष्टाचार रोकने के लिए उन्होंने ही भ्रष्टाचार विरोधी ब्यूरो (एसीबी) का कार्यालय शुरू किया। अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद उन्हें 1962 में  आंध्र प्रदेश से अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बनने का मौका मिला.. ये भी उनके लिए बड़ी उपलब्धि थी क्योंकि पहली बार कोई दलित अध्यक्ष बना था। जिसके बाद 9 जून 1964 और 23 जनवरी 1966 के बीच जब लाल बहादुर शास्त्री भारत के प्रधानमंत्री थे तब संजीवय्या केंद्र सरकार में श्रम और रोजगार मंत्री चुने गए।

इस दौरान उन्होंने विधवाओं और बुजुर्गों के लिए पेंशन प्रणाली शुरू की थी, कला के प्रेमी होने के कारण उन्होंने आंध्र प्रदेश में ललित कला अकादमी शुरु की थी..खेतीबाड़ी को बढ़ावा देने के लिए कई सिचाईं परियोजना को शुरु किया था। उन्होंने श्रम और रोजगार मंत्री के दौरान जो समस्यायें महसूस की थी उसे लेकर श्रम समस्याओं और औद्योगिक विकास पर एक किताब भी लिखी थी, जो कि 1970 में ऑक्सफोर्ड और आईबीएच पब. कंपनी, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित की गई थी। उनकी दूरदर्शी सोच सच में काबिले तारीफ थी।

युद्ध के समय जनता को देशभक्ति और बलिदान का संदेश

1962 में भारत और चीन का युद्ध शुरु हो गया, और भारत बेहद बुरी स्थिति में था.. लेकिन फिर भी ऐसी स्थिति में संजीवय्या ने तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की ताकत बन कर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और देश की जनता को एकजुट होने का आह्वान कियाष उन्होंने देश वासियों को राष्ट्रीय एकता और बलिदान का महत्व समझाया था। ऐसी संकट की स्थिति में भी उन्होंने कांग्रेस पार्टी को डगमगाने नहीं दिया था.. ऐसा था उनका नेतृत्व। 7 मई 1972 के दिन जब वो दूसरी बार कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में कार्य कर रहे थे तब उनका मात्र 51 साल की उम्र में निधन हो गया था।

संजीवय्या एक ऐसी शख्सियत के रूप में स्थापित हुए जिनसे कभी किसी को कोई शिकायत नहीं हो सकती है। आज भी उनका नाम पूरे सम्मान के साथ लिया जाता है। विशाखापट्नम में दामोदरम संजीवय्या राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय उनके सम्मान में बनाया गया है जो कि देश के एक नामी कानूनी संस्थानों में से एक है, हैदराबाद में हुसैन सागर के किनारे संजीवय्या पार्क है, जहां उनकी समाधि भी स्थापित की गई है। वहीं  14 फरवरी 2008 को संजीवय्या के सम्मान में 5 रूपय का एक स्मारक डाक टिकट भी जारी किया गया था। संजीवय्या सादगी और बेहतर नेतृत्व का एक मजबूत मेल थे.. जो पूरे सम्मान से याद किये जाते है।

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