Top 5 Dalit news: जब भी चुनाव आते है तो सबसे ज्यादा राजनीति दलितों और पिछड़ों के नाम पर ही होती है। पार्टी कोई भी हो, मुद्दा हमेशा दलित ही होता है। ऐसा दिखाया जाता है कि उक्त पार्टी की सरकार आएगी तो दलितों की चांदी हो जाएगी लेकिन दुःख की बात तो ये है कि दलितों ने आजादी के बाद सबको मौके दिए है लेकिन सरकार बदल गई मगर दलितों की स्थिति भी बदली। तो चलिए आपको इस लेख में पिछले 24 घंटे में दलितों के साथ होने वाले घटनाओं के बारे में बतायेंगे जो इस वक्त सोशल मीडिया पर काफी सुर्खियों में है।
दलितो को साधने में लगे राहुल गांधी
1, दलितों से जुड़ा पहला मामला राजधानी दिल्ली से है। जहां आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर यूपी में होने वाली हलचल का असल और दलित वोट बैंक को साधने की जुगत दिल्ली में भी शुरू हो चुकी है। दरअसल राज्य में बीजेपी की सरकार है लेकिन कांग्रेस बीजेपी पर दलितों के साथ अन्याय करने का आरोप लगाती रही है, इसी कड़ी में कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने अब दलितों का मुद्दा उठाते हुए पीएम नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिख कर गुहार लगाई है।
राहुल गांधी ने चिट्ठी में 2 अप्रैल 2018 में अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण कानून को लेकर सरकार के फैसले के खिलाफ हुए देश व्यापी दलित आंदोलन में जिन दलित युवाओं पर केस दर्ज किये गए थे, उन्हें खारिज कर देना चाहिए। उन्होंने लिखा कि इस आंदोलन में 14 दलित युवाओं की भी मौत हुई थी..दरअसल अप्रैल 2018 में केंद्र सरकार ने एक फैसला लिया था जिससे एससी-एसटी कानून कमजोर होने के आसार बढगए थे, क्योंकि सरकार ने दलितों और आदिवासियों के खिलाफ हिंसा, अन्याय करने वालों को न्याय और सुरक्षा पाने का अधिकार दे दिया था..
जिसके खिलाफ देश व्यापी दलित आंदोलन हुआ था और सरकार को ये कानून वापिस लेना पड़ा था। राहुल गाँधी ने अपील की है कि मामले में फंसे युवा आज भी कोर्ट के चक्कर लगा रहे है, जिससे उनका भविष्य अंधेरे में है। सरकार को उन पर अब दया करनी चाहिए और मामले को खारिज कर देना चाहिए। हालांकि देखना ये होगा कि इस मुद्दे पर सरकार की क्या राय होती है, साथ ही कांग्रेस को इससे क्या फायदा होगा.. लेकिन सवाल यहीं है कि क्या इससे दलित कांग्रेस के पाले में आ जायेंगे।
तेलंगाना में फिर उठी दलित इसाइयों के हक की मांग
2, दलितो से जुड़ा अगला मुद्दा तेलंगाना के खम्मम से है, जहां दलित ईसाइयों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी दलित ईसाई हार मानने को राजी नहीं है। शुक्रवार को गुड फ्राइडे के मौके पर खम्मम धर्मप्रांत के बिशप सगीली प्रकाश ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए फिर से समीक्षा करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 13, 14 और 25 के तहत दलित इसाइयों को भी धर्म की स्वतंत्रता और कानून के समक्ष समानता मिलनी चाहिए, जबकि अनुसूचित जाति आरक्षण का लाभ न देना उन्हें सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित बना रहा है।
इतना ही नहीं उन्होंने 1950 के उस फैसले की भी आलोचना की जिसमें हिंदूओं के साथ साथ सिखों और बौद्धो को तो अधिकार मिले लेकिन ईसाइयों और मुसलमानो को बाहर रखा.. ये केवल धार्मिक सौहार्द के खिलाफ उठाया गया कदम था। जो धर्म बदलने वाले दलित ईसाइयों के अधिरारो पर प्रहार है। विशव के इस तरह के आरोपो और आलोचनाओ के बाद क्या सुप्रीम कोर्ट फिर से दलित इसाइयों के लिए अपने विचार बदलेगी… वैसे हम आपसे पूछना चाहते है कि क्या दलित इसाईयों को भी आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए.. आप सुप्रीम कोर्ट के फैसले से कितने सहमत है हमें कमेंट करके जरूर बतायें।
जम्मू कश्मीर कोर्ट का अटपटा फैसला
