Dr. B R Ambedkar: दलितों और पिछड़ो के लिए सम्मान और समानता की लड़ाई लड़ने वाले अनेक आंदोलन और नेता हुए.. लेकिन उन सबमें सबसे ज्यादा प्रचलित बाबा साहब डॉक्टर भीम राव अंबेडकर ही हुए.. कभी सोचा है आपने ऐसा क्यों है। क्यों केवल बाबा साहब का ही नाम लिया जाता है दलितो के मसीहा के रूप में.. जबकि ज्योतिबा फूले और सावित्री बाई फूले ने पहली बार महिला और दलितो की शिक्षा पर जोर दिया था.. मगर जो काम बाबा साहब ने किया उसे कभी कोई टक्कर नहीं दे पाया.. वजह साफ थी, जहां अन्य नेताओं ने केवल अपने राज्य तक सिमित होकर आंदोलन किया वहीं बाबा साहब ने संसद में घुस कर आवाज उठाई.. वो किसी विशेष राज्य तक सीमित नहीं हुए थे।
5000 साल पुरानी कुरितियों और परंपराओ को खुली चुनौती
बल्कि उन्होंने पूरे भारत को इस क्रांति में शामिल कर दिया था.. ये वो शख्स थे जिन्होंने भारत की 5000 साल पुरानी कुरितियों और परंपराओ को खुली चुनौती दी थी। जिन्होंने ये साबित किया कि जातिवाद कोई भगवान की बनाई नीति नहीं बल्कि ब्राह्मणवादी हिंदू परंपरा की कुरीति है.. जिसका खंडन होना ही चाहिए। अपने इस लेख में हम बात करेंगे बाबा साहब के उस कहानी की, जब उन्होंने अपनी शिक्षा, अपने विवेक और समझ के दम पर 5000 साल पुरानी परंपरा को खुली चुनौती दे दी थी। बाबा साहब की इस चुनौती को हम कई बिंदुओ और पहलुओ के अनुसार देखते है।
शिक्षा के लिए भेदभाव
चुंकि बाबा साहब अंबेडकर एक महार जाति से थे, जो कि अछूत जाति कहलाती थी, यानि की उनकी छुई हुई कोई भी वस्तु को तथाकथित ऊंची जाति के लोगों द्वारा छूना धर्म भ्रष्ट करने के रूप में परिभाषित किया जाता था, ऐसे ने बाबा साहब ने पहली बार गांव के ऊंची जाति के बच्चों के लिए बनाए स्कूल में पढ़ने के लिए लड़ाई लड़ी, तमाम कोशिशें की गई कि बाबा साहब शिक्षा हासिल न कर सकें लेकिन वो जिद्दी थे, और अपनी जिद्द के कारण ही उन्होंने गांव के लोगों को झुकने पर मजबूर कर दिया। उनकी दलीलों का किसी के पास कोई जवाब ही नहीं होता था। लेकिन केवल स्कूल में दाखिला लेने से ही भेदभाव खत्म नहीं हो सकता, स्कूल के भीतर उन्होंने पहली बार जातिगत अपमान को करीब से सहा।
नो peon नो water , के कारण वो पूरे दिन प्यासे रह जाते थे, कक्षा के बाहर खड़े हो कर पढ़ते थे, क्योंकि कक्षा में बैठने की इजाजत नहीं थी, लेकिन बाबा साहब ने हार नहीं मानी, उन्होंने उस अपमान को आग की तरह अपने मन में इकट्ठा करना शुरू कर दिया, वो आग जो एक दिन इस रूढ़िवादी परंपरा को जलाने वाली थी। सबके खिलाफ जाकर नन्हे भीम का स्कूल जाना और गांव के पहले अछूत जाति के बच्चे का दसवीं पास करना, बदलाव की दिशा में उनका पहला कदम था।
अमेरिका औऱ लंदन जाकर पढ़ाई
बाबा साहब ने ये माना कि केवल शिक्षा ही वो शेरनी का दूध है जो पिएगा वो ही दहाड़ेगा। दलितों पिछड़ों को इसलिए गुलाम बना कर रखना आसान था क्योंकि वो शिक्षित नहीं थे, अगर वो शिक्षित होने लगे तो उन्हें अपने अधिकारों का ज्ञान होगा। चुंकि उस वक्त भले ही छुआछूत था लेकिन अंग्रेजी हुकुमत की नजरो में ये जातिवाद नहीं था.. जिसका कहीं न कहीं फायदा बाबा साहब को हुआ और बाबा साहब ने दलितों को शिक्षा के प्रति जागरूक करने के लिए अमेरिका औऱ लंदन जाकर पढ़ाई की थी।
ये सबूत था कि बुद्धि, कौशल, औऱ क्षमता किसी एक जाति विशेष की जागीर नहीं है बल्कि उसपर सबका अधिकार है… हालांकि ये बेहद दुख की बात है कि भारत में जातिगत भेदभाव को तो वो अपने लिए उस वक्त तो दूर नहीं कर पाये..लेकिन जब वो संविधान के शिल्पकार बने तो अपने साथ हुए एक्सपीरियंस के आधार पर उन्होंने भारत के करोड़ो दलितो और पिछड़ो को वो मजबूती दे दी, जो उन्हें किसी भी समाज में बराबरी से खड़े होने का अधिकार देता है। ये था बाबा साहब की शिक्षा के कारण हुआ दूसरा सबसे बड़ा बदलाव।
