K.R. Narayanan: देश के पहले दलित राष्ट्रपति, जिन्होंने हमेशा संविधान और सामाजिक समानता को सर्वोपरि रखा

KR Narayanan, India's first Dalit President
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K.R. Narayanan: : बाबा साहब अंबेडकर ने कहा था कि दलितों को बराबरी और सम्मान चाहिए तो भारतीय राजनीति में भी उनकी सक्रियता बढ़नी चाहिए, दलित और पिछड़ी जाति के लोग सक्रिय रूप से राजनीति का हिस्सा होंगे तो वो अपने और अपने लोगो के अधिकारों के लिए लड़ सकेंगे। और इसलिए भारतीय राजनीति में उंचे ओहदे पर कई दलित और पिछड़े समाज के महापूरूष आसीत हुए। उन्हीं में से एक थे सामाजिक बराबरी और लोकतांत्रिक मूल्यों का पुरजोर समर्थन करने वाले पहले दलित राष्ट्रपति के आर नारायण। अपने इस लेख में हम बात करेंगे भारत के पूर्व राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति रह चुके के आर नारायण के बारे में.. जिन्होंने अपने कार्यों से न केवल दलित समाज का उत्थान के लिए खड़े हुए बल्कि भारतीय दलित राजनीति का अहम हिस्सा रहे है।

कौन थे K.R. Narayanan?

के आर नारायनण, जिनका पूरा नाम कोचेरिल रमन नारायणन था। जिनका जन्म केरल के त्रावणकोर रियासत जो वर्तमान में कोट्टायम जिला में पड़ता है, में 27 अक्टूबर 1920 को एक हिंदू दलित परिवार में हुआ था। वो बचपन से ही काफी मेधावी छात्र थे, मगर गरीबी के कारण वो किताबें भी नहीं खरीद पाते थे, तब उनके बड़े भाई  के.आर. नीलकांतन जो अस्थमा के कारण घर पर रहते थे दूसरो से किताबें लेकर उन्हें कॉपी करके नारायणन को दिया करते थे। उनकी शुरुआती शिक्षा उझावूर के सरकारी लोअर प्राइमरी स्कूल, कुरिचितनम में हुई, जिसके बाद आवर लेडी ऑफ लूर्डेस अपर प्राइमरी स्कूल में पढ़ाई की, आपको जानकर हैरानी होगी कि दलित बस्ती में रहने के कारण उन्हें स्कूल जाने के लिए 5 किलोमीटर रोजाना पैदल चलना पड़ता था।

भारत के पहले दलित राष्ट्रपति

बावजूद इसके उनकी कठिनाइयां कम नहीं हुई.. स्कूल की फीस न भर पाने के कारण क्लास के बाहर कर दिया गया, जिसके बाद वो क्लास के बाहर खड़े होकर पढ़ने के लिए मजबूर हो गए। लेकिन किसी तरह से उन्होंने सेंट मैरी हाई स्कूल, कुराविलंगड से दसवी दी, लेकिन बारहवी की पढ़ाई करने के लिए उनकी माली हालत इतनी खराब थी कि उन्होंने त्रावणकोर शाही परिवार से छात्रवृत्ति की सहायता ली  औऱ सीएमएस कॉलेज , कोट्टायम से बारहवी की पढ़ाई की।  जिसके बाद वो स्कोलरशिप की सहायता से ही त्रावणकोर विश्वविद्यालय, यानी कि केरल विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में बीए (ऑनर्स) और एमए की उपाधि प्राप्त की थी।

नारायणन त्रावणकोर में प्रथम श्रेणी में यह डिग्री प्राप्त करने वाले पहले दलित बने। मगर पढ़ने की चाह कम नहीं हुआ और पढ़ने की चाह ने उन्हें हाइयर स्टडीज के लिए छात्रवृति पर लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया। जिसके बाद लंदन से आने के बाद उन्होंने 1949 में पंडित नेहरू के कार्यकाल में भारतीय विदेश सेवा से शुरुआत की। वो संयुक्त राज्य अमेरिका, रंगून , टोक्यो , लंदन , कैनबरा और हनोई और चीन के साथ साथ कई देशों राजदूत रहे थे। नेहरू ने उन्हें “देश का सर्वश्रेष्ठ राजनयिक” कहा था। वे 1978 में आईएफएस से सेवानिवृत्त हुए थे।

