Female Buddha Controversy: क्या कोई महिला ‘बुद्ध’ नहीं बन सकती? बौद्ध धर्म का सबसे बड़ा जेंडर विवाद

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Female Buddha Controversy: भगवान बुद्ध का ज्ञान ऐसा था जिन्होंने ये समझा कि शारीरिक बनावट किसी ज्ञान का ध्येय नहीं बल्कि मन की अवस्था ज्ञान प्राप्ति के लिए सबसे बड़ा कारक हैं और यहीं कारण था कि बुद्ध ने महिला भिक्षु को भी संघ का हिस्सा बनने की इजाजत दी थी, लेकिन समय के साथ एक मत बहुत प्रचलित हुआ, की बुद्धत्व को केवल पुरुष ही प्राप्त कर सकते हैं महिलाएं नहीं। बदलते समझ की अवधारणा ने महिलाओं को हमेशा कमतर समझा। नतीजा सदियों से महिलाओं के बुद्ध बनने और न बनने को लेकर बहस जारी है। जिसका कहीं न कहीं कारण समाज में पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण और आध्यात्मिक समानता की सोच है।

इस लेख में हम जानेंगे कि गौतम बुद्ध महिलाओं के बुद्ध बनने को लेकर क्या सोचते थे, और क्यों आज भी इस मुद्दे पर इतनी बहस होती है, आखिर ऐसा क्या कारण है कि आज तक कोई महिला बुद्ध नहीं बन पाई है। सवाल बहुत से है, लेकिन जवाब अक्सर बहसों के बीच छिप जाता है। कुछ ऐसे ही सवालों के जबाव जानने की कोशिश करेंगे।

महिलाओं को लेकर बुद्ध की सोच

गौतम बौद्ध ये जानते थे कि जिस समाज का वो हिस्सा है वो समाज पितृसत्तात्मक है, वहां महिलाओं की स्थिति कितनी दयनीय है, ऐसे में अगर किसी ने बुद्ध के रास्ते पर चल कर बुद्धत्व को प्राप्त करने की कोशिश भी की तो वो बड़ा विवाद का कारण बनेगा। ऐसा कभी नहीं था कि वो महिलाओं को पुरुषों से कमतर समझते थे। लेकिन उन्हें पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं के बहिष्कार होने का डर था। वो जानते थे कि जब तक महिला खुद जिद्दी नहीं होंगी, तब तक वो बौद्ध धर्म में प्रवेश नहीं कर सकते है, इसलिए जब महिलाओं ने बौद्ध भिक्षुणी बनने की इच्छा व्यक्त की तो गौतम बुद्ध उसके खिलाफ थे।

क्या महिलाएं बुद्धत्व को प्राप्त कर सकती है

अब सवाल ये है कि दूसरे धर्मों में जहां आध्यात्मिकता को पुरुषत्व से जोड़ कर देखा जाता है, वहीं बुद्ध ने महिलाओं और पुरुषों को समान माना। बुद्ध का मानना था कि ज्ञान प्राप्त करने के लिए शारीरिक बनावट मायने नहीं रखती बल्कि मन की स्थिति मायने रखती है। आपका तप, आपकी साधना शारीरिक बनावट की मोहताज नहीं है बल्कि मानसिक अवस्था पर निर्भर है। और इसीलिए बौद्ध धर्म इकलौता ऐसा धर्म है जिसमें महिलाओं को भी पूरी आजादी है, वो अपने तप के बल पर बुद्धत्व को प्राप्त भी कर सकती है और बुद्ध भी बन सकती है।

न जाति न लिंग कुछ भी मायने नहीं रखता

हालांकि बुद्ध को प्राप्त करने के लिए बताये गए ग्रंथ लोट्स सूत्र जिसे सद्धर्म पुंडरीक सूत्र भी कहा जाता है, उसे लेकर ये भ्रांति फैलाई गई कि लोटस सूत्र में बताया गया कि महिलाओं को बुद्ध बनने के लिए पहले पुरुष बनना होगा, यानि कि उन्हें दूसरा जन्म लेकर पुरुष रूप में आकर बुद्धत्व प्राप्त होगा.. लेकिन जब आप इस ग्रंथ को बारिकी से पढ़ते है तो आध्यय 12 में ये साफ दर्शाया गया है कि बुदध बनने के लिए न तो उम्र, न जाति, न लिंग.. कुछ भी मायने नहीं रखता। एक 8 साल की नागकन्या छोटी से उम्र में बुद्धत्व को प्राप्त कर लेती है।

