Top 5 Dalit news: ये तो हम सभी जानते है कि अगर किसी दलित ने कभी ताकतवर होने की कोशिश की तो न केवल मनुवादी आतंकी बल्कि शासन प्रशासन भी उन्हें कमजोर करने की चालें चलने लगता है,. लेकिन शायद वो ये भूल गए है कि अब दलित उनका गुलाम नहीं है, अब वो शिक्षित है और संगठित है। तो चलिए आपको इस लेख में पिछले 24 घंटे में दलितो के साथ हुई घटनाओं के बारें में बतायेंगे, जिसने दिखा दिया है कि अगर दलित संगठित हो जायें तो अच्छे अच्छों की नींदे हराम हो सकती है।
भीम आर्मी चीफ को केतनलाल के परिवार से मिलने से रोका
1, दलितों से जुड़ा पहला मामला भीम आर्मी चीफ चंद्र शेखर आजाद को लेकर है, जो दलित युवक केतन लाल की एक उंची जाति की लड़की से दोस्ती के कारण बहाने से घर बुला कर बुरी तरह से टॉर्चर कर हत्या करने के बाद उत्तराखंड के टिहरी में पीड़ित परिवार से मिलने जा रहे थे, लेकिन जैसा कि उनके साथ यूपी में किया जाता है, वैसी ही हरकत उत्तराखंड में भी दोहराई गई, उन्हें पीड़ित परिवार से मिलने से रोकने के लिए भारी संख्या में पुलिस व पैरामिलिट्री फोर्स को तैनात कर दिया गया। उन लोगों ने आजाद के कारवां को न केवल रोकने की कोशिश की बल्कि जानलेवा व्यवहार किया गया। उनके काफिले को शंकराचार्य चौक पर रोक दिया गया जिसके बाद आजाद पैदल ही हाइवे पर कड़ी धूप में निकल पड़े, जिसके बाद उन्हें रोकने के लिए धक्का मुक्की भी की गई.. जिसमें उनकी शर्ट फट गई।
आजाद ने सरकार के इस रवैये के खिलाफ हाइवे पर ही मोर्चा खोल दिया है। बता दें कि टिहरी जिले के लंबगांव थाना क्षेत्र के देवल गांव में बीते 7–8 जून की रात 18 साल के केतनलाल की बेरहमी के हत्या कर दी गई थी, क्योंकि उनकी दोस्ती एक ऊंची जाति वाली लड़की से हो गई थी। खुद लड़की ने उसे फोन करके बुलाया था और जिसके बाद लड़की के परिवार वालो ने केतन को रात भर टॉर्चर कर मरने के लिए छोड़ दिया था। इस मामले में खुद पीड़ित परिवार ने इच्छा जाहिर की थी कि आजाद उनसे जा कर मिले, लेकिन शायद आजाद की बढ़ती ताकत उत्तराखंड सरकार को चुभने लगी..उन्हें पीड़ित परिवार ने नहीं मिलना दिया गया। एक जनता का प्रतिनीधि अगर अपनी जनता से ही नहीं मिल पाता है तो अंदाजा लगा सकते है कि सरकार की मनमानी किस हद तक हो चुकी है।
फारूर्खाबाद में दलित परिवार पलायन करने को मजबूर
2, दलितों से जुड़ा अगला मामला उत्तर प्रदेश के फारूखाबाद से है, जहां जातिवादियों की प्रताड़ना से तंग आकर एक दलित परिवार पलायन करने के लिए मजबूर हो गया है, इतना ही नहीं दलित परिवार ने अपने घर के बाहर मकान बिकाऊ है का पोस्टर भी लगा दिया। ये मामला फर्रुखाबाद के कंपिल थाना क्षेत्र के बहलोलपुर गांव का है, पीड़िता माया देवी कठेरिया ने अपनी आपबीती बताते हुए कहा कि 24 जून को गांव के कपछ जातिवादियों ने उनकी कच्ची झोपड़ी के पास मेड़ पर कंटीले तार लगा दिये थे, ताकि उनका रास्ता बंद हो सके, लेकिन मायादेवी ने इसका विरोध किया तो आरोपियो ने पीड़िता के साथ जातिसूचक गालियां देते हुए मारपीट शुरु कर दी।
यहां तक कि बीच बचाव करने आये उनके नाती औऱ बहू को भी बुरी तरह से पीटा… हैरानी की बात तो ये है कि जब मायादेवी ने पुलिस में इसकी दर्ज करानी चाही तो पुलिस वालो ने एफआईआर दर्ज करने के बजाये केवल पीड़ितो का मेडिकल करा कर पल्ला झाड़ लिया, जबकि उन्हें गंभीर चोटे आई है, पूरे परिवार में दहशत का माहौल है, और वो अब गांव से पलायन करना चाहते है। पीड़ित परिवार ने अब न्याय के लिए जिला प्रशासन से मदद मांगी है। वहीं क्षेत्राधिकारी कायमगंज राजेश कुमार द्विवेदी की तरफ से आश्वासन दिया गया है कि इस मामले की निष्पक्ष डांच की जायेगी, औऱ एफआईआर दर्ज करा कर विधिक कार्यवाई होगी। अब देखना ये होगा कि पहले क्या होगा, न्याय या फिर दलित परिवार का पलायन।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली की बड़ी पहल
