Chirner Satyagraha: वैसे तो बाबा साहब आंबेडकर ने कभी भी अंग्रेजी हुकूमत का विरोध नहीं किया लेकिन अंग्रेजी हुकूमत ने भारत में अपने शासन के दौरान कई ऐसी नीतियां बनाई जिसे बाबा साहब ने गलत माना। जिनमें से भारत के जंगलों पर अधिकार करने और वहां रहने वाले मूल निवासियों को विस्थापित और कमजोर करने के लिए बनाए हुए नियम जिसमें पहला था- भारतीय वन अधिनियम, 1878 (Indian Forest Act, 1878) था, जिसके मुताबित अंग्रेजों ने सभी जंगलों को तीन भागों में विभाजित कर दिया जिसमें आरक्षित, सुरक्षित और ग्रामीण वन में बांटा गया।
डॉ. आंबेडकर की अदालत में ऐतिहासिक लड़ाई
इस अधिनियम के जरिए अंग्रेजों ने आदिवासियों और स्थानीय लोगों के सदियों से चली आ रही पारंपरिक अधिकारों जैसे लकड़ी काटना, जंगलों में पशुओं को चराने पर रोक लगा दी गई थी, वहीं दूसरा कानून था भारतीय वन अधिनियम, 1927 (Indian Forest Act, 1927), इसके तहत पिछले सभी वन कानूनों एक करके जंगलों पर राज्य के यानी कि सरकारी नियंत्रण को और ज्यादा मजबूत कर दिया और स्थानीय लोगों की गतिविधियों को अपराध घोषित कर दिया गया था। इसके साथ ही किसानों की जमीनों पर जबरन अधिकार करने के लिए भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 (Land Acquisition Act, 1894) लाया गया जिसके तहत अंग्रेजों ने खुद को ये अधिकार दे दिया कि वो सरकारी, व्यावसायिक या सार्वजनिक कार्यों जिसमें रेलवे लाइन बिछाना जैसे काम शामिल थे उसके लिए किसी भी किसान की जमीन का अधिग्रहण कर सकते थे।
अंग्रेजों की इस दमनकारी कानून के कारण भारतीय किसानों से न केवल उनकी जमीन छीनी जा रही थी बल्कि सदियों से जिन जंगलों को वो अपना घर समझ रहे थे वो भी उनके हाथों से छीना जा रहा था। ऐसे में भला वो क्या करते। इसलिए अंग्रेजों हुकूमत की तुगलकी फरमान के खिलाफ देश के कई हिस्सों ने विद्रोह की आवाज उठाने लगी थी मगर महाराष्ट्र के चिरनेर में जो हुआ, उसने पूरे देश को पहली बार बाबा साहब आंबेडकर का वो रूप दिखाया जब बाबा साहब ने ब्रिटिश हुकूमत के बनाए कानून का फायदा उठा कर मासूम चीरनेर के लोगों को फांसी और उम्रकैद से बचाया था। साथ ही बताया अंग्रेजों की मिट्टी पालित भी की थी। अपने इस लेख में हम चिरनेर के उस सत्याग्रह के बारे में जानेंगे जिसमें सैकड़ों मासूमों को जानबूझ कर फसाया गया और बाबा साहब की उन दलीलों के बार में भी जिसके दम पर ब्रिटिश हुकूमत की बोलती बंद कर दी थी।
ये समय था साल 1930 का, भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के तहत अंग्रेजी हुकुमत ने महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले चिरनेर गांव में अंग्रेजी हुकुमत ने किसानों और गरीब आदिवासी लोगो की जंगलो और जमीन पर कब्जा कर लिया था। सदियों से उन जंगलो को अपना घर मानने वाले मूल निवासियों का घर छिन गया था। जीवन यापन तक करना मुश्किल हो गया था, ऐसे मं किसानो और आदिवासियों ने तय किया कि वो अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ जाकर अपने जंगलो में जायेंगे.. लेकिन ब्रिटिश हुकुमत के सिपाही चिरनेर के जंगलो को घेरे हुए थे, 1930 में गाँधी की जी डांडी यात्रा पहले ही सफल आंदोलन साबित हो चुकी थी, इसलिए चिरनेर के लोगो ने हाथों में चिरनेर सत्याग्रह के नाम से आंदोलन शुरु किया.. उनका एक ही नारा था हमारा जंगल, हमारा हक।