चावदार तालाब से पानी पीकर महाड़ सत्याग्रह किया
बाबा साहब ने भले ही अमेरिका और लंदन में भेदभाव से परे आजाद और खुली हवा में सांस ली थी, लेकिन जब वो लौटे तो उन्होंने महसूस किया कि केवल उनकी डिग्री बदलाव नहीं ला सकती है, जरूरी है कि अब हक के लिए खुद सड़को पर उतरा जायें। जमीनी स्तर पर कुछ ऐसा किये जायें, जिससे लोगों में अपने अधिकारों के लिए जागरूकता हो.. बस फिर क्या था, उन्होंने बराबरी को दिखाने के लिए सैकड़ो लोगो को जमा कर 20 मार्च 1927 को चावदार तालाब से पानी पीकर महाड़ सत्याग्रह किया।
मनुस्मृति को जला कर समाज को संदेश दिया
वहीं दलितों को गुलाम बनाने वाली ग्रंथ मनुस्मृति को 25 दिसंबर 1927 को ही जला कर समाज को ये संदेश दिया कि ये केवल कुछ लोगो की मनगढ़ंत गढ़ी कहानियां है, जबकि दलितों को भी बराबरी और सम्मान से रहने का अधिकार है। इन दो आंदोलनो के कारण बाबा साहब अब जनमानस के दलित नेता बन गये थे, जो उनके अधिकारो के लिए लड़ रहे थे, और दलितों ने बाबा साहब को फॉलो करना शुरु कर दिया, ऐसा पहली बार हुआ था जब दलित एकजुट होने लगे थे, और अपने हक के बारे में जानने और सोचने लगे थे। ये थी बाबा साहब के बदलाव की तीसरी कड़ी।
कांग्रेस की दलित विरोधी मानसिकता
बाबा साहब को संविधान सभा में शामिल होने के लिए भी काफी पापड़ बेलने पड़े थे, कांग्रेस और नेहरू कभी नहीं चाहते थे बाबा साहब इस सभा का हिस्सा बने, नतीजा चुनावो में नेहरू ने उन्हें हराने के लिए ऐड़ी चोटी का जोर लगा दिया। लेकिन बाबा साहब जानते थे कि अगर वो संविधान सभा में शामिल नहीं हुए तो कांग्रेस कभी दलितो के साथ न्याय नहीं करेगी। कांग्रेस की दलित विरोधी मानसिकता पहले ही जाहिर थी, बस जब बाबा साहब को बंगाल से मौका मिला तो उन्होंने उसे जाने नही दिया, मगर बंटवारे के कारण बाबा साहब का मौका हाथ से चला गया मगर उन्होंने हार नहीं मानी और उनकी तत्परता देख कर गांधी जी को खुद आगे आकर बाबा साहब की मदद करनी पड़ी..और वो पहुंच गए संविधान सभा।
बीमा और समान वेतन देने का प्रावधान बनाया
बाबा साहब ने संसद में रह कर वो काम किये जिसके बारे में शायद कभी कल्पना भी नहीं की गई थी। ये बाबा साहब ही थे जिन्होंने लोगो को बंधुआ मजदूरी से निकाल कर 8 घंटे मजदूरी का कानून बनाया था साथ ही बीमा और समान वेतन देने का प्रावधान बनाया, उन्होंने महिलाओ के लिए भी बिना भेदभाव वाला कानून बनाया, जो उन्हें पुरुषो के बराबर खड़ा करता है, मैटरनीटी लीव वो भी पेमेंट के साथ मुहैया कराई, महिलाओ को संपत्ति पर अधिकार, तलाक लेने का अधिकार देने की मांग भी उठाई..ये बाबा साहब का ही मानना था कि वो किसी भी समाज की तरक्की को उस समाज की महिलाओं की डिग्री से मापते है।
शायद बाबा साहब न होते तो आज भी देश की महिलाओ को मनुस्मृति के कहे अनुसार चारदिवारी के भीतर कैद ही रखा जाता, जिन्हें सम्मान नहीं बल्कि उपभोग मात्र की चीज समझा जाता, जो कि केवल सेवा के लिए पैदा हुई है। लेकिन बाबा साहब की सूझ बूझ.. और उनके दूरदर्शी सोच के कारण आज भारत की महिलाएं कुछ भी कर सकती है। बाबा साहब द्वारा रूढिवादी परंपराओं पर ये सबसे बड़ी चोट थी। उन्होंने उस व्यवस्था को अपनी शिक्षा के दम पर खत्म कर दिया था जो पिछले 5000 सालो से महिलाओं को, पिछड़े लोगो को शोषित कर रही थी।