3, दलितों से जुड़ा अगला मामला राजधानी दिल्ली से है, जहां दलितों और पिछड़े छात्रों को उच्च शिक्षा देने के लिए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली ने बड़ी शुरूआत की है.. उन्होंने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रो का पीएचडी की रिक्त सीटों को भरने के लिए विशेष प्रवेश अभियान 2026 चलाया जा रहा है, ताकि एससीएसटी वर्ग के छात्र भी पात्रता की मानदंड के अनुसार प्रवेश पा सकें, और उनके साथ किसी तरह का भेदभाव न हो। शैक्षणिक संस्थानों में भेदभाव और भ्रष्टाचार को रोका जा सकें इसलिए योग्य छात्रों को प्रवेश देने के लिए चलाये जा रहे इस अभियान से दलित और पिछड़ी जाति के छात्रों के लिए प्रवेश लेने की प्रक्रिया पारदर्शी और आसान हो गई है।
ये अभियान 18 जून से शुरु हुआ है, और 19 से आईआईटी दिल्ली में पहले सेमेस्टर के लिए पीएचडी कार्यक्रमों में दाखिले की प्रक्रिया शुरु हो गई है। आईआईटी दिल्ली की इस पहल से बहुजन समुदाय से आने वाले छात्रों का उच्च शिक्षा पाने की सपना पूरा होने के उम्मीदें और बढ़ गई है। ऐसे में उम्मीद ये की जाती है कि ये पारदर्शिता केवल यहीं तक सिमित न रहे, बल्कि छात्रो के साथ जातिगत भेदभाव हो तो भी संस्थान पूर्ण न्याय कर सकें।
आसपा की लहर से विपक्षियों में बौखलाहट
4, दलितों से जुड़ा अगला मामला उत्तर प्रदेश के हापुड़ से है, जहां आजाद समाज पार्टी के बढ़ते ओहदे से विपक्षियों में ऐसी बौखलाहट बढ़ी है कि आसपा से जुड़े युवाओ की आवाज को दबाने के लिए जातिवादी दबंगो ने एक भावी जिला पंचायत प्रतियाशी पर जानलेवा हमला कर दिया। इस घटना का एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें आज़ाद समाज पार्टी की ओर से जिला पंचायत प्रतियाशी अभिषेक यादव पर देर रात चाकू से हमला किया गया। वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि हमलावर गाड़ी में बैठ कर चाकू दिखा रहे थे।
अभिषेक ने जब उनके बगल से निकलने की कोशिश की तो आरोपियों ने जानलेवा हमला करने की कोशिश की, औऱ फरार हो गए.. हालांकि अभिषेक यादव इस वक्त सुरक्षित है, लेकिन इस घटना ने यूपी में कानून व्यवस्था की सच्चाई उजागर कर दी है.. जहां सरेआम एक प्रत्याशी पर जानलेवा हमला कर दिया गया.. ये हमला इशारा है कि आसपा की लहर चरम पर है और उससे तिलमिलाये लोग इस तरह की हरकतें कर रहे है। भीम आर्मी और आसपा के कार्यकर्ताऔ ने जल्द से जल्द आरोपियों को गिरफ्तार करने की मांग की है, ताकि अभिषेक और उनका परिवार डर के सायें में न जियें।
उड़ीसा में दलित रसोइयां की नियुक्त के बाद आंगनबाड़ी बंद
5, दलितो से जुड़ा अगला मामला उड़ीसा के भुवनेश्वर से है, जहां एक आंगनवाड़ी में दलित रसोइयां की नियुक्ति के बाद बच्चों के अभिभावको ने बच्चो को आंगनवाड़ी भेजने से केवल इंकार ही नहीं बल्कि आंगनवाड़ी में ताला भी लगवा दिया। ये मामला भुवनेश्वर के बलांगीर ज़िले के मुरीबहाल ब्लॉक में आने वाले घुसुरामुंडा आंगनवाड़ी केंद्र की है। जहां कुछ समय पहले पुन्या हरिपाल नाम की दलित महिला को बतौर रसोइयां नियुक्त किया गया था, लेकिन जब गांव के लोगो को इसके बारे मे पता चला तो उन्होंने साफ कहा कि उनके बच्चे दलित के हाथो से बना खाना नहीं खायेंगे, उन्होंने बच्चो को भेजने से भी इंकार कर दिया जिससे 4 दिनो से आंगनवाड़ी पर ताला लगा हुआ है।
हैरानी की बात है कि इस घटना की जानकारी होने के बाद CDPO पूर्णिमा बैथारूतहसीलदार जगदीश करतामी और IIC बुलु मुंडा ने गांव वालों को बहुत समझाने की कोशिश भी की.. लेकिन गांव वाले टस से मस नहीं हुए.. गांव में इस तरह से जातिगत भेदभाव के कारण आंगनवाड़ी पर ताला लगाने से प्रशासन की चिंता बढ़ गई है। अब देखना ये होगा कि अंतिम निष्कर्ष क्या निकलता है। क्या गांव वाले समझेंगे या दलित की नौकरी जायेगी।