3, दलितों से जुड़ा अगला मामला जम्मू कश्मीर से है… लगातार ये मुद्दा उठाया जा रहा है कि सरकार के साथ साथ न्याय पालिका भी एससी एसटी एक्ट को कमजोर करने की साजिश में लगी है, वो लगातार इस कानून पर नए नए बेतुके फैसले सुना रही है। इसी कड़ी में अब जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने एससी एसटी एक्ट को लेकर एक फैसला सुनाते हुए कहा है कि केवल जाती का नाम लेने से , या एससी एसटी समुदाय के व्यक्ति को गाली देने से वो इस एक्ट में शामिल नहीं होगा। कोर्ट ने कहा कि उसके लिए आरोपी की सार्वजनिक जगह पर जाति के नाम पर गाली दी गई हो.. जिसके कई चश्मदीद होने चाहिए.. तभी वो इस एक्ट के अंतर्गत अपराध होगा।
बता दें कि ये मामला डोडा पुलिस स्टेशन के अंतर्गत आने वाले कास्तीगढ़ में एक सड़क उद्घाटन समारोह में शिकायतकर्ता पर हमला किया था और मेघ समुदाय होने के कारण उसे चिनल जैसे जातिसूचक शब्दो से बुलाया गया था। लेकिन कोर्ट ने इस अपील को खारिज करते हुए एसे एससी एसटी एक्ट से बाहर करते हुए कहा कि चूंकि “चिनल” शब्द जम्मू और कश्मीर अनुसूचित जाति आदेश, 1956 में शामिल ही नहीं है, इसलिए इसे जाति का नाम नहीं कहा जा सकता।
वहीं केवल एक नाम लेने से ये अपराध नहीं हो सकता है। हैरानी की बात है कि कानून उन शब्दों को भी जातिसूचक नहीं मानता है जो संविधान में दर्ज नहीं है लेकिन सदियों से दलितों और पिछड़ों के लिए इस्तेमाल किये जा रहे है। ये केवल इशारा है कि कोर्ट भी जातिवादी आतंकियों को आजादी दे रही है कि जो संविधान में नहीं है आप उन नामों से अपमान कर सकते है.. और आजाद घूम भी सकते है। तो भला कैसे ये कानून दलितों और पिछड़ो के लिए सहायक होगा। जवाब आप खुद सोच कर बताइयें।
हमीरपुर में दलित किसान के साथ मारपीट
4, दलितो से जुड़ा अगला मामला उत्तर प्रदेश के हमीरपुर से है, जहा एक दलित कितान ने अपने खेतो के मेड़ मे झांकर क्या लगा ली, जातिवादी दबंगो को ये इतना चुभा कि उन लोगों ने किसान को न केवल बुरी तरह से पीटा बल्कि उसे नलकूप के कमरे में बंद कर के जबरन फांसी पर लटकाने की भी कोशिश की। ये घटना हमीरपुर के भरूआ सुमेरपुर थाना क्षेत्र के बांक गांव की है। पीड़ित रघुवर प्रसाद ने पुलिस को तहरीर दी है कि वो अपने खेतों की मेड़ पर फलो की सुरक्षा के लिए झांकर लगा रहे थे तभी गांव के ही कुछ दबंग वहां आ पहुंचे।
पहले तो उन लोगो ने पीड़ित को जातिसूचक गालियां दी, लेकिन जब किसान ने इसका विरोध किया तो उसे तमंचा निकाल कर मारने दौड़े, जान बचाने के लिए जब वो नलकूप के कमरे में घुस गए तो वहां भी नके साथ बुरी तरह से मारपीट की गई और उसे जान से मारने की कोशिश की। लेकिन शोर सुनकर जब लोग जमा होने लगे तो वो लोग भाग खड़े हुए।
पुलिस ने मामले की गंभीरता को समझते हुए तुरंत कार्यवाई शुरु कर दी है। फिलहाल आरोपी फरार है.. हैरानी की बात है कि दलितों को बंधुआ मजदूरी कराना काफी नहीं था कि अब उनके हक को भी खाने पर तुले है.. देखना ये होगा कि पुलिस क्या एक्शन लेता है।
रिंकू सिंह राही के इस्तीफें पर पूर्व अधिकारी का बयान
5, दलितों से जुड़ा अगला मामला पंजाब के चंडीगढ़ से है। जहां उत्तर प्रदेश के दलित IAS अधिकारी रिंकू सिंह राही के साथ होने वाले भेदभाव और उनकी प्रताड़ना का मामला अब राष्ट्रव्यापी बन चुका है। एक दलित होने के कारण रिंकू सिंह को जिस तरह का भेदभाव का सामना करना पड़ा, उसके कारण उनका इस्तीफा देना जायज है…
कुछ ऐसा ही कहना है पंजाब के रिटायर्ड IAS अधिकारी और फगवाड़ा से कांग्रेस विधायक बलविंदर सिंह धालीवाल का.. उन्होंने सीधे तौर पर यूपी के बीजेपी सरकार पर संगीन आरोप लगाते हुए कहा कि बीजेपी के राज में दलितों और पिछड़ो की स्थिति बेहद दयनीय है, वो किस पद पर है, किस ओहदे पर है उससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। रिंकू सिंह का उदाहरण इस वक्त सबसे सटीक है। धालीवाल ने कहा कि बीजेपी के राज में दलितो की स्थिति सबसे ज्यादा बुरी है। ये बीजेपी ही है जिसने 2018 में भी एससी एसटी कानून को बदलने उसे कमजोर करने की कोशिश की थी, इतना ही नहीं उनके अधिकारों को छीनने की भी बड़ी साजिश की जा रही है।
दलित छात्रो को लगातार शैक्षणिक संस्थानों में जो उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है उसे लेकर भी सरकार का रवैया लचर है। बीजेपी को अपनी नीतियो में बदलाव लाना चाहिए.. सरकार दलितो की स्थिति पर कोई कार्यवाई नहीं कर रही है, ये स्थिति बेहद खतरनाक है। वैसे आप कांगेस नेता की बातों से कितना सहमत है।



