Ken Betwa Project MP: 12 अप्रैल को पहली बार ये मुद्दा प्रकाश में आया जब स्थानीय लोगो ने दुधवा डैम के निर्माण को लेकर विरोध प्रदर्शन किया औऱ काम रोकना पड़ा। सैकड़ो लोगो की भीड़ को काबू करने के लिए सरकार उनकी समस्याओं से निपटने के हजाय बीएनएस की धारा 163 लगा कर उनसे ही निपटने की तैयारी में है। जिसके तहत 5 से ज्यादा लोग एक साथ जमा नहीं होंगे, धरना नहीं करेंगे, रैली नही करेंगे, ये धारा बिल्कुल वैसे ही काम करती है जैसे 144 काम करती थी। एक खूबसूरत नदी पूरी तरह से सूख रही है.. अपने भविष्य को विनाश की तरफ जाता देख कर स्थानिय लोगो ने ये विरोध शुरू किया है.. क्योंकि इसी जिले में केन बेतवा नदी जोड़ो परिजोयना को आगे बढ़ाया जा रहा है।
सरकार की चुप्पी और आदिवासियों की चीख
1990 में नदी जोड़ो योजना- 19 बड़ी नदियों को जोड़ने की प्लानिंग, जिसमें सबसे पहले केन बेतवा को ही जोड़ा जा रहा है। लेकिन इसे हरी झंडी मिलते मिलते 2005 आ गया और फिर आखिरकार 2008 में एक नेशनल परियोजना बनाया गया,,, मगर प्रोजेक्ट तभी भी शुरु नहीं है। परियोजना को कैबिनेट की तरफ से 44000 करोड़ रूपय की परियोजना के तहत दिसंबर 2021 में मंजूरी दी गई। इस परियोजना के तहत एक 221 किलोमीटर नहर बनेगा, केन नदी पर पानी को जमा करने के लिए दोधन बांध का काम भी शुरु हो गया था, प्लानिंग साफ थी कि केव ते पानी को सूखे की मार झेल रहे बेतवा नदी तक पहुचाया जायें।
ताकि सूखे की मार झेल रहे बुंदेलखंड को राहत मिलेगी.. 10 लाख हेक्टेयर जमीन सिचाई हो सकेगी..करीब 50 से 60 लाख लोगो को पानी मिलेगा.. औऱ 105 मेगावाट पन बिजली भी मिलेगी। वेल सरकार की योजना तो काफी बढ़िया है, फिर सबसे बड़ा सवाल की जनता फिर योजना से खुश होने के बजाये इसे बंद क्यों करना चाहती है।
8 गांव तो वो तो परियोजना के कारण डूबे
तो चलिए आपको बताते है कि इस योजना का असली मकसद है- केन-बेतवा जोड़ो परियोजना वैसे तो देखने में बेहत फायदेमंद लग रही है, लेकिन सरकार सभी आकड़ो के बीच गेहूं के साथ पिसने वाले घुन की कोई गिनती नहीं की। जी हां, घुन हम इसलिए कह रहे है क्योंकि इसके करोड़ो के प्रोजोक्ट में भला 24 गांवो की और उनके लोगो की क्या ही वैल्यू होगी।
जी हां, इस परियोजना से नदी के आसपास के करीब 24 गांव पूरी तरह से बर्बाद हो जायेंगे, जिनमें से 16 को तो पहले ही टाइगर रिजर्व क्षेत्र कह कर लोगो को वहां से बाहर का रास्ता दिखा कर उन्हें घर से बेघर कर चुकी है सरकार.. वहीं बाकि बचे 8 गांव तो वो तो परियोजना के कारण वैसे ही डूब जायेंगे। भला सरकार को करोड़ो के परियोजना के आगे चंद मुट्ठीभर गांव की क्या ही चिंता। लेकिन अपने बच्चो के भविष्य की चिंता गांव में रहने वाले आदिवासी लोगो को तो है, बस उन लोगो ने अकेले ही लड़ाई शुरू कर दी।
आदिवासियो को विस्थापित करने की योजना
मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh), छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) में आदिवासियो को विस्थापित करने की योजना भी इस परियोजना की आड़ में बखूबी पूरी करने की कोशिश की जा रही है। बेचारे आदिवासी सदियो से अपनी पुरखों की जमीन उनकी विरासत, उनकी संस्कृति को बचाने के लिए लड़ रहे है.. आदिवासियों ने सीधा सरकार से पूछा कि वो ही बतायें कि अपने बच्चों औऱ परिवार को लेकर कहां जायें, जहां वो सम्मान से एक छत के नीचे रह सके। जो प्रकृति के पास हो..क्या सरकार उनकी जमीन के बदले जमीन नहीं देगी.. जो मुआवजा देना था, उसकी सुध आज तक सरकार ने नहीं ली कि मुआवजा मिला भी तो कितना मिला.. और किसे किसे मिला.. सरकार को कुछ नहीं पड़ी..
वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 – Wildlife Protection Act, 1972
अभी हाल ही नक्सली हिड़मा की मौत के बाद राज्य में अडानी ग्रूप के कुछ परियोजना की चर्चा काफी तेज हुई थी, जिसमें हजारों पेड़ काटे जाने की खबर है, वहीं अब इस परियोजना में भी 17 हजार तक पेड़ करेंगे..जिसमे प्रर्यावरणविद को भी हिला दिया है। उन्हें भी ये डर सताने लगा कि परियोजना से बचे खुचे बाघ भी विलुप्त हो जायेंगे। इस कारण अब सरकार के मंसूबो पर भी पानी फिरता नजर आ रहा है क्योंकि वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 के तहत जहां दोधन बांध बन रहा है वो अब पन्ना टाइगर रिसर्व क्षेत्र में आ गया है, जिससे अब यहां ये परियोजना धरी की धरी रह गई। क्योंकि जो परिजोयना जानवरो को नुकसान पहुंचाती है उसे रोकना ही होगा।
सरकार ने इस परियोजना में लापरवाही बरती
यानि की सरकार ने भले ही आदिवासियो को घर से बेघर किया हो लेकिन वो भी इस आग में झुलस गई है। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने भी इस परियोजना को रोक लगाते हुए कहा कि जब वन्य जीवों को नुकसान होगा तो परियोजना को हरि झंडी कैसे मिल गई.. इसकी जांच होनी चाहिए, वहीं भूमि अधिग्रहण 2013 के अनुसार आदिवासियो को विस्थापित करने से पहले उनका मुआवजा और पुनर्वास का पुख्ता इंतजाम होना चाहिए.. लेकिन वो भी नहीं किया गया है। तमाम फैक्ट बताते है कि सरकार ने इस परियोजना में लापरवाही बरती है और आदिवासियों का नजरअंदाज किया है.. लेकिन आदिवासी समुदाय भी अपनी धरोहर को बचाने के लिए किसी भी हद तक गुजर सकते है।
फिलहाल इस बांध निर्माण पर रोक लगी है.. करीबन 9000 हजार लोगो को अपना घर छोड़ना पड़ रहा है.. ऐसे में जब तक सरकार उनके लिए कोई कदम नहीं उठाती.. ये आंदोलन जारी ही रहने वाला है..वहीं लोगो का कहना है कि इस बात की क्या गारंटी के नदियों को जोड़ने के बाद भी सूखे की समस्या खत्म होगी.. क्योंकि इस बात की भी तो कोई सटीक रिपोर्ट नहीं है कि केन नदी में कितना ज्यादा पानी है जो बुंदेलखंड की तरफ जायेगी.. इसकी जांच तक नहीं की गई है, फिर ये परियोजना सफल ही होगी इस बात की कौन गारंटी लेगा। ये परियोजना भी केवल आदिवासियों को विस्थापित करने के लिए एक साजिश मात्र ही लग रही है।