किसानों के लिए जंगल के रास्ते का बंद होना उनके और उनके मवेशियों के लिए मौत का फरमान जैसा ही था। न तो वो जंगलो के लकड़ियां ले सकते थे, न फल और न ही चारा। बस वो अपने परिवार को पल पल मरते कैसे देखते, उन लोगो के खुद को संगठित किया और 25 सितंबर 1930 को हजारों किसान अपने परिवारो के साथ चिरनेर महा सत्यग्रह के लिए जमा हुए। ये महात्मा गांधी के कहे अनुसार अहिंसक औऱ शांतिपूर्ण सत्यग्रह था, जिन्हें केवल अपना अधिकार चाहिए था, लेकिन शांतिपूर्ण सत्यग्राह को हिंसक बनाने के लिए अंग्रेजी हुकुमत के दो अधिकारी स्मिथ और मिलर ने उन्हें रूकने के लिए कहा लेकिन किसानों ने अपना कारवां जारी रखा। जिसका नतीजा से हुआ कि दोनो अधिकारियों ने शांतिपूर्ण सत्याग्रह पर गोलियां चलाने का हुकुम दे दिया। उस गोलीबारी में 10 लोगो की मौत हो गई और सैकड़ो लोग घायल हो गए, वहीं अंग्रेजी हुकुमत ने करीब 300 किसानों को देशद्रोह का आरोप लगा कर गिरफ्तार कर लिया था।
वो किसी भी हाल में अपना वर्चस्व कायम करने के लिए उन बेगुनाह निहत्थे किसानो को फांसी या फिर उम्रकैद दिलवाना चाहते थे। उनका पक्ष मजबूत था, तो वहीं किसानो के लिए कोई वकील खड़ा होने के लिए तैयार नहीं था.. गरीब मजबूर किसानों के लिए भला कौन अंग्रेजी हुकुमत से दुश्मनी मोलता.. ऐसे में किसानों के परिवार को पहली बार किसी ने बताया कि वो मुम्बई हाइकोर्ट जायें, वहां एक ऐसा मसीहा है जो उनके जैसे दबे कुचले लोगो के लिए मुकदमा लड़ता है। किसानों के परिवार मुम्बई हाइकोर्ट के परिसर पहुंचे और तब पहली बार उन्होंने बाबा साहब अंबेडकर को देखा। सभी हाथ जोड़ कर अपनो को बचाने की गुहार लगा रहे थे। बाबा साहब ने सबकी बातें सुनी और ऐलान किया कि वो उनका मुकदमा लड़ेंगे और वो भी बिना एक पैसा लिये।
जिस मुकदमे से सभी वकील भाग रहे थे बाबा साहब ने उस मुकदमे को लड़ने का फैसला कर लिया था, और पहुंच गए कोर्ट..मुकदमा शुरु हुआ.. सरकारी वकील ने दलील देना शुरु किया..वकील ने कहा – ये किसान नहीं बल्कि सत्याग्रह के नाम पर ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ विद्रोह करने वाले राजद्रोही है। उन्होंने पुलिस पर हमला करके सरकारी कामों में बाधा डाली.. इसलिए उन्हें फांसी या उम्रकैद ही मिलनी चाहिए।
इसके बाद बारी आती है बाबा साहब की- उन्होंने सबसे पहले सरकारी वकील पर कटाक्ष करते हुए सही से लॉ न पढ़ने वाला कहा.. उन्होंने कहा कि चिरनेर के वो किसान, जिन्हें देशद्रोह कहा जाता है उन्होंने तो हथियार तक नहीं उठाया था, वो तो शांतिपूर्ण तरीके से अपना हक मांग रहे थे। पुलिस ने शांतिपूर्ण सत्याग्रह पर गोलियां चला तक अपनी उग्रता को जाहिर कर दिया है, गरीब किसानो ने तो केवल अपनी जान बचाने के लिए अंग्रेजी अधिकारियों पर हमला किया था.. क्या किसी भी किसान के पास कोई जानलेवा हथियार था.. ये केवल आत्मरक्षा था कोई राजद्रोह नहीं।
किसान तो केवल अपने परिवार के लिए लड़ रहे थे जो भूख से मर रहे थे.. ये कोई आतंकी नहीं है, आम लोग है, जिन्हें अंग्रेजो ने दबाने की कोशिश की थी। अंग्रेजी हुकुमत के सभी गवाह झूठे साबित हुए और अंत में जज ने फैसला सुनाया, जो इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए छप गया। सभी किसानों को बेगुनाह घोषित कर दिया गया.. औऱ बाबा साहब ने आखिर न्याय को विजय दिलाई। अंग्रेजो के बनाये कानून ने ही बाबा साहब की उस जीत की नींव रखी थी। चिरनेर सत्याग्रह बाबा साहब की उस ऐतिहासिक जीत का कहानी है, जब बाबा साहब की दलीलो के आगे अंग्रेजी वकील भी पानी भरने लगे थे। बाबा साहब ने मासूम किसानों को बचा कर न्याय की मुल्य को बढ़ा दिया था।



