महाराष्ट्र के सबसे बड़े उत्सवो में से एक गणपति महोत्सव, जिसे आज के समय में पूरा महाराष्ट्र ही नहीं बल्कि पूरा देश धूमधाम से मनाता है। गणपति का आना और 10 दिनो की पूजा का बाद उनकी विदाई की धूम आप महाराष्ट्र की संस्कृति का सबसे अहम हिस्सा मान सकते है.. लेकिन क्या आप ये जानते है कि गणेश उत्सव की शुरुआत कोई सदियों पुरानी परंपरा नहीं है, बल्कि गणेश उत्सव को केवल इसलिए शुरु किया गया था।
ताकि दलितों के लिए सामाजिक बराबरी की उठी आवाज को गणेश उत्सव के ढोस नगाड़ो की आवाज के नीचे दबाया जा सकें, और इसे शुरु खुद शुरु किया था लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने… तिलक जिन्हें एक महान सामाजिक सुधारक माना जाता है, क्या सच में उन्होंने समाज के एक तबके के साथ अन्याय किया था.. क्या सच में गणेश उत्सव के पीछे का कारण दलितों की आवाज को दबाना ही थी.. अपने इस वीडियो में जानेंगे गणेश उत्सव को मनाने के पीछे का सच।
शिक्षा के लिए लड़ने वाले पहले महान समाज सुधारक ज्योतिबा
ये समय था 1880 के दशक का.. इस वक्त दलितो और महिलाओं की शिक्षा के लिए लड़ने वाले पहले महान समाज सुधारक ज्योतिबा फूले ने सत्य शोधक समाज की स्थापना कर दी थी, जो समाज में बराबरी की लड़ाई के लिए एक आंदोलन कर रहे थे। 18वी सदी वो समय था जब एक तरफ अंग्रेजी हुकुमत पूरी तरह से हावी थी तो वहीं उनकी छत्रछाया में जातिगत भेदभाव और दलितो का उत्पीड़न और ज्यादा बढ़ गया था।
खासकर ब्राह्मणों के वर्चस्व में शूद्रों की स्थिति बेहद दयनीय हो गई थी। अछूत कहलाने वाले शूद्रों को समाज में बराबरी और शिक्षा का अधिकार दिलाने के लिए ज्योतिबा फूले ने अपनी पत्नी सावित्री बाई फूले के साथ मिलकर समाज को जागरूक करने की पहल की। आज अछूतो को दलित जैसे सम्मानिय नाम देने वाले भी फूले ही थे। वो मानते थे कि मानवता जातिवाद से कई ऊपर है, इंसान को उसकी जाति के आधार पर नहीं तौलना चाहिए।
1873 में सत्य शोधक समाज की स्थापना
ब्राह्मणों के शूद्र औऱ अतिशूद्रों के लिए फैलाये अंधविश्वास से फूले बेहद नफरत करते थे.. और उन्होंने तय किया कि वो इस अंधविश्वास की बेड़ियो को तोड़ कर रहेंगे, जिसके लिए उन्होंने 24 सितंबर 1873 में सत्य शोधक समाज की स्थापना की। फूले ने न केवल ब्राह्मणी और हिंदू धर्म की कट्टर विचारधारा को ठुकराया, बल्कि उन्हें चुनौती भी दी। उन्होंने 1948 में लड़कियों के लिए पहली बार स्कूल खोला, और संदेश दिया कि शिक्षा पर सबका अधिकार है।
वहीं उन्होंने विधवाओं का पुनर्विवाह करवाने की शुरुआत की, वो बाल विवाह के खिलाफ थे, जिसके लिए उन्होंने एक आंदोलन किया था। उनकी बातें सुनने के लिए भीड़ जमा होने लगी। वो वंचित और त्यागी गई महिलाओं और बच्चों के लिए शेल्टर हाउस चलाते थे। फूले का संदेश पूरी तरह से ब्राह्मणी सत्ता को उखाड़ने का काम करने लगा था। जिससे अब ब्राह्मणों को अपनी नींव हिलने का डर सताने लगा, और तब इस आंदोलन को दबाने के लिए पहली बार बड़ी चाल चली गई थी।
तिलक ने तय किया कि लोगो का ध्यान भटकाना
