बाबा साहब की पत्नी पर ‘हत्या’ का आरोप और नेहरू की जांच, क्या यह कोई गहरी राजनीतिक कूटनीति थी?

Nehru Ambedkar
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बाब साहब ने 14 अक्टूबर 1956 के दिन नागपुर की दीक्षाभूमि पर बौद्ध धर्म अपनाने के साथ ही नवयान परंपरा की शुरुआत की थी.. लेकिन उसके मात्र दो महीने बाद ही 6 दिसंबर 1956 को नींद में ही उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मौत वाकई में सबसे लिए शॉकिंग थी, लेकिन सबसे ज्यादा असर पड़ा उनकी दूसरी पत्नी सविता अंबेडकर की छवि पर.. जिनसे बाबा साहब ने 1948 में शादी की थी.. बाबा साहब के नौकर के मुताबिक बाबा साहब किसी बात को लेकर सविता अंबेडकर से नाराज थे, और मौते से कुछ दिनो पहले उनकी तबियत भी खराब चल रही थी।

लेकिन सबसे हैरान करने वाली बात ये थी कि बाबा साहब की मत्यु के वक्त सविता अंबेडकर उनके बाजू में ही सोई हुई थी, लेकिन उन्हें सुबह तक पता ही नहीं चला कि बाबा साहब का देहांत हो गया है.. सविता अंबेडकर की इन बातो के कारण अटकले लगनी लगी कि शायद उन्होंने बाबा साहब की हत्या कर दी है.. उनके कारण ही बाबा साहब की मृत्यु हो गई है.. और न जाने क्या क्या… जिसका नतीजा ये थे कि तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने सविता अंबेडकर को लेकर जांच के आदेश दे दिये थे। हैरानी की बात है कि नेहरू और बाबा साहब के बीच का रिश्ता बेहद कड़वाहट भरा था.. फिर ये आदेश देना केवल सहानूभूति थी या फिर कोई राजनीतिक कूटनीति.. और क्या निकला जांच का रिजल्ट.. जानेंगे नेहरू के आदेश के पीछे की सच्चाई।

बाबा साहब ने खुद उनकी तारीफ

बाबा साहब की मृत्यु के बाद 1957 में उनकी अतिंम किताब बुद्ध एंड धम्मा पब्लिश हुई थी, इस किताब में बाबा साहब ने अपनी पत्नी सविता अंबेडकर की तारीफों में कई बाते कहीं है। उन्होंने किताब में लिखा है कि उनकी पत्नी सविता उनकी बिमारी से लड़ने में मदद करती है.. उनकी स्वास्थ्य की देखभाल करती है। वो एक बेहतरीन डॉक्टर है एक बेहतर नर्स है। बाबा साहब ने खुद उनकी तारीफ की है.. लेकिन बाबा साहब की मौत के बाद किसी ने नहीं सोचा था कि उनकी इतनी देखभाल करने वाली पत्नी पर ही उनकी हत्या का आरोप लगेगा।

कहा जाता है कि बाबा साहब कहते थे कि सविता से शादी करके उनकी जिंदगी की 10 साल बढ़ गए थे.. लेकिन हैरानी की बात है कि जब पहली बार ये किताब छपी थी तब बाबा साहब के साथियों और अनुयायियों ने किताब के इस हिस्से को ही हटा दिया था, जिसे बाद में बंगाली बौद्ध लेखक भगवान दास ने इस प्रस्तावना को एक “दुर्लभ प्रस्तावना” के रूप में प्रकाशित किया था। यानि की बात साफ थी कि बाबा साहब की हत्या का आरोप लगा कर सविता अंबेडकर की छवि खराब करने की केवल एक साजिश थी।

जब नेहरू ने दिये जांच के आदेश

बाबा साहब की आकस्मिक मौत के बाद सबसे ज्यादा सविता अंबेडकर को आलोचना झेलनी पड़ी। बाबा साहब के परिवार ने कभी भी उन्हें नहीं अपनाया था, और आरोपो के बाद और ज्यादा अकेली पड़ गई थी। वहीं बाबा साहब के परिवार ने इस मामले में जांच की मांग की..परिवार वालो ने सविता पर आरोप लगाया कि उन्होंने बाबा साहब को स्लो पॉइजन देकर मारा है। वहीं तब 19 सांसदो ने तत्कालीन गृहमंत्री गोविंद वल्लभ पंत को चिट्ठी लिख कर मौत को संदिग्ध बताते हुए जांच की मांग की थी। जिसके कारण तत्कालिन पीएम पंडित नेहरू ने जांच के आदेश दे दिये थे। सविता अंबेडकर पर ये भी आरोप लगे थे कि उनके कारण बाबा साहब अपने परिवार और अनुयायियो से दूर रहने लगे थे।

सविता अंबेडकर के ऊपर बैठी जांच

वहीं सविता अंबेडकर बाबा साहब के अंतिम संस्कार के वक्त भी नही रोई थी, जबकि वहां मौजूद सभी लोग रो रहे थे, जिसके कारण भी लोगो ने गलत सोचना शुरू कर दिया था.. यहां तक कि ये भी कहा गया कि सविता अंबेडकर एक ब्राह्मण थी और बाबा साहब के बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार को रोकने के लिए उन्हें जहर देकर मार दिया है। नेहरू सरकार पर जब दवाब बढ़ा तो उन्होंने भी सविता अंबेडकर के ऊपर जांच बिठा दी।

हालांकि उन्होंने कभी इस मामले में कुछ नहीं कहा था, लेकिन वोटर्स को लुभाने के लिए, बाबा साहब के समर्थको के लुभाने के लिए नेहरू का ये दाव काफी अच्छा था। ताकि वो दिखा सकें कि बाबा साहब के प्रति लोगो की जो सहानुभूति है उसका वो पूरा सम्मान करते है.. हालांकि हम सभी जानते है कि बाबा साहब को नीचा गिराने के लिए सबसे बड़ी भूमिका नेहरू की ही थी। नेहरू के कारण ही बाबा साहब का राजनीतिक करियर खत्म हुआ था।

एक सदस्यीय समिति जांच

डीआईजी सक्सेना की एक सदस्यीय समिति ने जांच शुरू की.. औऱ रिपोर्ट में सविता अंबेडकर पूरी तरह से आरोपो से बरी हो गई.. रिपोर्ट में बताया गया कि बाबा साहब की मौत नेचुरल थी, उनकी डायबीटिज औऱ ख़राब सेहत के कारण ही मौत हुई थी। सविता अंबेडकर बरी हो गई थी लेकिन वो हमेशा अकेली ही रही थी, उन्हें राजनीति में आने का भी न्यौता दिया गया लेकिन उन्होंने साफ इंकार कर दिया। वो कहती थी कि कांग्रेस ने बाबा साहब का कभी सम्मान  नहीं किया.. अगर वो उनका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया होता तो वो बाबा साहब की संघर्षों का अपमान होता।

वो हमेशा अंबेडकर के नाम साथ ही जी.. बाबा साहब के प्रति उनकी निष्ठा उनके निधन तक बनी रही थी। 29 मई 2003 को स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण उनका निधन हो गया था। सविता अंबेडकर को भले ही कितना क्रिटीसाइज किया गया हो लेकिन उन्होने सहीं मायने में बाबा साहब की लड़ाई लड़ी थी। जिसे उनका अपना परिवार, उनके बच्चे नहीं लड़ सकें थे। सविता अंबेडकर की निष्ठा को हमरा सलाम।

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