राजनीतिक करियर की शुरुआत

नारायणन कभी सक्रिय रूप से राजनीति का हिस्सा नही बनना चाहते थे इसलिए रिटाय़र होने के बाद वो 3 जनवरी 1979 से 14 अक्टूबर 1980 तक नई दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के कुलपति के रूप में कार्य करते रहे थे, मगर 1980 में उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी मे फिर से 1980 से 1984 तक संयुक्त राज्य अमेरिका में भारतीय राजदूत के रूप में काम करने के वापिस बुला लिया। हालांकि इसी इंदिरागांधी ने उन्हें राजनीति में आने के मनाया और राजीव गांधी के नेतृत्व में 1985 में वो सक्रिय राजनीति का हिस्सा बन गए।

केरल के पलक्कड़ जिले के ओट्टापलम निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस टिकट पर लोकसभा के तीन लगातार आम चुनाव में जीत दर्ज की औऱ केंद्रीय मंत्रिमंडल में राज्य मंत्री रहे, वो 1985 में  योजना मंत्री, (1985-86) में विदेश मंत्रालय  और (1986-89) तक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी  मंत्री रहे थे। हालांकि 1991 में  नारायणन को मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया, क्योंकि पार्टी का मानना था कि वो कम्युनिस्ट थे। मगर 1992 में उन्होंने फिर से वापसी की और  21 अगस्त 1992 को के.आर. नारायणन उन्हें उपराष्ट्रपति चुना गया।

95 प्रतिशत मत प्राप्त करके राष्ट्रपति बने

पूर्व प्रधानमंत्री और जनता दल संसदीय दल के तत्कालीन नेता वी.पी. सिंह ने प्रस्तावित किया था, ये नारायणन की लोकप्रियता का नमूना था, कि विपक्ष भी उन्हें पसंद करता था। उपराष्ट्रपति रहते हुए उन्होंने जो जिम्मेदारीपूर्वक कार्य किया उसके कारण 14 जुलाई 1997 में वो 95 प्रतिशत मत प्राप्त करके राष्ट्रपति चुने गए थे।

उनका चुनाव प्रतीक था कि समाज में जो समस्यायें है, जो गरीबी लाचारी है, अब से आम आदमी की चिंताएंसामाजिक और राजनीतिक जीवन के केंद्र में आ गई हैं। ये नारायणन ही थे जिन्होंने राष्ट्रपति होते हुए भी आम चुनावों में अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया और आम लोगो की तरह लाइन में खड़े होकर वोट किया था.. देश में पहली बार बढ़ते जातिवाद और असमानता पर सार्वजनित रूप से बोलने वाले राष्ट्रपति के आर नारायणन ही थे। वो बाबा साहब की ही तरह मानते थे कि शिक्षा के दम पर भेदभाव और असमानता को दूर किया जा सकता है।

सामाजिक और राजनीतिक रूप से संगठित

इसलिए उन्होंने अपने भाषणों में राष्ट्र को दलितों और आदिवासियों , अल्पसंख्यकों और गरीबों,  दबे-कुचलें लोगों के प्रति उसके कर्तव्यों और दायित्वों के बारे में बात की थी। वो मानते थे कि सामाजिक और राजनीतिक रूप से संगठित होकर ही दलित और पिछड़े वर्ग के लोग न्याय और सम्मान पा सकते है। उन्होंने देश के युवाओं को जागरूक किया कि वो ही भारत का एक ऐसा राष्ट्र बना सकते है जो भेदभाव से अलग एक समाजिक समानता वाला समाज बना सकते है।  9 नवंबर 2005 को 85 वर्ष की आयु में नई दिल्ली के आर्मी रिसर्च एंड रेफरल हॉस्पिटल में किडनी फेल होने के कारण के.आर. नारायणन का निधन हो गया था।

नारायणन के सम्मान में साल 2005 में के.आर. नारायणन फाउंडेशन (के.आर.एन.एफ.) की स्थापना की गई, जो केरल में समाज के सबसे कमजोर वर्गों – महिलाओं, बच्चों, विकलांग व्यक्तियों, वृद्धोंस और वंचितों के शिक्षा, सेवा, स्वाथ्य से जुड़ी सुविधायें मुहैया कराते है। जिससे गरीब और वंचितों का आर्थिक सशक्तिकरण हो सकें। नारायणन जैसी शख्सियत ही समाज में बराबरी की रूपरेखा तैयार कर सकती है। उनके योगदान के लिए उन्हें हमेशा सम्मान से याद रखा जायेगा।

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