भारत की राजधानी दिल्ली के राष्ट्रपति भवन को फिर से सजाया गया, क्योंकि एक बार फिर से यहां वार्षिक ‘सिविल इन्वेस्टिचर सेरेमनी-2’ होने वाली थी.. जिसमें 2026 में कुल 131 प्रतिष्ठित दिग्गजों को पद्म पुरस्कारों से नवाजा गया। जिसमें 2 पद्म विभूषण, 7 पद्म भूषण और 56 पद्मश्री अवार्ड प्रदान किए गए। ये समारोह 23 जून 2026 को शुरु हुआ, लेकिन सबसे ज्यादा ये यादगार और गौरांवित करने वाला पल बना देश के दलित समुदाय के लिए, जब दलित जाति से आने वाले संत रविदास जी के विचारों का प्रचार प्रसार करने वाले डेरा सचखंड बल्लां के मुख्य संत निरंजन दास जी को भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह के सामने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने पद्मश्री अवॉर्ड से सम्मानित किया। संत निरंजन दास पिछले 70 सालों से संत रविदास जी के विचारों का, उनकी महिमा का दुनिया भर में प्रचार कर रहे है।
संत निरंजन दास जी महाराज को ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया गया
संत निरंजन दास ने अपना पूरा जीवन मानवता की कल्याण के लिए समर्पित कर दिया है, उनका ये सम्मान साक्षी है कि समाज में हमेशा से दलित और पिछड़ो का योगदान रहा है बस उसे स्वीकार करना सबके लिए आसान नहीं है। परम पूज्य सतगुरु संत निरंजन दास जी महाराज को ‘पद्मश्री’ सम्मान दिए जाने के बाद रविदासिया समुदाय को जो सम्मान मिला उसे लेकर अब राज्य अनुसूचित जाति आयोग के पूर्व अध्यक्ष, ब्रिटिश रविदासिया हेरिटेज फाउंडेशन (यूके) की भारतीय शाखा के अध्यक्ष राजेश बाघा ने उनसे मिलकर उन्हें बधाई दी है, राजेश बाघा ने इस सम्मान को रविदासिया समाज के साथ साथ संत समाज का सम्मान कहा।
75 सालों की लोगों के लिए आध्यात्मिक मार्गदर्शन
उन्होंने कहा कि ये सम्मान रविदासियां समाज, संतों पर और मानवता पर विश्वास करने वालों के लिए है। सतगुरु निरंजन दास जी महाराज को मिलने वाला ये सम्मान दर्शाता है कि निस्वार्थ भाव से किया गया कार्य कभी जाया नहीं जाता है और ये उनके 75 सालों की लोगों के लिए आध्यात्मिक मार्गदर्शन, त्याग, समाज सेवा का ही फल है। संत रविदास जी की परंपरा और उनके जातपात, भेदभाव से उठकर सबको बराबरी का संदेश देते हुए सतगुरु निरंजन दास जी महाराज जी ने भाईचारे, समता और समानता का संदेश देते हुए केवल देश के ही नहीं देश के बाहर भी संत रविदास जी की शिक्षाओं को फैलाया है।
250 बेड का संत सरवन दास चेरिटेबल अस्पताल
सतगुरु निरंजन दास जी महाराज जी 23 जुलाई 1994 को डेरा संचखंड बल्लां के गद्दीनशीन बने थे, उस वक्त उनकी उम्र 52 साल थी, वो गरीबों और जरूरतमंदो के लिए चेरिटेबल अस्पताल और स्कूल चलाते है, ताकि कभी कोई जरूरतमंद पैसो की कमी के कारण सेवा से वंचित न रह जायें। उन्होंने कठार में 250 बेड का संत सरवन दास चेरिटेबल अस्पताल बनवाया, जो बेहद कम पैसे लेकर इलाज करते है। वहीं फगवाड़ा में संत सरवन दास मॉडल स्कूल चलते है। जहां बच्चे जातिगत भेदभाव से हटकर शिक्षा हासिल करते है। ये स्कूल और अस्पताल, बराबरी और संगत सेवा का अनूठा साक्षी है।
संत रविदास ने खुद को इश्वर से जोड़ा
सतगुरु निरंजन दास जी महाराज जी को ये उपलब्धि मिलना पंजाब में दलित समझी जाने वाली रविदासियां समुदाय के लिए बहुत ही अहम है। उनका ये सम्मान केवल उनके लिए ही नहीं है बल्कि हर उस एक रविदासियां के लिए है, जो समाज में कभी बहिष्कृत समझे गए। संत रविदास जी, एक ऐसे संत जिन्होंने ही पहली बार 14वी सदी में ये संदेश दिया कि भक्ति पर केवल कुछ ऊंची जातिवालो का अधिकार नहीं है.. बल्कि भक्ति हर किसी के लिए है।
जरूरत है तो खुद को ईश्वर के साथ जोड़ने की। संत रविदास ने खुद को इश्वर से जोड़ा, उन्होंने दुनिया को ये संदेश दिया कि किसी की जाति उंची है या किसी की नीची.. लेकिन जहां सच्ची श्रद्धा है, वहां भेदभाव नहीं है.. ईश्वर कभी भेदभाव नही करता है.. वो केवल आपकी निष्ठा देखता है। उनके इस संदेश ने सिखों के पहले गुरु गुरू नानक देव जी को भी काफी प्रभावित किया था।
श्री गुरू ग्रंथ साहिब में भी संत रविदास जी के भजनो को शामिल किया
गुरु रविदास ने ही ये संदेश दिया था कि किसी साँधु संतो की संगति से नहीं बल्कि गुरुओ के मार्ग पर चल कर सच्चा ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है, जैसा कि आप सिख धर्म में देखते है। गुरु रविदास जी सिख धर्म पर इतना प्रभाव है कि पवित्र ग्रंथ श्री गुरू ग्रंथ साहिब में भी संत रविदास जी के भजनो को शामिल किया गया है। उन्होंने वेदो और पुराणों में लिखी बातों का अनुसरण कर भेदभाव की भावना के साथ जीने से बेहतर है कि अपने मन से सच्ची श्रद्धा करें।
क्योंकि मन चंगा तो कठौते में गंगा है। यानि की आपका मन पवित्र है तो ईश्वर स्वयं ही आपकी कुटिया में आ जाते है। उन्होंने भक्ति की शक्ति को जात पात के बंधन से अलग करके ब्राह्मणी समाज की कुरितियों को चुनौती देकर समाज को एक नई सोच से रूबरू कराया था। उनकी इसी विचारधारा को मानने वाले आज रविदासियां कहलाते है, जो आज पंजाब में एक प्रभावी समाज है।