पितृसत्तात्मक सोच को बढ़ावा

जो कि समाज में फैली पर पुरुषार्थ की भ्रांति पर गहरा प्रहार है। हालांकि पितृसत्तात्मक सोच को बढ़ावा देने और उनकी खोखले पुरुषार्थ को संतुष्ट करने के लिए ये अफवाह फैलाई गई कि वो नागकन्या पहले बालक बनी और फिर बुद्ध बनी थी।  सच तो यहीं है कि लोटस सूत्र का मानना है कि बिना किसी भेदभाव के बुद्धत्व को प्राप्त किया जा सकता है। ये सूत्र महिलाओं को कैसे बुद्धत्व प्राप्त करना है उसके लिए बेहतर मार्गदर्शक का काम करता है.. जिसे आज के समय में काफी तोड़ मरोड़ कर पेश किया जा रहा है।

क्यों हो रही है महिलाओं के बुद्ध बनने पर बहस

अब सवाल ये है कि जब स्वयं गौतम बुद्ध ने इस बात को स्वीकार किया कि महिला भी बुद्ध बन सकती है फिर उनके बाद के समय में इस मुद्दे पर बहस क्यों जारी है। जबकि बौद्ध धार्मिक मतो के अनुसार महायान और निचिरेन जैसी बौद्ध परंपराएं, ऐसी समुदाय है जो बुद्ध के बतायें मार्ग का पूरी से अनुसरण करती है। ये परंपराएं मानती है कि अपनी आत्मा के ध्यान और ज्ञान के बल पर महिलाएं भी enlightenment को पा सकती है। इसके लिए लिंग का भेद मायने नहीं रखता है, क्योंकि अगर ज्ञान लिंग भेद पर निर्भर है तो फिर ये कहीं से भी ज्ञान नहीं है ये तो केवल अंधकार है।

ऐतिहासिक और सामाजिक-सांस्कृतिक को मान्यता

वहीं जब आप पाली कैनन और थेरीगाथा, जो कि थेरवाद बौद्ध शिक्षाओं पर आधारित है, उसमें पुराने धर्मग्रंथों में दिखाया गया था कि महिलाएं मुक्ति पा सकती हैं, लेकिन बदलते समय के साथ कमेंट्री और सिंबल महिला बुद्ध को ज्ञान पाने से मना करते हैं। थेरवाद में तीन मुख्य कारण बताये गए है महिलाओं के बुद्द न बनने के.. जो बताता है कि बुनियादी बौद्ध शिक्षाओं के बजाय ऐतिहासिक और सामाजिक-सांस्कृतिक को मान्यता देने के कारण महिलाओं को सुप्रीम बौद्ध न मानने का समर्थन किया गया। बुद्ध के बत्तीस निशान और बुद्ध जातकों का बोधिसत्वों को हमेशा पुरुषों के रूप में दिखाना भी कारण है।

महिलाओं में अरहंत बनने की सारे गुण

इसके अलावा बहुधातुक सुत्त में भी महिलाओ को सुप्रीम बुद्ध न बन पाने के कारण मौजूद है। थेरवाद में माना जाता है कि भले ही महिलाओं में अरहंत बनने की सारे गुण है, फिर भी वो सममा-संबुद्ध बुद्ध बनने के क्राइटेरिया को पूरा नहीं कर सकतीं, जिसका एक मुख्य तर्क बत्तीस निशान (लक्खण) से जुड़ा है, जिसमें “छिपा हुआ पुरुष अंग” (पवेधनत्ता) होना भी शामिल है, लेकिन महिलायें कभी भी इस नियम को पूरा नही कर सकती है। थेरवाद में इन निशानों को सिर्फ़ सिंबॉलिक रूप से ही नहीं बल्कि बुद्धत्व के लिए भी अहम माना जाता है।

इनके अलावा भी शारीरिक क्षमता के साथ साथ कई और कारणों से थेरवाद कभी इस बाद समर्थन नहीं करता है कि महिलाएं भी बुद्ध बन सकती है। और यहीं कारण है कि अलग अलग परंपराओं और समुदायों के बीच काफी लंबे समय से बहस जारी है। जो शायद आगे भी जारी रहेगी..क्योंकि अलग अलग समुदायों के अपने अपने विचार है। आप किस परंपरा से सहमत है। हमें कमेंट करके जरूर बतायें।

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