Top 5 Dalit news: एक कहावत है, जब तक आप खुद अपने अधिकारों के लिए खड़े नहीं होंगे, तब तक हर कोई आपको अवसर की ही तरह देखेगा। कुछ ऐसी ही स्थिति है दलितों को, नेताओं को वो केवल वोट बैंक नजर आते है, लेकिन जब वो आवाज उठाते है तो ढोंगी अवसरवादियों के चेहरे से प्रर्दा खुद ही उठ जाते है। तो चलिए आपको पिछले 24 घंटे में दलितो के साथ होने वाली घटनाओं के बारे में जानेंगे, जो इस वक्त सोशल मीडिया पर काफी सुर्खियों में है।
दिल्ली में दलित छात्रा के साथ बदसलूकी
1, दलितों से जुड़ा पहला मामला है राजधानी दिल्ली से। सोशल मीडिया पर एक वीडियो इस वक्त काफी वायरल हो रहा है, जो प्रमाण है कि यूपी हो या दिल्ली, दलितो की स्थिति लगभग सब जगह एक समान है। जी हां, अभी हाल ही में जंतर मंतर पर भीम आर्मी के आंदोलन को खराब करने के इरादे से पहुंची रूचि तिवारी के खिलाफ जब बहुजन छात्रों ने एक्शन लिया था, तब भी काफी हंगामा हुआ था, लेकिन हद तो तब हो गई जब रूचि तिवारी ने जिस बहुजन छात्रा अंजली का गला पकड़ कर जमीन पर गिराया था।
अंजली ने रूचि के खिलाफ मोरिसनगर थाने में एक तरफ कंप्लेन कर दी, तो वहीं मनुवादी आतंकियों को एक बहुजन छात्रा का आवाज उठाना इतना नागावार गुजरा कि उन लोगो को पुलिस वालों के सामने ही थाने में अंजली पर हमला किया, उन्हें कपड़े उतारने की धमकी दी, उनके साथ बलात्कार करने की धमकी दी। मतलब, आखिर इन जातिवादियों के लिए कानून की कीमत कौड़ी भर की भी नहीं है।
ऐसे में पुलिस दबंगो को गिरफ्तार करने के बजाये, अंजली और उनकी एक साथी को पुलिस स्टेशन में हॉस्टेज बना देते है, तब भी ये दंगाई पुलिस थाने में उत्पात मचाते है। हैरानी की बात है कि पुलिस वालो के सामने ये सारी वारदात होती है, लेकिन इन पर हैरेस करने, हंगामा करने का मामला तो छोड़िये, उन पर पब्लिक प्रोपर्टी को नुकसान पहुंचाने का भी केस दर्ज नहीं किया गया.. जबकि अगर किसी बहुजन समाज ने ये हरकत की होती तो तुरंत उन पर रासुका लगाने की मांग शुरु हो जाती।
अब तो ये बात अब पूरी तरह से सही लगती है कि “पुलिस की लाठी और कलम जाति-धर्म, अमीर-गरीब को देखकर चलती हैं” इतना बड़ा हंगामा होने का बाद भी इन आरोपियों के खिलाफ एक आवाज तक नहीं उठाई गई है। फिर क्या वाकई में दलितों औप पिछड़ों को न्याय ये कानून दिलायेगा…उम्मीद तो कम ही लग रही है।
ओड़िसा में फिर शुरु हुआ बंद आंगनवाड़ी
2, दलितों से जुड़ा अगला मामला ओड़िसा से है, जहां दलित सहायिका की नियुक्ति के बाद बच्चों के अभिभावको ने आंगनवाड़ी की बहिष्कार कर दिया, अब सरकार की कोशिशो के बाद काफी हैरान करने वाली खबर सामने आई है। दरअसल करीब 3 महीने से बंद पड़े इस आंगनवाड़ी के बंद होने की खबर सामने आने के बाद दलित कम्युनिटी की हेल्पर शर्मिष्ठा सेठी को फिर से काम पर आने को कहा है,
वहीं जातिगत भेदभाव से ग्रसित बच्चों के माता पिता को समझाने के लिए खुद महिला आयोग की सदस्य कल्पना मलिक, सब-कलेक्टर अरुण नायक और लोकल पुलिस ने घर घर जाकर परिवार वालो से बातचीत की, इतना ही नहीं गांव एक लोक उत्सव का आयोजन किया गया जिससे जरिये ये बताया गया कि जातिवाद को खत्म करके ही समाज की तरक्की संभंव है।
अधिकारियों की कोशिश रंग लाई और कई मातापिता बच्चो को आंगनवाड़ी भेजने के लिए तैयार हो गये है। जिससे अधिकारियो ने राहत की सांस ली है। अगर ऐसे ही अधिकारी सभी जगह लोगो को जागरूक करें तो शायद देश में जातिगत भेदभाव जरूर खत्म हो जायेगा।
अमेठी में दलित युवक की निर्मम हत्या
3, दलितो से जुड़ा अगला मामला उत्तर प्रदेश के अमेठी से है, एक तरफ विपक्ष बीजेपी के शासन में दलितो के उत्पीड़न का राग अलापती है लेकिन उनके खुद के संसदिय क्षेत्र कौन से दलितों के लिए सुरक्षित है। ताजा मामला अमेठी से है, जहां एक दलित शख्स की पहली निमर्मत हत्या कर दी जाती है और फिर उसके शव को ट्यूबबेल में फेंक दिया जाता है। ये घटना मोहनगंज कोतवाली क्षेत्र अंतर्गत पूरे घिसई मजरे लीही गांव की है।
