अगर आपसे ये सवाल पूछा जाए कि शाक्य मुनि गौतम बुद्ध बुद्ध क्यों बने, तो आपका जवाब क्या होगा, जाहिर सी बात है वो लोगों को उसके दुखों के असली कारणों से अवगत कराने और उनसे मुक्त होने के लिए ही बुद्ध बने। उनका तप, उनकी साधना सिर्फ इस एक मकसद के लिए थी कि कोई व्यक्ति कैसे अपने दुखों से बाहर आ सकता है। बुद्ध का मार्ग कठिन जरूर था लेकिन उनके विचारों ने लोगों को तेजी से प्रभावित किया था।
लोग ये समझ चुके थे बुद्ध केवल आपके दुखों को ही दूर नहीं कर रहे है बल्कि आपको इस सांसारिक बंधनों और उनके आडंबरों से भी दूर कर रहे है। एक ऐसा ही किस्सा है एक धनी सेठ से जुड़ा हुआ, जब पैसे के अहंकार में चूर एक धनी सेठ के अहंकार को तोड़ कर सेठ को जीवन का सच्चा रहस्य समझाया था बुद्ध ने। अपने इस वीडियो में हम जानेंगे कि आखिर ऐसे क्या किया था बुद्ध ने, और कैसे टूटा सेठ का अहंकार।
बौद्ध संघ के भिक्षा के नियम
दरअसल बौद्ध संघ के बनाए नियमों के अनुसार कोई भी बौद्ध भिक्षुक अपनी इच्छा से भिक्षा नहीं ले सकता, जो भी यजमान अपने यथानुसार दे देंगे वो आपको ग्रहण करना होगा। बुद्ध की प्रसिद्धि उनके विचार तेजी से फैली थी, हर कोई उनकी एक झलक पाने के लिए बेताब रहता था, धनी हो या निर्धन , जो बुद्ध पर विश्वास करते थे, वो चाहते थे कि बुद्ध एक बार उनके यहां भोजन जरूर करें। जिसके कारण अक्सर बुद्ध के अनुयायी उन्हें अक्सर अपने यहां भोजन पर बुलाते थे, बुद्ध चुंकि उन्होंने हमेशा सात्विक भोजन ही किया लेकिन उन्होंने कभी अपने अनुयायिकों को मांसाहार करने से नहीं रोका था.. लेकिन वो शाकाहार भोजन ही करते थे।लोग उनके लिए तरह तरह के अपनी श्रद्धा औऱ सामार्थ्य अनुसार भोजन बनाते..बुद्ध खुशी खुशी अपने अनुयायियों के यहां भोजन करते थे।
सेठ ने बुद्ध को 56 प्रकार के लजीज भोजन कराये
लेकिन भोजन का पात्र हमेशा बुद्ध का ही होता था, ताकि हमेशा ये बात सिद्ध की एक भिक्षु के लिए मिट्टी का पात्र भी सोने चांदी की थाली से ज्यादा सर्वोपरि है। इसी कड़ी में एक बार एक धनी सेठ ने बुद्ध को अपने यहां भोजन पर बुलाया था.. बुद्ध भी सहर्ष वहां गए.. सेठ का घर धन संपद्दा से पूर्ण था.. लेकिन बुद्ध ने किसी बात की परवाह नहीं की.. सेठ ने बुद्ध को 56 प्रकार के लजीज भोजन कराये और अंत में मेवे से खीर खाने को दी। बुद्ध ने सेठ का दिया भोजन न केवल खाया बल्कि जाने से पहले उन्होंने कहा कि वो थोड़ी सी खीर उनके पात्र में डाल दें, ताकि वो अपने शिष्यों को भी ये खीर खिला सकें।
और उन्होंने अपनी झोली से पात्र निकाल को सेठ की तरफ बढ़ा दिया। सेठ ने जैसे ही खील पात्र में डालने के लिए आगे बढ़ाया..उसने देखा कि पात्र पूरी तरह से गोबर से भरा था.. सेठ ने तुरंत वो पात्र बुद्ध के लिया और खुद उसे अच्छे से साफ किया। ताकि खीर अशुद्ध न हो। बुद्ध ने जब सेठ को ऐसा करते देखा तो उन्होंने सेठ से कहा…सेठ जिस तरह के तुमने देखा कि पात्र गंदा है और मुल्यवान खीर डालने के लिए पहले तुमसे उसे धोया… ठीक वैसे ही ज्ञान के लिए पहले तुम्हें अपने अंदर से विकारों को निकालना होगा। अहंकार व्यक्ति का सबसे बड़ा विकार है।
मन को शुद्ध करने की शिक्षा
अगर हमारे आशिर्वाद को तुम इसी खीर जितना मूल्यवान समझते हो, तो अपने ऊपर रखने के लिए तुम्हें मन रूपी पात्र को भी शुद्ध, पवित्र और स्वच्छ करना होगा। तुम्हारें मन में भी गोबर जैसी मलिनता रहेगी तो ये दान-धर्म किसी काम न आयेंगे। क्योंकि आपकी सच्ची श्रद्धा, आपके सच्चे कर्म तय करती है। सेठ ने जब बुद्ध की ये बातें सुनी तो वो समझ गया कि बुद्ध किस ओर इशारा कर रहे है। उसने तय किया कि वो बाहरी आंडबरो और अंधविश्वासों के अंधेरे और अशुद्धि को अपने मन से दूर करके सत्य रूपी सच्ची शांति का पायेगा।
बुद्ध का ये ज्ञान केवल इसी लिए था कि कोई व्यक्ति कितना भी दान पूण्य कर लें, कितने भी तीर्थों की यात्रा कर लें, लेकिन अगर आपका मन शुद्ध नहीं है. आपकी इच्छा पवित्र नहीं है तो दान पूण्य, तीर्थों का भ्रमण सब बेकार है..इसका कोई फल नहीं मिलने वाला। बुद्ध ने जीवन को सरल बना कर सच्ची श्रद्धा का आर्थ समझाया था.. जिसके कारण ही बुद्ध सबसे अलग और पूजनीय होते गए।



