Buddha’s first teaching: धर्म की शुरुआत बुद्ध का पहला उपदेश और जीवन बदलने वाला अष्टांगिक मार्ग

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BUDDHA’s FIRST TEACHING: एक 29 साल का युवक, जिसने अपनी अब तक कि उम्र राजशी जीवन जी कर बिताई थी.. पिता राजा शुद्धोधन थे, बचपन में पहले ही मां को खोने वाले राजकुमार को किसी तरह की कोई कमी न हो, इसलिए महल में राजसी ठाठबाट और सारी सुख सुविधायें थे.. लेकिन इन सब के बाद भी पिता उस भविष्यवाणी को नहीं बदल सकें, जिसे बचपन में राज पुरोहितों ने की .. महाराज आपका पुत्र या जो महा प्रतापी राजा बनेगा या फिर महा प्रतापी वैरागी.. जो संसार में लोगों की सोच को बदलने के लिए जन्मा है।

जब पहली बार बुद्ध वृक्ष के नीचे तप करने बैठे

पिता का डर सच साबित हो गया और 29 साल के युवराज सिद्धार्थ गौतम ने केवल ये सत्य जानने के लिए कि मनुष्य को आखिर दुख क्यों होता है, न केवल महलो का सुख छोड़ा बल्कि एक साल के बेटे और अप्सरा से सुंदर पत्नी यशोधरा का भी त्याग कर दिया.. 1 साल तो केवल भटकते भटकते निकल गए., औऱ फिर पहुंचे बिहार के गया.. जहां एक पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ कर तप करने.. करीब 6 सालो के कठोर तप के बाद गौतम बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ती हुई थी..वो ज्ञान जिसने उन्हें संसार में दुखो का कारण बताया..जिसके बाद उन्होंने तय किया अब वो संसार से दुख को दूर करेंगे, और शुरु हुई उनकी पहली धम्म यात्रा।

बुद्ध के पांच शिष्य कौन हैं?

गौतम बुद्ध निकल पड़े यात्रा पर.. गया से सीधा वो पहुंचे  वाराणसी से कुछ किलोमीटर दूर एक स्थान मृगदावा अथवा ऋषिपटना नाम के स्थान पर.. आज के समय में हम इस स्थान को सारनाथ के नाम से जानते है। बुद्ध को परम ज्ञान की प्राप्ति हो चुकी थी.. और उन्हें वो ज्ञान दूसरो में भी बांटना था.. उसके लिए सबसे पहले उन्हें चाहिए थे शिष्य.. उन्होंने अपनी दिव्य नेत्रों से जाना था कि उन्हें उनके पहले पांच शिष्य मृगदावा में ही मिलेंगे। बुद्ध कई दिनो की यात्रा कर पहुंचे.. और वो मृगदावा पहुंचे, जो कि हिरणों का एक उद्याण था। यहां बुद्ध बैठ कर ध्यान करने लगे.. औऱ तब वहां पहली बार उनके पहले पांच शिष्यों ने बुद्ध को देखा।

भगवान बुद्ध का पहला संदेश

ये पांच शिष्य कोंडन्ना, महानमा, भद्दिया, वप्पा और असाजी थे। ये पांचो बुद्ध की आभा से इतने प्रभावित हुए कि उनके सामने बैठ गए। बुद्ध जानते थे कि ये वहीं पांच लोग है जो बौद्ध धर्म के विचारों को न केवल पालन करेंगे बल्कि उनका संदेश दुनिया तक पहुंचायेंगे। बुद्ध ने अपना पहला प्रवचन जब शुरु किया जब कहा जाता है कि स्वर्ग से देवता भी उन्हें सुनने के लिए धरती पर आये थे। बुद्ध ने अपने पांचो शिष्यों से सबसे पहले  दो अतिवादी प्रवृत्तियों को हमेशा के लिए त्याग देने को कहा- अपनी इंद्रिय सुखों में लिप्त रहना और बिना कारण शरीर को कष्ट देना।

ये चार आर्य सत्य

बुद्ध ने उन्हें कहा कि ये दोनो ही स्थिति ऐसी है जिससे व्यक्ति का आध्यात्मिक विकास पूरी तरह से बाधित होता है। इसलिए बुद्ध ने माध्यम मार्ग को चुनने का संदेश दिया, जो  ज्ञान, उच्चतर बुद्धि, शांति और निर्वाण प्राप्त करने के मार्ग पर ले जाने वाला है। यहीं पहली बार बुद्ध ने चार आर्य सत्य के बारे में बताया था।

ये चार आर्य सत्य – दुख का सत्य, दुख का कारण, दुख का निवारण और दुख निवारण करने के लिए चुना गया मार्ग। बुद्ध ने तब सत्य उजागर किया था कि संसार में जो है वो दुख से भरा है, और दुख कारण व्यक्ति की इच्छा और लालसा है, इस दुख से निकलने का एकमात्र उपाय निर्वाण है और निर्वाण पाने के लिए आष्टांगिक मार्ग पर चलना ही एकमात्र उपाय है।

बुद्ध ने निर्वाण पाने के लिए जो मार्ग बताया है उसे लेकर कुछ पंक्तियां भी काफी प्रचलित है..