ज्योतिबा फूले के आंदोलन को रोकने के लिए साम दाम दंड भेद सबका इस्तेमाल किया गया। उनके घर धोंडीबा जैसे क्रूर हत्यारे को भेजा गया, लेकिन वो फूले के विचारों से उतना प्रभावित हुआ कि उनका ही शागिर्द बन गया। पत्नी का अपमान किया गया लेकिन दोनो ने हिम्मत नहीं हारी, और धीरे धीरे प्रसिद्धि पूरे महाराष्ट्र में फैलने लगी। लगा कि अब शायद अछूतो के लिए कोई बड़ा बदलाव होगा, मगर उस वक्त नारायण पेट में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का अखबार केसरी का हेड क्वार्टर था।
उनकी नजर भी फूले के आंदोलन पर थी, वो खुद कट्टर ब्राह्मण थे… और फूले के आंदोलन के विरोधी भी थे। उन्होंने फूले के खिलाफ कई आलोचना वाले लेख लिखे, लेकिन फूले पर इनका कोई असर नहीं हुआ, न ही उनके आंदोलन में कोई कमी आई तो तिलक ने तय किया कि लोगो का ध्यान भटकाना चाहिए.. और उसके लिए सबसे अच्छा तरीका राष्ट्रवाद और धर्म का सहारा है।
दलितों और पिछड़ो को बराबरी हक़ दे
लोग राष्ट्रवाद और धर्म के नाम पर खिंचे चले जाते है.. तिलक ने असल में अपने राष्ट्रवादी एजेंडे को पूरा करने के लिए लोगों की धार्मिक भावनाओं का सहारा लिया और बड़े स्तर पर गणेश उत्सव की शुरुआत की। जो उत्सव पहले लोगो के घरो तक सिमित थे, उसे राष्ट्र का पर्व बनाया गया ताकि हिंदूवादी विचारधारा और ब्राह्मणी सोच को मजबूती के फलित किया जाय सकें। इस दौरान भीड़ को फूले और उनके संगठन के खिलाफ भी भड़काने का काम किया जाता था, ये कहा जाता था कि दलितों और पिछड़ो को बराबरी दे कर वो ईश्वर के आदेशों का अपमान कर रहे है। जबकि वेदो पुरानों में उन्हें शूद्र और सेवल कहा गया है.. जबकि वो ब्राह्मणों की बराबरी करने की कोशिश कर रहे है.. जिसका भीड़ पर काफी प्रभाव पड़ा था।
तिलक चातुर्वर्ण्य जातिवाद व्यवस्था के कट्टर समर्थक
जब आप इतिहास उठा कर देखते है तो पाते है कि फूले जहां वर्ण व्यवस्था के खिलाफ थे वहीं तिलक चातुर्वर्ण्य जातिवाद व्यवस्था के कट्टर समर्थक थे, इसी पर हिंदू धर्म की बुनियाद टिकी है.. जो भारतीय समाज की नींव है, वर्ण व्यवस्था का समाप्त होना भारतीय समाज की नींव को हिलाने वाली स्थिति है। यानि की तिलक ने वर्ण व्यवस्था को धर्म और राष्ट्र दोनो से जोड़ दिया था। उन्होंने जाति व्यवस्था को खत्म करने की फूले की कोशिशों के बदले उन्हें राष्ट्रद्रोही तक कहा था। तिलक मानते थे कि सदियो से जाति के आधार पर जिसे जो काम मिला है वो करना चाहिए, अछूत स्कूल जाने योग्य नही है, केवल उच्च जाति के लोग शिक्षा के काबिल है।
यहां तक कि तिलक ने महिला शिक्षा का पूरा विरोध किया था, वो मानते थे कि महिलाओ को केवल अपने बच्चों को पालना चाहिए.. जिसे खुद तिलक के अखबार मराठा में 31 अगस्त 1984 के अंक में छापा गया था। यानि की आप समझ सकते है तिलक वाकई में सच्चे समाज सुधारक थे या नहीं। जिन्होंने एक वर्ग को पूरा तरह से नजरअंदाज किया था, और उनके सम्मान और अधिकार के लिए किये जा रहे आंदोलन को दबाने के लिए गणेश उत्सव की शुरुआत की थी। ये थी कहानी गणेश उत्सव के शुरु होने की.. जिसमें कोई आपसी भाईचारा औऱ सौहार्द नहीं बल्कि जलन वजह थी।