मृतक शिव प्रसाद कोरी जो कि अपने घर से कुछ दूरी पर खेत में बने ट्यूबवेल पर सूअर पालन का काम करता था, रोज की तरह वो राज का खाना खा कर खेतो पर रखवाली के लिए चला गया था, लेकिन सुबह के समय उसका खून से लथपथ शव बरामद हुआ। शिव प्रसाद की किसी तेजधार हथियार से हत्या की गई थी।
मृतक के बेटे जगदीश प्रसाद का कहना है कि उनके पिता की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी, उनकी हत्या किसने की, और क्यों, इस पर वो कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं है, हालांकि पुलिस अधीक्षक सरवणन टी. ने मौके पर पहुंच कर जब उन्होंने जांच की तो 3 संदिग्ध गिरफ्तार कर पूछताछ शुरु कर दी है। हत्या के कारणों का पता अभी नहीं चल सका है लेकिन इस घटना के बाद से पूरे गांव में डर का माहौल है। देखना ये होगा कि पुलिस आखिर कब तक आरोपियों को गिरफ्तार कर पाती है।
दलित होने के कारण अधिकारियों की लापरवाही
4, दलितों से जुड़ा अगला मामला राजस्थान के छबड़ा से है, जहां दलित होने के कारण एक बुजुर्ग महिला को राष्ट्रपति के बुलावे के बाद भी पूरी तरह से नजरअंदाज किया गया। इसे सरकार की अनदेखी कहे या लापरवाही.. लेकिन दलितो और पिछड़ो को लेकर सरकार की क्या नियत और मंशा है वो उजागर हो चुकी है। ये घटना बारां जिले के छबड़ा शहर की है, जहां दलित विधवा शांति बाई बैरवा के लिए 26 जनवरी को सम्मानित पर होना चाहिए था, वो उनके जीवन का सबसे बड़ा अपमान बन गया, जिसके जिम्मेदार है एडमिनिस्ट्रेटिव अधिकारी।
शांतिबाई ने रोते हुए अपने घर के माहौल के बारे में बताते हुए कहा कि रिपब्लिक डे 26 जनवरी, 2026 पर उन्हे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मिलने के लिए ऑफिशियली बुलाया गया था, इन न्योते के बाद MLA प्रताप सिंह सिंघवी ने बधाई दी थी, उन्हें माला पहनाई गई और उनका सम्मान किया गया था, लेकिन छाबड़ा नगर पालिका के एग्जीक्यूटिव ऑफिसर EO, SDO और MLA के सरकारी ट्रांसपोर्ट और एस्कॉर्ट के बारे में बार-बार भरोसा दिलाने के बावजूद पीड़िता के कोई इंतजान नहीं किया। पूरा परिवार इंतजार करता रहा, लेकिन अब यहीं सम्मान उनके सबसे बड़े अपमान का कारण बन गया है।
उन लोगो को घर से बाहर निकलना तक दूभर हो गया है। पीड़िता की बहु ने सीधे अधिकारियों पर आरोप लगाया कि अनूसूचित जाति से, होने के कारण उनकी अनदेखी की गई है। वहीं छाबड़ा EO और SDO सभी से संपर्क साधा गया, ताकि इस लापरवाही का कारण पता चल सकें, लेकिन सभी ने एक दूसरे पर टाल दिया। हैरानी की बात है कि इतनी बड़ी लापरवाही के कारण जो मानसिक और समाजिक प्रताड़ना शांति देवी और उनके परिवार को झेलना पड़ रही है, उसे लेकर किसी नेता या किसी अधिकारी ने कोई टिप्पणी नहीं की है।
अनिल मिश्रा का फिर से आया बयान
5, दलितों से जुड़ा अगला मामला मध्य प्रदेश से है, जहां दिल्ली में लगी आग की लपटे मध्य प्रदेश भी पहुंच चुकी है। जी हां, विवादित वकील अनिल मिश्रा भी अब दिल्ली में हो रहे है जातिगत उत्पीड़न पर अपनी राय दे रहे है, लेकिन जैसा कि उम्मीद थी, ये महाशय तो वैसे ही बाबा साहब अंबेडकर के नाम पर और दलितो के साथ होने वाले अत्याचार को देखने और सुनने के नाम पर बहरे और अंधे हो जाते है।
जहां एक तरफ इनके जातिवादी आतंकी बहुजन समाज की रैली में पहुंच कर धमकी देते है, मारपीट करते है वहीं अनिल मिश्रा की नजरों में बाबा साहब का अपमान करने वाले पत्रकार रूचि तिवारी ही सहीं है। अनिल मिश्रा ने रूचि को न्याय दिलाने की मांग करते हुए कहा रूचि पर हमला लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा प्रहार है, जिस काले कानून को वो चाहते है, उसे खत्म करना ही एकमात्र उपाय है।
रूति तिवारी के साथ हुए अन्याय के खिलाफ आवाज उठाते हुए दोषियो को गिरफ्तार करने की मांग की है। अब सवाल ये है कि क्या अनिल मिश्रा साहब ने पुलिस स्टेशन का वीडियो नहीं देखा, या रूचि तिवारी का जानबूज बहुजन छात्रों को अपमान करने के इरादे से बोला गया शब्द नहीं सुना… बस जातिवादी भेदभाव की गंगा में अपने भी हाथ धोये जा रहे है, वैसे देखना ये होगा कि कार्यवाई वाकई में होगी किसके खिलाफ। आपको क्या लगता है.. पुलिस किसे बलि का बकरा बनाने वाली है।



