Dalit Christian Manifesto: सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी आर-पार के मूड में दलित ईसाई, मेनीफेस्टो जारी कर सरकार को घेरा!

Dalit chritisians, Dalit chritisians Manifesto
Source: Google

Dalit Christian Manifesto: बीते महीने दलित ईसाइयों से जुड़ी एक रिपोर्ट सामने आई, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट किया कि दलित ईसाई अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) श्रेणियों के अंतर्गत आने वाले किसी भी लाभ के हकदार नहीं होंगे। जिसके बाद से दलित ईसाई अपने हक़ की लड़ई लड़ रहे है और इसी फैसले को लेकर ईसाइयों ने एक घोषणापत्र जारी किया और सुप्रीम court को चुनौती दी है।

Also Read: Gosaiganj news: यूपी में बाबा साहब के अपमान, बाबा साहब के पोस्टर पर पेशाब करने का वीडियो हुआ वायरल

दलित ईसाइयों ने जारी किया घोषणापत्र

दलितो से जुड़ा अगला मामला दलित इसाइयो को लेकर है, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी अपने हक के लिए हार न मानते हुए 7 सूत्री घोषणापत्र जारी किया है। बता दे कि सुप्रीम कोर्ट ने सीधे तौर पर 26 मार्च को फैसला सुनाते हुए कहा था कि जो दलित ईसाई बन जाते है उन्हें अनूसूचित जाति जनजाति के कैटेगरी में आने वाले कोई भी लाभ नहीं मिलेंगे। जिसे लेकर दलित ईसाई लगातार लड़ाई लड़ रहे है.. इसी कड़ी में दलित ईसाइयों ने एक घोषणापत्र जारी करते हुए 7 मांगे रखी है।

उन्होंने संविधान के अनूसूचित जाति आदेश 1950, 1956, 1990 में हिंदुओ , सिखों औऱ बौद्धो की तरह मुसलमानों और ईसाइयो को भी अनूसूचित जाति का दर्जा देकर समान संरक्षण मांगा है। इससे उन्हें जाति और धर्म दोनो के आधार पर भेदभाव का सामना न करना पड़े।

घोषणापत्र के मुख्य बिंदु (Dalit Christian Manifesto 2026)

संवैधानिक संशोधन की मांग — उन्होंने संविधान के अनूसूचित जाति आदेश 1950, 1956, 1990 में हिंदुओ , सिखों औऱ बौद्धो की तरह मुसलमानों और ईसाइयो को भी अनूसूचित जाति का दर्जा देकर समान संरक्षण मांगा है। इससे उन्हें जाति और धर्म दोनो के आधार पर भेदभाव का सामना न करना पड़े।

जातिगत भेदभाव की मान्यता – घोषणापत्र इस बात पर ज़ोर देता है कि धर्म परिवर्तन से किसी व्यक्ति की जातिगत पहचान या उसे झेलना पड़ने वाला भेदभाव खत्म नहीं हो जाता।

कानूनी प्रावधानों का विरोध: वे सर्वोच्च न्यायालय के उन विशिष्ट उपायों का विरोध करते हैं, जो धर्म परिवर्तन के बाद SC दर्जे को अपने-आप समाप्त कर देते हैं; क्योंकि ऐसे उपाय ‘उनके जीवन की वास्तविकताओं’ की अनदेखी करते हैं। इसके अलवा आपको बता दें, यह अधिकारों की मांग है, न कि किसी रियायत की।

चर्च के भीतर बदलाव – ईसाई संस्थाओं के भीतर जाति-आधारित अन्याय का अंत होना चाहिए।

आर्थिक न्याय और शैक्षिक समानता

विधान परिषदों, अल्पसंख्यक आयोग और राज्य योजना बोर्ड में दलित ईसाइयों की नियुक्ति।

Also Read: Tamil Nadu news: DMK कार्यकर्ताओं के कथित हमले से आहत दलित महिला ने दी जान, इलाके में तनाव इंसाफ की मांग।

क्या मेनीफेस्ट वाकई में सरकार की नजरों में आयेगा?

साथ ही दलित होने के कारण ईसाई धर्म में भी चर्च में प्रवेश नही दिया जाता है, उन्हें चर्च में प्रवेश मिले, इसके अलावा आर्थिक समानता और न्यायिक समानता भी मिले.. दलित इसाइ काफी लंबे समय से अपने साथ होने वाले भेदभाव से जूझ रहे है, ऐसे में कोर्ट के फैसले ने उनके जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया है.. अब सवाल ये उठता है कि क्या दलित ईसाइयों का ये मेनीफेस्ट वाकई में सरकार की नजरों में आयेगा.. क्यों कोर्ट उनकी अपील मानकर फिर से संविधान में संशोधन करेगी.. वैसे आपको क्या लगता है क्या बदलाव किया जाना चाहिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *