नए कानून, नई उम्मीदें, क्या भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली सच में बदलेगी?

India law and order
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New Criminal laws: 15 अगस्त 2022 को 76वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आने वाले 25 सालों के पंच प्रणों की बात की थी, जिसमें उन्होंने दूसरे प्रण में कहा था कि वो नहीं चाहते थे आजादी के 76 साल बाद भी हमारे अस्तित्व में, हमारे आदतो में और मन के कहीं न कहीं गहरे कोने में गुलामी का अंश छिपा हुआ है, उसकी अवशेष अभी भी हमारे आसपास मौजूद है, इसलिए इन पांच प्रणों में से एक प्रण था कि खुद को गुलामी की मानसिकता  से दूर करने के लिए कुछ बड़े बदलाव किये जाये। जो असल में हमारी दूसरी प्राण शक्ति का ही हिस्सा है। जिसकी शुरुआत गुलामी के समय से चले आ भारतीय कानूनो को बदल कर की जाये।

कड़े कानूनो का मसौदा तैयार

नतीजा ये हुआ कि केंद्र सरकार ने सभी मंत्रालयों को हुक्म दिया कि औपनिवेशिक काल के अप्रचलित प्रावधानों की सूची निकाली जायें, और नए भारत की आकांक्षाओं को पूरा करने वाले नए और कड़े कानूनो का मसौदा तैयार किया जायें। मंत्रालय में अपना काम बखूबी किया और करीब 1500 से ज्यादा पुराने कानूनों को निरस्त कर दिया गया।

1 जुलाई 2024 को औपनिवेशिक काल के कानूनों को निरस्त कर भारत का अपना कानून लागू किया गया, जिसे भारतीय दंड संहिता यानि की बीएनएस कहा गया। लेकिन सवाल ये है कि क्या कानून भारत में क्रिमिनल जस्टिस में सकारात्मक बदलाव ला पायेंगे। इस पर एक विश्लेषण करते है।

18 धाराओं को हटा ही दिया

केंद्र सरकार की कानूनो में बदलवा करने की पहली कोशिश ये थी कि आईपीसी की अनावश्यक धाराओं को या तो कानून की किताब से हटा दिया जायें, या फिर उन्हें आसान बना दिया जायें, ताकि आम लोगो को वो कानून आसानी से समझ आ सकें। जैसे की धारा 6 से लेकर 52 धाराओ को एक ही दारा में बदल दिया गया, वहीं 18 धाराओं को हटा ही दिया गया, करीब 75 प्रतिशत धारायें अभी भी आईपीसी से प्रेरित है लेकिन कुछ बड़े बदलावो के साथ।

कई कानूनों को सख्ती से जोड़ा गया और उनका पालन शुरु किया गया, जैसे कि विवाह का झूठा वादा कर शारीरिक उत्पीड़न करना, नाबालिगों के साथ सामूहिक बलात्कार, भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या जैसे कई प्रावधानों को आईपीसी में कुछ खास स्थान नहीं मिला था, लेकिन अब ये कानूनी अपराध की श्रैणी में है, और पीड़ित को पूरा न्याय भी मिलेगा और सभी शामिल आरोपियो को कड़ी से कड़ी सजा भी होगी।

सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देशों को शामिल किया

इसमें सबसे अच्छा जो बदलाव हुआ है वो है कि अब से भारत के हर राज्य को गवाह संरक्षण योजनाओं को लागू करना  अनिवार्य कर दिया गया, जिसके बाद से गवाहों की सुरक्षा और सहयोग को  राज्य सरकारों को ही सुनिश्चित करना होगा। समानता को बढ़ावा देने के लिए थर्ड जेंडर के साथ होने वाली अपराधों को भी इसमें शामिल किया गया और मजबूत भी किया गया। वहीं मई साल 2022 में जब सर्वोच्च न्यायालय ने राजद्रोह कानून को “प्रथम दृष्टया असंवैधानिक” करार दिया था और उसके संचालन को रोकने की बात की थी, उसे देखते हुए राजद्रोह को समाप्त कर दिया गया।

वहीं उसे और कड़ा करते हुए 1962 के केदारनाथ सिंह मामले में सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देशों को शामिल करके राजद्रोह का बस नाम बदल कर देशद्रोह कर दिया गया। वहीं नये कानून को महिलाओ के अधिकारों को और मजबूत किया है, ताकि महिलाओ और बच्चो के प्रति अपराधों में कमी आई।

इलेक्ट्रॉनिक सबूतो को दी मान्यता

वहीं पहली बार  नस्ल, जाति या समुदाय के आधार पर हत्या को संगीन अपराध माना है, जिसमें मॉब लिंचिग को अपराध की श्रैणी में शामिल कर दिया। सरकार ने कोशिश की है कि कानून में पारदर्शितां लाने के लिए और जल्द से जल्द मामलों का निपटान हो सकें उसके लिए  जीरो एफआईआर शिकायतों का ऑनलाइन पंजीकरण, अपराध स्थलों पर अनिवार्य वीडियोग्राफी और फोरेंसिक टीम के दौरे और इलेक्ट्रॉनिक सबूतो को भी मान्यता दे दी है। वहीं अब से रिमांड मिलने पर अगर आरोपी पूछताछ में समर्थन नहीं देते हो रिमांड को को आगे बढ़ाया जा सकता है, आईपीसी में आरोपी 15 दिनो की रिमांड में कई बार बीमारी का बहाना बना कर पूछताछ में सपोर्ट नहीं करते थे। लेकिन अब अगर ऐसा होता है कि रिमांड को बढ़ा दिया जायेगा, ताकि पुलिस की कार्यवाई पूरी हो सकें।

भारत में न्याय व्यवस्था बेहद लचर

कानून में बदलाव का सबसे बड़ा कारण यहीं कि सालों लंबित चलने वाले मुकदमे अब जल्द से जल्द निपटायें जायें। वर्ल्ड जस्टिस प्रोजेक्ट ने  रूल ऑफ लॉ इंडेक्स 2023 में एक रिपोर्ट जारी की थी जिसमें नागरिक न्याय में 142 देशों में से 111वां और आपराधिक न्याय में 93वां पर था। यानि की भारत में न्याय व्यवस्था बेहद लचर रही है। नए कानून के आने से अब से कोर्ट को केवल दो सुनवाई स्थगित करने की अनुमति है, यानि की सुनवाई लंबी चलेगी ही नहीं, वहीं फैसले मुकदमे की सुनवाई पूरी होने के 45 दिनों के भीतर सुनाने का प्रावधान है। बीएनएस को लागू करने के पीछे सरकार की एक ही मोटो है- “नागरिक सर्वोपरि, गरिमा सर्वोपरि और न्याय सर्वोपरि” ।

सरकार ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की है कि नए कानूनो को लागू कर देश में अपराधों में कमी लाई जायें और न्याय व्यवस्था को और ज्यादा निष्पक्ष बनाया जाये, और एनआरसीबी के आकड़े बताते है कि कुल दर्ज मामलों में 6 प्रतिशत की कमी आई है तो वहीं चोट और गंभीर चोट के मामलों में और ज्यादा 30 प्रतिशत की कमी आई है। हालांकि इतने सख्त कानूनो के बाद भी महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध और साइबल अपराधों में हुई बढौतरी चिंता का विषय है। नए जस्टिस सिस्टम से न्याय व्यवस्था में बदलाव तो आया है लेकिन 160 पुराने ढांचे को बदलने में अभी थोड़ा समय लगेगा..और शायद भविष्य में सालों तक लंबित मुकदमों की सूचि कम होती जायेगी।

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