व्यक्ति को बुराई से दूर रहना होगा,
सदैव अच्छाई वाले कार्य ही करना होगा,
निर्वाण के लिए मन को शुद्ध करना अनिवार्य है,
यही बुद्ध के धम्म का सबसे बड़ा उपदेश है।

सारनाथ में बुद्ध के प्रवचन को धर्मचक्र प्रवर्तन

बुद्ध के इस प्रवचन को धम्म चक्र परिवर्तन कहा गया जिसका अर्थ है “धर्म के पहिये का घूमना..जो सदियों पुरानी मान्यताओं औऱ कुरीतियों के बदलने का संकेत था। जिसका अर्थ था कि अब संसार में बहुत कुछ बदलने वाला था, पुरावी रीति रिवाज, पुरानी परंपरायें बदलने वाली थी.. क्योंकि अब बुद्ध के धम्म का आगमन हो चुका था। सारनाथ में बुद्ध के प्रवचन को धर्मचक्र प्रवर्तन सूत्र कहा गया था। बुद्ध का ये प्रवचन भी इसलिए काफी अहम था क्योंकि ये एक क्रांतिकारी बदलाव लाने वाला था, जो भविष्य में बौद्ध धर्म की नींव रखने वाला था। धम्म चक्र परिवर्तन ने न केवल बौद्ध धर्म की नींव रखी बल्कि लाखों करोड़ो लोगो को बुद्ध की समानता  और सम्मान की विचारधारा के साथ जोड़ दिया था। सारनाथ में स्थित धमेख स्तूप बुद्ध द्वारा दिया गया ज्ञान औऱ उनके पांचों शिष्यों के धम्म के ज्ञान प्राप्त करने का प्रतीक है।

अष्टांगिक मार्ग का अनुसरण

बुद्ध ने बताया कि व्यक्ति का सच्चा ज्ञान किसी शास्त्र से नहीं, किसी बड़े वंश में पैदा होने से नहीं मिलता बल्कि अपने जीवन की प्रत्येक घटना का गहीनता से अवलोकन करके, आपके प्रत्यक्ष अनुभव से ही आपको मिलता है। व्य़क्ति को अंशविश्वास पर नहीं बल्कि व्यावहारिक ज्ञान, आत्म अनुशासन, और दयावान होकर ही सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है। बुद्ध ने संदेश दिया कि किसी भी चीज की अति नहीं होनी चाहिए..4 आर्य सत्य को पाने के लिए अष्टांगिक मार्ग का अनुसरण करके ही सच्चा ज्ञान मिलेगा।

जिसमें पहला आपका सही दृष्टिकोण होना चाहिए, जो आपको वास्तविकता के सच्चे स्वरूप को समझने में मदद करें। दूसरा, आपका संकल्प सही होना चाहिए यानि कि बुद्ध करुणा और अहिंसा के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते है। हमेशा  वाणी सहीं रखिये औऱ सच बोलिये, हानि पहुंचाने वाले शब्दों से बचना चाहिए। ज्ञान की प्राप्ती के लिए व्यक्ति का आचरण नैतिकता वाला होना चाहिए। जो आजीविका आप कमा रहे है वो सहीं तरीके से अर्जीत की गई हो..आपकी कोशिश सदैव सच्ची और ईमानदार होनी चाहिए। खुद में सकारात्मक गुणों को विकसित करें  नकारात्मकता से दूर रहे।

सहीं चीजों के जागरूक होना जरूरी है , हमेशा व्यक्ति को अपने विचारों, भावनाओं और परिवेश के प्रति सचेत रहना चाहिए। इसके बाद है सही एकाग्रता का होना, ज्ञान के लिए गहन एकाग्रता और ध्यान का अभ्यास हमेशा करते रहे।। बुद्ध ने अपने पहले संदेश में संसार को एक आसान मार्ग बताया जो उन्हें उनके दुखों से दूर कर सकता था और यहीं मार्ग संसार के लिए बुद्ध का धम्म बन गया।

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